पड़़ोसी देश पाकिस्तान में कुछ दिनों से सरकार और विपक्ष के बीच चल रहे सांप–सीढ़ी के खेल का पटाक्षेप हो गया। इमरान खान अविश्वास प्रस्ताव के जरिये सत्ता से बाहर हो गए और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ देश के २३वें प्रधानमंत्री बन गए। शहबाज के सत्ता में आने का एक संदेश यह भी है कि पाकिस्तानी राजनीति में भी वंशवाद की परंपरा बनी हुई है। भाई के प्रधानमंत्री बनने के बाद लंदन में निर्वासित नवाज शरीफ के स्वदेश लौटने की संभावना है। प्रधानमंत्री का पद संभालते ही शहबाज ने कश्मीर का झंडा लहराते हुए कहा कि वह भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं‚ लेकिन कश्मीर मुद्दे के समाधान के बिना इसे हासिल नहीं किया जा सकता। इससे पता चलता है कि शहबाज की अनैतिक गठबंधन वाली सरकार का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा क्या है और सरकार के अनिश्चित भविष्य का भी संकेत मिलता है। भारत एक जिम्मेदार और उभरती हुई महाशक्ति है। वह पाकिस्तान सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबध रखने का पक्षधर है। इसके लिए इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता अनिवार्य शर्त है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि आतंकवाद इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पड़ोसी समकक्ष को शांति का पैगाम देते हुए बधाई दी और कहा कि भारत अपने पड़ोस में शांति और स्थिरता चाहता है जो आतंकवाद से मुक्त हो। प्रधानमंत्री शहबाज की वास्तविक चुनौतियां बाहरी नहीं घरेलू मोर्चे पर है। उनकी पार्टी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बीच हमेशा राजनीतिक शत्रुता रही है। इमरान खान को सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्ष एक मंच पर आया है। शहबाज की सरकार को जनादेश नहीं मिला है। जाहिर है यह एक अपवित्र गठबंधन है और इनके बीच एकता कब तक कायम रहेगी कहना मुश्किल है। इमरान की सरकार महंगाई‚ बेरोजगारी‚ विदेशी कर्ज और अराजकता का जो माहौल विरासत में छोड़ गई है उससे लड़ना नई सरकार की बड़ी चुनौती है। इमरान ने घरेलू समस्याओं के लिए विदेशी शक्तियों को जिम्मेदार ठहराया था। हर निरंकुश शासक अपनी राजनीतिक अकुशलता के लिए विदेशी ताकतों का राग अलापता है। हालांकि सेना ने इस आरोप को खारिज कर दिया है। देखने वाली बात होगी कि देश को अराजकता और अस्थिरता के भंवर से निकलने तक विपक्षी एकता बनी रहती है या बिखर जाती है।







