हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा की युवा इकाई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जीतन राम मांझी ने कहा कि नशाबंदी का कानून अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके पालन में कहीं-कहीं पुलिस स्तर पर दिक्कतें आ रही हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और बिहार सरकार से इस व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की अपील की और गुजरात मॉडल की तरह बिहार में भी शराबबंदी लागू करने की मांग की. मांझी ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी शराबबंदी लागू है, लेकिन कुछ लोगों को परमिट और तय नियमों के तहत शराब की अनुमति मिलती है.
दरअसल जीतन राम मांझी का तर्क है कि बिहार में भी इसी तरह की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए. यानी कानून के साथ ऐसी व्यवस्था हो जिसमें तय नियमों के तहत सीमित छूट की गुंजाइश हो और अवैध शराब के कारोबार पर भी रोक लग सके. मांझी लंबे समय से बिहार की मौजूदा शराबबंदी व्यवस्था में बदलाव की मांग करते रहे हैं.
पुरानी है मांझी की यह मांग
शराबबंदी में बदलाव को लेकर मांझी पहली बार आवाज नहीं उठा रहे हैं. इससे पहले 2022 में भी उन्होंने बिहार में गुजरात के परमिट मॉडल को लागू करने की मांग की थी. 2023 में गुजरात के GIFT City में शराब सेवन को लेकर दी गई सीमित छूट के बाद भी मांझी ने बिहार में इसी तरह की व्यवस्था लागू करने की वकालत की थी. मांझी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि सख्त शराबबंदी के कारण अवैध शराब का कारोबार बढ़ता है और इसका नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है. उनका आरोप रहा है कि कानून का इस्तेमाल कई बार गरीब और कमजोर लोगों के खिलाफ ज्यादा होता है.
हालांकि, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी शराबबंदी में किसी तरह की छूट देने से इनकार कर चुके हैं. अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने साफ कहा था कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगी और इसे हटाने या इसमें किसी तरह की छूट देने का सवाल नहीं है. उन्होंने अवैध और जहरीली शराब के कारोबार पर सख्त कार्रवाई की बात भी कही थी. यानी मांझी की मांग और सरकार के मौजूदा रुख के बीच अंतर साफ दिखाई दे रहा है.
NCAER की रिपोर्ट ने बहस को फिर किया तेज
इसी बीच नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च यानी NCAER के एक हालिया शोध पत्र ने बिहार की शराबबंदी नीति को लेकर बहस को नया आधार दे दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि शराबबंदी अपने घोषित सामाजिक लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई है. शोध में अवैध शराब और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल बढ़ने की बात भी कही गई है. रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि शराबबंदी हटाने से राज्य को अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है और शराबबंदी लागू करने पर होने वाला सरकारी खर्च भी कम हो सकता है.
आगे क्या होगा, सरकार मांझी की सुनेगी या नहीं ?
बहरहाल, शराबबंदी को लेकर बिहार में अब बहस सिर्फ सामाजिक मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानून व्यवस्था और अर्थव्यवस्था का सवाल भी जुड़ गया है. एक तरफ जीतन राम मांझी गुजरात मॉडल की तर्ज पर बदलाव की मांग कर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पूर्ण शराबबंदी जारी रखने का स्पष्ट संकेत दे चुके हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार मांझी की मांग और शराबबंदी के मौजूदा मॉडल पर उठ रहे सवालों को किस तरह देखती है.







