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इस्लामिक देश : चिंतित करने वाला रवैया

UB India News by UB India News
June 7, 2022
in Lokshbha2024, अध्यात्म, अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, ब्लॉग
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इस्लामिक देश : चिंतित करने वाला रवैया
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भाजपा नेताओं द्वारा इस्लाम से संबंधित टिप्पणी पर कई इस्लामिक देशों में हो रही प्रतिक्रियाएं किसी दृष्टि से सामान्य घटना नहीं है। कतर, कुवैत और ईरान ने भारतीय राजदूतों को सम्मन कर लिखित नाराजगी जताई। यही नहीं सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन के स्टोरों से भारतीय चीजें हटाए जाने की अपील सोशल मीडिया पर आने लगी और ऐसा होते देखा भी गया। ओमान के ग्रैंड मुफ्ती ने सभी मुस्लिम राष्ट्रों से इस मुद्दे पर एकजुट होने को कहा। पाकिस्तान और इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने इस पर बयान जारी कर दिया। पूरा विवाद एक टीवी बहस से संबंधित है जिसमें ज्ञानवापी में शिवलिंग की आकृति को फव्वारा बताने के विरुद्ध भाजपा की एक प्रवक्ता ने प्रश्नवाचक लहजे में कुछ टिप्पणी की थी। एक नेता ने उसको रीट्वीट कर दिया। यह इतना बड़ा विवाद बन जाएगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
टीवी डिबेट में आजकल तनाव बढ़ने पर ऐसी कई टिप्पणियां आती हैं जिनको मुद्दा बना दिया जाए तो हर दिन देश में तनाव और हिंसा हो सकती है तथा इसकी प्रतिध्वनि विदेशों में भी सुनाई पड़ेगी। ऐसे कम ही अवसर आए होंगे जब किसी देश में ऐसे मामले पर दूसरे देश के राजदूत को तलब किया होगा जिसमें द्विपक्षीय या फिर अंतरराष्ट्रीय मसले नहीं हो। किसी देश में टेलीविजन डिबेट या भाषण में की गई किसी नेता की टिप्पणी दूसरे देश के लिए मुद्दा कैसे हो सकता है? भाजपा ने अपने जिन नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई की है उन्होंने इन देशों पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। इसलिए यह विषय हमें कई पहलुओं पर गंभीरता से सोचने को बाध्य करता है।

