तसल्ली की बात है कि सर्वोच्च अदालत ने कथित मुफ्त की रेवडि़यों से संबंधित बहस के सिलसिले में स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में किसी रोक या दंडात्मक प्रावधान की बात नहीं सोच रही है। संबंधित याचिकाकर्ता की चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहार के वादे करने वाली पार्टियों पर चुनाव आयोग से रोक लगवाने‚ ऐसी पार्टियों की मान्यता रद्द कराने आदि की प्रार्थना को नामंजूर करते हुए‚ शीर्ष अदालत ने याद दिलाया है हम एक जनतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं। यानी इस मामले में ऐसा कोई समाधान मंजूर नहीं होगा‚ जो जनतांत्रिक व्यवस्था के तकाजों को लांघता हो। मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने चुनाव के लिए बेतुकी मुफ्त सौगात के मुद्दे को ‘गंभीर मुद्दा’ मानते हुए स्पष्ट किया कि वह इस मसले में कानूनी हस्तक्षेप के विरुद्ध हैं क्योंकि यह विधायी क्षेत्र का मुद्दा है। शीर्ष अदालत ने यह भी याद दिलाया कि समाज कल्याण योजनाओं और मुफ्त चीजें बांटने के चुनावी वादों के फर्क को समझा जाना चाहिए। इसके बाद भी‚ अदालत का कहना था कि यह एक गंभीर मसला है‚ कोई आसान बात नहीं है। अदालत की यह टिप्पणी सॉलिसिटर जनरल द्वारा इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का पक्ष रखे जाने के बाद आई थी। जाहिर है कि अदालत इस उलझे हुए प्रश्न पर‚ केंद्र सरकार तथा कुछ वरिष्ठ वकीलों के अलावा भी ‘दूसरों’ की राय सुनना जरूरी समझ रही थी। वास्तव में अदालत ने केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल के इस अनुरोध को भी अनसुना कर दिया कि जब तक विधायिका या निर्वाचन आयोग द्वारा इस समस्या के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता है‚ तब तक शीर्ष अदालत को ही ‘व्यापक राष्ट्रीय हित में’ इसके दिशा–निर्देश जारी कर देने चाहिए कि ‘क्या करना है‚ क्या नहीं!’ तथाकथित मुफ्त की रेवडि़यां बांटने की संस्कृति पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले ही दिनों हमला बोले जाने के बाद उठी बहस में काफी गर्द उठी है। इस हमले के मकसद से लेकर‚ किसे मुफ्त की रेवड़ी माना जाए यह बहस का विषय है। फिर भी शीर्ष अदालत ने यह याद दिलाकर इस गर्द को कुछ कम करने की कोशिश अवश्य की है कि इस प्रश्न का समाधान जनतांत्रिक व्यवस्था के अंदर से ही निकलेगा कि चुनाव के लिए जनता से वादा क्या किया जा सकता है क्या नहींॽ आखिर‚ जनतंत्र की तो परिभाषा ही यह कि उसमें जनता की इच्छा चले।






