कैसे भी लोकतंत्र में समानांतर ‘पुलिस स्टेट’ कायम रखना‚ लोक–आत्मा की हत्या है। विरोध पर डंडे बरसाती‚ अंधाधुंध खदेड़ती पुलिस से जब बच्चों‚ औरतों और नागरिकों के मानवाीय मसलों पर मुलायम होने की उम्मीद की जाती तब राजनीतिक व्यवस्था से उपजे अंतर्विरोधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पुलिस के हाथ इंसानियत की परख करनेे की लाख बात कर लें‚ उसके हाथ कानून से ज्यादा सत्ता की नीयत से बंधे हैं। सत्ता और रसूखदार अपनी ताकत में इजाफे के लिए कानून का इस्तेमाल करते हैं तो ईमान को सीने से लगाये आम इंसान सिर्फ इंसाफ की खातिर।
व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने को जोखिम मानने वाली मानसिकता का खाका हमारे कानूनों में ही है। सात दशकों में इस मानसिकता से उबरने में नाकामयाब रहने की वजह से सत्ताएं आज भी हमें क्रूर शासक से ज्यादा कुछ नजर नहीं आती। मैकाले ने जब १८३७ में राज के खिलाफ द्रोह को अपराध कहा तो १८५७ की क्रांति के बाद प्रतिरोधों को कुचलने के लिए १८६० में भारतीय दंड संहिता में भी इसे शामिल कर लिया। पहला मुकदमा बंगबासी अखबार के जोगेंद्र नाथ बोस के खिलाफ हुआ‚ जिन्होंने लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने को आस्था पर आघात कहकर शासन के फैसले को चुनौती दी। बाद में बालगंगाधर तिलक पर ‘केसरी’ अखबार में छापे गए भड़काऊ आलेखों के लिए मुकदमा चला। तिलक ने ‘देश का दुर्भाग्य’ और ‘ये उपाय काफी नहीं’ जैसे लेखों में हुकूमत पर सवालों की बौछार की। अदालत में उन्होंने छह दिन तक २२ घंटे जिरह की जिसकी पैरवी जिन्ना ने की।
अलीपुर बम कांड के लिए अरबिंद घोष ने कई मुुकदमे झेले तो उनकी ओर से चितरंजन दास ने बहस को अंजाम दिया। बाद में घोष ने अध्यात्म और दास ने आजादी के आंदोलन की अगुवाई में जीवन की बुलंदी हासिल की। आजादी के सत्तर साल बाद हम प्रतिरोध की इस विरासत को भूलकर डंडे के जोर पर खुली बहस और आलोचना को दबाने की जिद में हैं। केएम मुंशी ने आजाद भारत के संविधान में राजद्रोह की धाराओं को शामिल नहीं होने दिया‚ लेकिन संविधान के पहले ही संशोधन में साल १९५१ में इसे न केवल शामिल किया गया बल्कि और कड़ा बना दिया गया। फिर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में ये संोय अपराध बना। यानी बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार किए जाने की छूट। देश की सबसे पुरानी पार्टी ने साल २०१९ के अपने चुनावी घोषणापत्र में राजद्रोह के कानून को खत्म करना तय किया था। एक पत्रकार के खिलाफ भड़काऊ और गलत रिपोटिग के लिए धारा १२४ ए‚ २९५ ए‚ १५३ ए सहित आईटी कानून की धारा ६७ में हाल ही जहां मुकदमा दर्ज हुआ है‚ वहां इसी पार्टी की सरकार है। भारतीय दंड संहिता की धारा १२४ ए यानी राजद्रोह को अपराध मानने वाली इस धारा पर ये सवाल तो बड़ा है कि राज तो देश में जनता का है‚ लोक का है‚ तो फिर अब कौन किनसे खिलाफ बोल रहा है‚ किसे चुनौती दे रहा हैॽ हालांकि अमेरिका और नार्डिक सहित दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में देश के खिलाफ साजिश या उसकी अस्मिता पर खतरों के खिलाफ इस तरह के कानून हैं। मगर उनका बेहद खास मौकों पर ही इस्तेमाल होता रहा है।