किसी भी मजहब या उनके पैगंबरों के सम्मान के विरुद्ध कोई टिप्पणी समाज में स्वीकार नहीं हो सकती। क्या डिबेट में कही गई किसी पंक्ति को वाकई इस श्रेणी का माना जा सकता है? अगर है भी तो क्या भारत के साथ पुराने संबंध रखने वाले इन देशों को पता नहीं कि यहां संविधान में सभी पंथों, मजहबों को अपनी परंपरा के अनुसार जीने, मान्य सीमाओं में प्रचार करने का पूरा अधिकार है? यहां हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं है? बावजूद अगर उन्होंने इस तरह का असाधारण कदम उठाया तो इसके कारण साफ हैं। सच यह है कि इन देशों के अंदर ही दूसरे पंथों- मजहबों को वैसी स्वतंत्रता नहीं। गैर मुस्लिम भारतीयों को अपने धर्म के पालन में वहां अनेक कठिनाइयां आती हैं। लेकिन हमारी सरकार ने कभी वहां के राजदूतों को बुलाकर अपनी आपत्ति और नाराजगी नहीं जताई। दुनिया के ज्यादातर गैर मुस्लिम देशों ने ही शायद ही कभी ऐसा किया होगा। अगर देश किसी दूसरे देश में की गई टिप्पणियों को द्विपक्षीय संबंधों का मुद्दा बनाकर इस तरह उठाने लगें तो फिर दुनिया में अराजकता ही पैदा होगी। न यह किसी अंतरराष्ट्रीय कानून में आता है और न ही अंतरराष्ट्रीय राजनय में इसके बारे में मापदंड तय किए गए हैं।
जरा सोचिए, हिंदू धर्म और हमारे पूज्य देवी देवताओं के बारे में स्वयं भारत एवं दुनिया के अलग-अलग देशों में कई बार नकारात्मक टिप्पणियां की गई हैं। ऐसे अनेक रेखाचित्र और व्यंग्य कार्टून बनाए गए जो हमारी भावनाओं के विरुद्ध रहे हैं। मुझे याद नहीं कि कभी भारत सरकार ने इसके लिए उस देश से कभी इस तरह औपचारिक नाराजगी प्रकट की हो। इस आधार पर व्यवहार हो तो दुनियां के अनेक विश्वविद्यालयों में मान्य पुस्तकें हैं जहां हिंदू धर्म के बारे में दी गई जानकारियां सामान्य अपमान की सीमा को पार करती हैं। तो भारत सरकार को इन सारे देशों से नाराजगी प्रकट कर इन्हें पुस्तकों को हटाने तथा माफी मांगने के लिए कहना चाहिए। द्विपक्षीय संबंधों में कोई देश तभी राजनियक स्तर पर नाराजगी प्रकट कर सकता है जब सीधे उसके विरुद्ध कोई टिप्पणी हो, कदम उठाया गया या वहां के नागरिकों के विरुद्ध अपराध हुआ है। अगर किसी देश का मजहब द्विपक्षीय संबंधों को निर्धारित करने लगे तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पूरी तस्वीर भयानक होगी। हालांकि ऐसी स्थितियां अलग-अलग रूप में कई बार विश्व में पैदा हुई है। उदाहरण के लिए फ्रांस की एक पत्रिका में मोहम्मद साहब पर काटरून छापने के विरुद्ध आतंकवादियों ने हिंसा बाद में की, लेकिन कई देशों ने औपचारिक रूप से फ्रांस से नाराजगी प्रकट की। दुनिया में ईसाई देशों की संख्या सबसे ज्यादा है। अगर ईसा मसीह या बाद उनके दूसरे संतों पर कोई टिप्पणी हो जाए और सारे देश उस देश के राजदूत को बुलाकर नाराजगी प्रकट करने लगे तो क्या होगा? स्वयं मुस्लिम देशों के अंदर कई बार ऐसे बयान आते हैं।
जाहिर है, यह प्रसंग भारत के साथ पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। ठीक है कि हमारे भारतीय भारी संख्या में खाड़ी देशों में हैं। उनके साथ हमारे बहुपक्षीय संबंध हैं। किंतु संबंधों के पालन का दायित्व दोनों ओर से होता है। जरा सोचिए, इन देशों का रवैया कैसा है? उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू कतर में थे और उनकी यात्रा पर इसका असर पड़ सकता था। ईरान की तेल बिक्री पर प्रतिबंध खत्म करने के लिए भारत कोशिश कर रहा है पर उसने इसकी तनिक प्रवाह नहीं की। कुवैत तो भारत के करीबी देशों में माना जाता है। ये सब बातें एक प्रवक्ता के प्रश्नवाचक एक टिप्पणी के सामने कमजोर पड़ गई। तात्कालिक रूप से भारत ने जो भी किया उस पर अभी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं लेकिन दूरगामी दृष्टि से इन देशों के व्यवहार को पूरी सच्चाई के साथ स्वीकार कर द्विपक्षीय -अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में नए सिरे से नीति रणनीति बनाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है।
भारत में कोई टिप्पणी हुई है तो यह आंतरिक मामला है। देश की नीति के रूप में हम कभी भी किसी देश के मजहबी ही नहीं, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते। भारत के साथ संबंध कायम रखने की कामना करने वाले देशों को भी इसका ध्यान रखना चाहिए। इन देशों ने नहीं रखा है। साफ है इनके लिए मजहब की अपनी सोच सर्वोपरि है। सारे संबंधों की कसौटी इस्लाम मजहब है। उस पर उनके नजरिए से अगर आपके देश में सब कुछ सामान्य है तभी आपके संबंधों का महत्व है अन्यथा नहीं। इस कटु सच्चाई को दुनिया के सभी गैर इस्लामी देश स्वीकार करें तभी यह समझ में आएगा कि भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इस पहलू का निर्धारण कैसे हो।

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