अफगानिस्तान में फिर अपने पैर मजबूती से जमाने के लिए भारत सधे कदमों से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। पहले आंतरिक युद्ध से ग्रस्त अफगानिस्तान में भुखमरी के हालात देखते हुए भारत ने अफगान जनता के लिए खाद्य और चिकित्सा सामग्री भेजकर मदद का हाथ बढ़ाया और अब विनाशकारी भूकंप से तहस नहस हुए देश की तरफ सच्चे पड़ोसी की तरह मदद का हाथ बढ़ाया है, और काबुल स्थित दूतावास में तकनीकी टीम तैनात की है। इस तरह बिना किसी हो हल्ले के पिछले एक साल से बंद दूतावास के दरवाजे खुल गए हैं, और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की बहाली का रास्ता भी खुल गया है।
पिछले हफ्ते पक्तीका प्रांत में आए 6.1 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,500 से अधिक हो गई है और घायलों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। उल्लेखनीय है कि बीते अगस्त में अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी और तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने 15 अगस्त, 2021 को अपने दूतावास से अपने अधिकारियों को हटा लिया था। भारत से भेजी गई मदद की दो खेप काबुल पहुंच चुकी हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस मदद के बारे में ट्विटर पर लिखा, ‘भारत, एक सच्चा, पहला उत्तरदाता।’ मानवीय सहायता के प्रभावी वितरण और अफगान जनता के साथ जारी संपकरे की निगरानी एवं समन्वय के प्रयासों के मद्देनजर भारतीय तकनीकी दल काबुल में है।
भूकंप के बाद तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील की थी। इस अपील के बाद कई देशों ने संकटग्रस्त देश के लिए मदद भेजी है, जिनमें भारत सबसे पहला है। हाल ही में एक भारतीय दल ने अफगानिस्तान को हमारे मानवीय सहायता अभियान की आपूर्ति को देखने के लिए काबुल का दौरा किया था और वहां सत्तारूढ़ तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के साथ मुलाकात की थी।
इससे पहले तालिबान शासन और भारत के बीच पिछले साल अक्टूबर में मास्को में और उससे भी पहले 31 अगस्त को कतर में संपर्क हुआ था। कतर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल और तालिबान नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टैनिकजई में मुलाकात हुई थी। तालिबान को अभी तक भारत ने मान्यता नहीं दी है, लेकिन अपने सुरक्षा हितों को देखते हुए उससे संबंध बेहतर बनाना भारत के लिए जरूरी है।







