प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह ट्रेन जींद से सोनीपत के बीच चली। इसके साथ ही हाइड्रोजन फ्यूल से चलने वाली ट्रेन शुरू करने वाला भारत दुनिया का पांचवां देश बन गया है। इससे पहले जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और चीन में ही हाइड्रोजन ट्रेनें चल रही हैं।
10 कोच वाली यह ट्रेन जींद-सोनीपत रूट पर 14 स्टेशनों के बीच अधिकतम 75 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। इसका किराया 5 से 25 रुपए के बीच रखा गया है। ट्रेन 89 किलोमीटर का सफर करीब 2 घंटे में पूरा करेगी।
मोदी कुछ देर में जींद में जनसभा को भी संबोधित करेंगे। वह मंच पर पहुंच गए हैं। इस दौरान वे एलिवेटेड रेलवे ट्रैक, दो मेडिकल कॉलेजों समेत कुल 9 प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन और शिलान्यास भी करेंगे।
हाइड्रोजन ट्रेन में होंगे 10 कोच
बता दें कि जर्मनी व्यावसायिक हाइड्रोजन यात्री ट्रेनों को शुरू करने वाला पहला देश बन चुका है, जबकि फ्रांस, इटली, चीन और जापान प्रायोगिक परियोजनाओं या सीमित परिचालन पर काम कर रहे हैं।
इन देशों की ट्रेनों में आमतौर पर दो से चार डिब्बे होते हैं और ये मुख्य रूप से क्षेत्रीय यात्री सेवाओं के लिए ही बनाई गई हैं, लेकिन जींद-सोनीपत मार्ग पर संचालित होने वाली देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन में 10 कोच होंगे, जिनमें 2600 यात्रियों को एक साथ लाने-ले जाने की व्यवस्था होगी।
सुरक्षा की मजबूत ढाल
- हाइड्रोजन रिसाव की रियल टाइम निगरानी।
- आग, धुआं और तापमान का स्वत: पता लगाने की व्यवस्था।
- स्वचालित शटडाउन सिस्टम।
- जींद में 3000 किलोग्राम क्षमता का हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन।
क्यों खास है यह ट्रेन
- देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन।
- ट्रेन के भीतर ही बनती है बिजली।
- केवल जल वाष्प होता है उत्सर्जन।
- लगभग शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक।
जानें हाइड्रोजन कैसे बनती है?
पानी (H₂O) हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना है। जब पानी को बिजली के जरिए एक खास प्रोसेस से दो हिस्सों- हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जाता है। इस तरह हाइड्रोजन बनती है।
हाइड्रोजन ट्रेन को ऐसे समझिए, जैसे ट्रेन के अंदर ही एक छोटा-सा बिजलीघर लगा हो। इसमें हाइड्रोजन गैस से बिजली बनाई जाती है और उसी बिजली से ट्रेन चलती है।
रेल मंत्री बोले- हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला पांचवां देश बना भारत
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा- आज का दिन ऐतिहासिक है। भारत ने हाइड्रोजन तकनीक के क्षेत्र में बड़ा संकल्प लिया है और इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। देश अब उन पांच देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का संचालन हो रहा है। जींद में स्थापित हाइड्रोजन प्लांट में हाइड्रोजन से बिजली तैयार की जाती है, जिससे यह ट्रेन संचालित होती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे किसी प्रकार का धुआं या प्रदूषण नहीं फैलता। इसके उत्सर्जन के रूप में केवल पानी की बूंदें और जलवाष्प निकलती हैं, जिससे यह पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल तकनीक मानी जाती है।
हाइड्रोजन ट्रेन के लिए जींद-सोनीपत रूट क्यों चुना?
इसकी 2 वजह हैं। पहली- इस रूट पर ट्रैफिक कम है। रोजाना 8 ट्रेनें चलती हैं। दूसरी- दिल्ली से नजदीक (जींद 145 किमी दूर) है। रेलवे निगरानी के लिए तकनीकी सहायता मुहैया करना और पायलट ट्रायल करना आसान हुआ। यह नॉन इलेक्ट्रिफाइड वाला ब्रॉड-गेज मार्ग है ।
क्या भारत के अन्य रूटों पर भी ऐसी ट्रेनें चलेंगी?
