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जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए इस बार चुनाव हारे उमेश कुशवाहा

UB India News by UB India News
January 11, 2021
in खास खबर, जदयू, पटना
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जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए इस बार चुनाव हारे उमेश कुशवाहा
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रामचंद्र प्रसाद सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के 14वें दिन जनता दल यूनाईटेड ने प्रदेश अध्यक्ष की कमान महनार (वैशाली) के पूर्व विधायक उमेश कुशवाहा को सौंप दी। बिहार की नई सरकार के मंत्रिमंडल में JDU का लव-कुश फॉर्मूला भले नहीं चल सका हो, लेकिन पार्टी ने कुर्मी जाति के रामचंद्र सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के बाद कोइरी जाति के उमेश कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष बनाते हुए अपनी लाइन स्पष्ट कर दी है। इस पद के लिए फॉरवर्ड से पूर्व मंत्री नीरज कुमार का पहले नाम चल रहा था और फिर पूर्व मंत्री संजय झा का भी नाम जुड़ गया। प्रदेश कार्यसमिति की तारीख से कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अचानक हथुआ से इस बार हारे प्रत्याशी रामसेवक सिंह से मुलाकात की खबर का खुलासा करते हुए भास्कर ने प्रदेश अध्यक्ष पद की इनकी दावेदारी सामने लाई थी। रविवार को प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान रामसेवक मंचासीन भी रहे, लेकिन इसी बीच खबर आई कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मन बदल लिया है। मन के बदलाव में टाइटल की भी भूमिका थी, क्योंकि रामचंद्र और रामसेवक दोनों ‘सिंह’ वाले थे, जबकि चेहरा साफ तौर पर कुशवाहा का सामने लाना था और उमेश सिंह कुशवाहा इनका नाम है।

फिर हुआ साफ: लव-कुश का समीकरण जदयू का आधार
नीतीश कुमार की पार्टी JDU को लव-कुश समीकरण के लिए ही शुरू में जाना जाता था। JDU नाम दिए जाने से पहले समता पार्टी की स्थापना के समय ही जॉर्ज फर्नांडीस ने कुर्मी जाति के नीतीश कुमार का साथ देने के लिए कोइरी जाति के शकुनी चौधरी को आगे किया था। कोइरी को कुशवाहा भी कहा जाता है। ऐसे में ‘कुश’ नाम इससे निकल गया तो कुर्मी को ‘लव’ कहा गया। इस तरह JDU की शुरुआत से ही लव-कुश समीकरण की चर्चा हमेशा रही है। पार्टी में हर स्तर पर इस समीकरण का ख्याल रखा जाता है।

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रामसेवक क्यों बैठे रह गए, यह जानना भी बेहद रोचक
गोपालगंज के उचकागांव प्रखंड के असनंद टोला निवासी रामसेवक सिंह वहां बलेसरा पंचायत के मुखिया रहे। इसके बाद नीतीश कुमार ने उन्हें MLA का टिकट दिया। जीते और लगातार चार बार। मंत्री बने। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का गांव फुलवरिया और ससुराल सेलारकला गांव इन्हीं के विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। चार बार से RJD सारी ताकत झोंककर हार रहा था, लेकिन इस बार रामसेवक हार गए। पिछली सरकार में मंत्री रहे रामसेवक पहले दो बार सत्तारूढ़ दल (JDU) ने मुख्य सचेतक भी रहे हैं। अपनी सीट से हारने के बाद भी नीतीश कुमार ने वफादार जानकर इन्हें बुलाया था। लेकिन, बताया जा रहा है कि रामसेवक के बैठे रह जाने का कारण उनका उपनाम भी है। उमेश की एंट्री के साथ कुशवाहा टाइटल से साफ मैसेज जाएगा कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) के उपेंद्र कुशवाहा आएं या नहीं, मगर JDU ने अपने अंदर भी कुशवाहा को किनारे नहीं छोड़ा है।

छवि पर सवाल तो था, मगर जवाब है इनका शपथपत्र
जहां तक छवि का सवाल है तो रामसेवक सिंह का चुनाव पूर्व और चुनाव के बाद कुछ आपराधिक मामलों में नाम आया था, हालांकि शपथपत्र में उन्होंने खुद को बेदाग बताया था। दूसरी तरफ, उमेश कुशवाहा का चुनाव के दौरान विरोध भी हुआ था और वह RLSP नेता मनीष सहनी की हत्या के 11 आरोपियों में से एक रहे हैं। उमेश कुशवाहा ने शपथ पत्र में राजनीतिक विद्वेष से फंसाए जाने और इस केस में कोर्ट से आरोपमुक्त होने की जानकारी भी दी थी।

धार्मिक हो गए नीरज, अब संजय देश की रेस में
प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए भूमिहार जाति से आने वाले पूर्व मंत्री नीरज कुमार का नाम पहले आगे था, लेकिन उनका पत्ता रामसेवक सिंह की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद ही कट गया था। इसके साथ ही यह तय हो गया था कि पार्टी किसी कुशवाहा को ही प्रदेश की बागडोर देगी। नीरज को इस बीच धार्मिक न्यास बोर्ड का सदस्य बना दिया गया। अहम जिम्मेदारी के लिए पूर्व मंत्री संजय झा का नाम था और प्रदेश अध्यक्ष की रेस में भी थे। अब इनके लिए दो विकल्प हैं। RCP सिंह के अध्यक्ष बनने से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की खाली कुर्सी संजय झा को मिल सकती है या फिर मंत्रिमंडल विस्तार में इन्हें मौका देना दूसरी प्राथमिकता होगी। संजय ने डोनाल्ड ट्रंप की तर्ज पर पार्टी के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से देश की सबसे बड़ी वर्चुअल रैली करा संगठन में मजबूत पकड़ रखी है, इसलिए दिल्ली की रेस में उन्हें आगे कहा जा रहा है।

दादा वशिष्ठ नारायण अब चाह भी रहे थे आराम
1995 से 1998 से समता पार्टी के बिहार अध्यक्ष रह चुके जेपी सेनानी वशिष्ठ नारायण सिंह 2010 से JDU के प्रदेश अध्यक्ष थे। 2019 में तीसरी बार अध्यक्ष चुने जाने के बाद 27 सितंबर 2020 को उन्होंने डॉ. अशोक कुमार चौधरी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पार्टी की जिम्मेदारी दी थी। देश की आजादी के दो महीने बाद बक्सर में जन्म लेने वाले राज्यसभा सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ‘दादा’ अपनी उम्र और तबीयत के आधार पर कई बार पार्टी की मुख्य धारा के कामकाज से आराम चाह रहे थे।

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