आश्विन कृष्ण सप्तमी शनिवार को देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधिवत होगी। आज ही के दिन निर्माण के देवता विश्वकर्मा का प्राकट¬ हुआ था। विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। उनकी पूजा से व्यापार में वृद्धि होती है तथा माता लक्ष्मी के आगमन के आसार में भी इजाफा होता है। देवताओं के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा के पूजन दिवस पर रोहिणी नक्षत्र के साथ अतिपुण्यकारी सर्वार्थ अमृत सिद्धि योग‚ रवियोग‚ द्विपुष्कर योग‚ जयद् योग का महासंयोग बन रहा है। प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य कन्या राशि में रात्रि १० .२२ बजे प्रवेश करेंगे। गुली काल मुहूर्त–प्रातः ०५.३७ बजे से ०७.०९ बजे तक
शुभ योग मुहूर्त– सुबह ०७.०९ बजे से ०८.४१ बजे तक
अभिजीत मुहूर्त–दोपहर ११.१९ बजे से १२.०८ बजे तक
मुहूर्त–दोपहर ११.४४ बजे से ०१.१६ बजे तक
लाभ योग मुहूर्त– मध्या ०१.१६ बजे से ०२.४७ बजे तक
अमृत योग शाम ०२.४७ बजे से ०४.१९ बजे तक
प्रति वर्ष आज का दिन भगवान विश्वकर्मा की जयंती के नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्मांड के सभी मानवीय जीवन में किसी भी प्रकार के रचनात्मक गुणों को प्रेरित कर शिखर पर पहुचाने वाले सृष्टि के रचयिता देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की जयंती की आप सबो को ढेरो शुभकामनाएं।
हिन्दू मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवताओं के शिल्पी के रूप में जाने जाते है । ऐसा माना जाता है कि सतयुग का ‘स्वर्ग लोक’, त्रेता युग की ‘लंका’, द्वापर युग की ‘द्वारिका’ और कलयुग का ‘हस्तिनापुर’ आदि विश्वकर्मा द्वारा ही रचित थे। इसके अलावा ग्रन्थों के अनुसार पौराणिक काल में देवताओं के अस्त्र-शस्त्र व महलों को भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाया था। सोने की लंका, पुष्पक विमान, इंद्र का व्रज, भगवान शिव का त्रिशूल, पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी को भी बनाया था। इस वजह से निर्माण और सृजन से जुड़े लोग विश्वकर्मा जयंती को श्रद्धा भाव से पूजा करते हैं।
सनातन परंपरा में पूरी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। इस दिन वर्तमान समय मे औद्योगिक क्षेत्रों, फैक्ट्रियों, लोहे, मशीनों तथा औज़ारों से सम्बंधित कार्य करने वाले, वाहन शोरूम आदि में विश्वकर्मा की पूजा होती है।
सनातन ग्रन्थों के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र ‘धर्म’ तथा धर्म के पुत्र ‘वास्तुदेव’ हुए। कहा जाता है कि धर्म की ‘वस्तु’ नामक स्त्री से उत्पन्न ‘वास्तु’ सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की ‘अंगिरसी’ नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। अपने पिता की भांति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। उनके पाँच पुत्र- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं। ये पाँचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे , मनु लोहे से, मय लकड़ी, त्वष्टा कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चाँदी से के कला में पारंगत हुए ।
आदि काल से ही विश्वकर्मा अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न देवल मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदनीय हैं।
धर्मशास्त्रों और ग्रथों में विश्वकर्मा के पाँच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है-
विराट विश्वकर्मा – सृष्टि के रचयिता
धर्मवंशी विश्वकर्मा – महान् शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र
अंगिरावंशी विश्वकर्मा – आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र
सुधन्वा विश्वकर्म – महान् शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता अथवी ऋषि के पौत्र
भृंगुवंशी विश्वकर्मा – उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)