हां, सरकार की “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” योजना के तहत देश के अलग-अलग ऐतिहासिक (हेरिटेज) और पहाड़ी रूटों पर ऐसी 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना है। माना जा रहा है कि जिन रूट्स पर बिजली की लाइन खींचना मुश्किल है, वहां ये ट्रेन कामयाब होगी।
एक किलो हाइड्रोजन से ट्रेन कितनी दूर चलती है?
भारतीय रेल ने अभी इसके आंकड़े जारी नहीं किए हैं। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ट्रेन रोजाना दो चक्कर लगाएगी, जिसमें 356 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी और अनुमानित 300 किलोग्राम हाइड्रोजन की खपत होगी। इस हिसाब से ट्रेन 1 किलो हाइड्रोजन में करीब 1.2 किमी सफर करेगी।
लोको पायलट के बारे में जानिए

राजेश कुमार, जींद मुख्यालय में तैनात लोको पायलट (पैसेंजर) हैं। उन्हें भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन की जिम्मेदारी मिली है।
राजेश कुमार ने बताया कि हाइड्रोजन ट्रेन पूरी तरह नई तकनीक पर आधारित है। इसमें पारंपरिक ट्रेनों की तुलना में अधिक पावर है, यह साउंड प्रूफ है और इससे पर्यावरण में किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता। इसकी पिक-अप भी काफी बेहतर है, जिससे ट्रेन का संचालन अधिक सुगम और प्रभावी होता है।
उन्होंने बताया कि लोको पायलट का यात्रियों से सीधे संवाद नहीं होता। यदि किसी यात्री को सहायता की जरूरत होती है तो लोको पायलट ट्रेन मैनेजर से संपर्क करता है। इसके बाद ट्रेन मैनेजर पब्लिक एड्रेस सिस्टम के जरिए यात्रियों तक सूचना पहुंचाता है और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
राजेश कुमार ने बताया कि इस ट्रेन में हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाया गया है। फ्यूल सेल में करीब 8.5 बार के दबाव से हाइड्रोजन गैस भेजी जाती है, जबकि दूसरी ओर से ऑक्सीजन प्रवेश करती है। दोनों के बीच होने वाली रासायनिक प्रक्रिया से बिजली, जलवाष्प (भाप) और पानी उत्पन्न होते हैं। बिजली ट्रेन को चलाने का काम करती है, जलवाष्प वातावरण में निकल जाती है और पानी नीचे निकल जाता है। यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को पर्यावरण के अनुकूल और शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) तकनीक वाली ट्रेन माना जाता है।
ट्रेन के असिस्टेंट लोको पायलट के बारे में जानिए

हाइड्रोजन ट्रेन को गगनदीप सिंह चलाएंगे। वह जींद मुख्यालय में तैनात सीनियर असिस्टेंट लोको पायलट हैं। उन्हें भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है।
गगनदीप सिंह ने बताया कि चेन्नई से आए एक्सपर्ट्स ने इसकी पूरी तकनीक और संचालन प्रक्रिया की जानकारी दी। यह करीब 3200 हॉर्सपावर की अत्याधुनिक ट्रेन है। इसमें आठ ट्रैवल (यात्री) कोच और दो पावर कार हैं। एक पावर कार आगे और दूसरी पीछे लगी है, जिससे ट्रेन को आवश्यक शक्ति मिलती है।
इस ट्रेन में आधुनिक सुरक्षा सुविधाएं दी गई हैं। आग लगने की स्थिति से निपटने के लिए ऑटोमैटिक फायर एक्सटिंग्विशिंग सिस्टम लगाया गया है। इसके अलावा करीब 26 सेंसर लगाए गए हैं, जो गर्मी, आग और हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तुरंत पता लगा लेते हैं। सुरक्षा के मामले में यह ट्रेन बेहद उन्नत और विश्वस्तरीय है।
गगनदीप सिंह ने आगे बताया कि यह मेरे लिए बेहद गर्व और खुशी का क्षण है। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का हिस्सा बनना अपने आप में एक अलग अनुभव है। रेलवे ने अत्याधुनिक तकनीक से लैस और बेहद शक्तिशाली ट्रेन तैयार की है, जिसे चलाना हमारे लिए सम्मान की बात है।