हमारे यहां इन अपराधों में जितने मामले दर्ज होते हैं उनमें से ज्यादातर खारिज हो जाते हैं। ऐेसे ही दो तेलुगू चैनलों पर हुए मुकदमे पर जस्टिस चंद्रचूड़ की कही ये बात अहम है कि ‘राजद्रोह को साफ तौर पर परिभाषित करने की जरूरत है। देश में गैरकानूनी गतिविधियों‚ सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के अपराधों पर अलग से कानून हैं ही तो इस कानून का अपना अलग दायरा साफ किया ही जाना चाहिए।’ साल २०१४ के बाद से भारत सरकार ने १४८६ नाकारा कानूनों को दफन कर दिया है जो या तो औपनिवेशिक काल के अवशेष थे या मौजूदा दौर में गैरजरूरी थे‚ लेकिन कानूनों के मामले में अभी और सफाई की दरकार है। हर किस्म के विरोध या गलत सूचनाओं‚ उकसावे या रिपोर्ट को राजद्रोह करार दे देना नीयत पर सवाल खड़े करता है। इंसाफ के लिए बने कानून जिन हाथों की कठपुतली बन रहे हैं वो संविधान का गला घोंटने में जरा भी नहीं हिचक रहे। पुलिस तंत्र को सत्ता तंत्र ऐसे काबू में किए हैं कि कानून की हिफाजत में उसकी नाकामी अपराधियों की बजाय आम लोगों में डर पैदा कर रही है। ये एक राष्ट्र के तौर पर हमारे यानी नागरिक मिजाज़ पर बड़ा सवाल भी है।
लोकतंत्र की रीढ़ तो बहस और तर्क के माहौल के साथ बंधुत्व भाव भी रही है। कानून नागरिक और इंसानियत के हक के लिए हैं‚ भरोसा पैदा करने के लिए हैं‚ लेकिन राजनीति और अपराध का गठजोड़ अगर आज भी हमारी कमजोरी है तो अब फिर से लोकनायकों के उभरने का दौर है। राजनीतिक पैंतरेबाजी के बीच ही नागरिक समाज की खुद्दारी और समझदारी की बुआई होती रहे‚ ये जिम्मा मिलकर उठाया जाए तो बेहतर। राजनीति को लोकनीति कहकर पुकारने लगें तो हमारी याददाश्त में ये भी बाकी रहेगा कि शासन जनता का ही है‚ हमारा अपना ही है। संविधान हमने खुद ही को सौंपा है। हमने अपनी ही आवाज और हकों की मजबूती के लिए अपने ही बीच से लोगों को चुना है। अगर हम चुनाव के समय किरदारों को अपने नफे नुकसान से तोल मोल रहे हैं तो फिर वो भी वक्त आने पर इसी तरह से पेश आएंगे।
फिलहाल जरूरी ये है कि हम कानूनों के गलत इस्तेमाल के खिलाफ मुखर हों और इंसाफ की पैरोकारी करें। सत्ता चालाकी का पर्याय हो गई है‚ अपनी अंतरात्मा को मार कर‚ लुभाने का रंगमंच बन गई है। तकनीक ने इसे और सहूलियत दे दी है। नये दौर के मुताबिक नये कानून अमल में आ रहे हैं लेकिन ढर्रा नहीं बदल पा रहे हम। जुर्म को कुचलने के लिए तो सख्ती ही चाहिए‚ लेकिन वैचारिक विरोध के लिए बेहतर बहस का माहौल ही मुफीद है। राजद्रोह से बड़ा खतरा फिलहाल आत्मद्रोह का है। देश की सुरक्षा के लिए बहस पर पत्रकारों और विद्यार्थियों की घेरेबंदी की बजाय देश को बांटने की संगठित सोच के फैलाव पर सख्ती की जरूरत है इस वक्त।







