बृहस्पतिवार का दिन भारतीय खेल के इतिहास में अविस्मरणीय दिन साबित हुआ। विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप (५२ किलोग्राम वर्ग) में स्वर्ण पदक जीत कर २५ वर्ष की निकहत जरीन खेल की दुनिया में छा गइ। हाल के दिनों में भारतीय खिलाडि़़यों ने अपने कौशल का अद्भुत मुजाहिरा किया है। निकहत के स्वर्णिम पंच के दो दिन पहले भारतीय बैड़मिंटन खिलाडि़़यों ने ७३ साल में पहली बार बाद थामस कप जीतकर इतिहास रचा था। इससे पहले इसी साल फरवरी में महज १६ साल के शतरंज खिलाड़़ी प्रागननंदा ने दुनिया के नंबर वन खिलाड़़ी मैग्नस कार्लसन को ३९ चाल में शिकस्त दे दी थी। एक समय ऐसा भी था जब खेल के मामले में भारत की गति बेहद धीमी थी। क्रिकेट को छोड़़कर ऐसा कोई खेल नहीं था‚ जहां भारत की तूती बोलती हो। मगर वक्त ने करवट ली और देश में खेल का माहौल तेजी से बदला। खेलों के प्रति नजरिया भी काफी हद तक व्यावसायिक होता गया। समाज और परिवार की सोच भी बदल गई। निकहत के विश्व चैंपियन बनने की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। न जाने कितने लोगों ने उसे ताने मारे‚ मुस्लिम समाज से होने पर छोटे कपड़े़ पहनकर अभ्यास करने पर उसे जलील किया गया‚ मगर दाद देनी होगी उनके अभिभावकों की। उन्होंने ऐसी किसी भी आलोचना और मसखरेपन की तरफ ध्यान नहीं दिया। उनका पूरा फोकस अपनी बेटी के कौशल और अभ्यास पर था। हालांकि यह सबकुछ आसान न था‚ मगर बेटी के कॅरियर की खातिर उन्होंने तमाम ताने सहे। उसी का नतीजा है कि भारत की बेटी ने बॉक्सिंग की दुनिया में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया। एक समय ऐसा भी आया था जब कंधे की चोट के कारण निकहत का खेलना अधर में लटक गया था‚ मगर मजबूत हौसले की वजह से वह रिंग में वापस लौटीं। निकहत के लिए अब तक २०२२ शानदार उपलब्धियों का साल रहा है। इस स्पर्धा से पहले निकहत ने फरवरी में स्ट्रेंड़़जा मेमोरियल में स्वर्ण पदक जीता था। वह स्ट्रेंड़़जा मेमोरियल में दो स्वर्ण पदक जीतने वालीं पहली भारतीय महिला मुक्केबाज बनी थीं। निःसंदेह निकहत के लिए आने वाले समय में बेहतरीन संभावनाएं हैं। निकहत की जीत से वाकई उन खिलाडि़यों विशेषकर लड़़कियों का हौसला परवान चढ़ेगा। मेहनत और लगन से जरीन ने जो मुकाम हासिल किया है‚ वह आगे भी बरकरार रहे। फिलहाल उन्हें इस जीत पर ढेरों मुबारकबाद।
धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की जगह कोई और स्थान हो?
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