जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जनाधार और प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं विपक्षी दलों द्वारा उन्हें हटाने की मुहिम तेज हो रही है। अभी तक विचारधारा के आधार पर कम और जातीय-गणित के आधार पर ज्यादा राजनीति होती रही है। लोकसभा में 98 सदस्यों वाली कांग्रेस और 37 सदस्यों वाली सपा सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टियां हैं। कांग्रेस का देशव्यापी तो सपा का उत्तर प्रदेश में बड़ा जनाधार है। पिछले लोकसभा चुनावों में सपा-कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मिलकर चुनाव लड़ा और भाजपा को शिकस्त दी। यह भी एक कारण रहा कि भाजपा लोकसभा में पूर्ण बहुमत से पीछे रह गई। उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों से सपा और कांग्रेस, दोनों का मनोबल बढ़ा।
दोनों ने यही धारणा बनाने का प्रयास किया कि भाजपा हिंदुत्ववादी राजनीति कर रही है। वास्तविकता के धरातल पर देखें तो भाजपा हिंदू समाज की सभी जातियों को एकजुट कर रही है। कायदे से सभी दलों को ऐसा करना चाहिए। समाज के सभी तबकों को साथ लेना चाहिए। इसमें यह भी ध्यान रहे कि ऐसा कोई भी प्रयास पार्टी-विचारधारा के अनुरूप होने के साथ ही जमीन पर दिखाई दे और केवल वोट पाने के लिए न हो। भाजपा ने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने से लेकर अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर निर्माण में सक्रियता एवं सहयोग के अलावा शासन एवं विकास में सभी तबकों को साथ लेकर अपने जनाधार को मजबूत किया है। इसके सापेक्ष विपक्ष ने क्या किया?
न तो कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर और न सपा ने प्रदेश स्तर पर सबको साथ लेने का प्रयास किया। कांग्रेस और सपा ने अपनी छवि ऐसी बना ली जैसे वे मुस्लिम-समाज की एकमात्र रहनुमा हों। मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते उन्होंने मुस्लिम समाज को हिंदू समाज से काट कर उनके वोट लेने के ही प्रयास किए, जिससे न केवल मुस्लिमों, वरन हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को भी क्षति पहुंची। कांग्रेस, सपा, बसपा में कोई भी हिंदुओं के हितों का संरक्षण करने को तैयार न थीं। यह वास्तविकता धीरे-धीरे हिंदुओं की विभिन्न जातियों को एक मंच पर ले आई। यदि समाज में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण बढ़ा है तो उसके लिए भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अधिक विपक्षी दलों का अतिशय तुष्टीकरण ही अधिक जिम्मेदार रहा।
अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव हैं। कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दलों को लगता है कि सनातन और हिंदुत्व ही भाजपा का राजनीतिक कवच है तो पहले उस पर ही प्रहार किया जाए। इस कवच पर प्रहार के लिए इन दलों के नेताओं ने स्वयं को सनातनी घोषित करने का अभियान चलाया हुआ है। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी प्रकरण के रूप में उन्हें एक अवसर भी मिल गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी सनातनी इस प्रकरण से आहत हैं, लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव का आकलन इस मामले में कुछ जल्दबाजी भरा है कि उन्होंने यहां तक एलान कर दिया कि ‘अब भाजपा को न चंदा मिलेगा और न वोट।’ एक बड़ी हद तक संभव है कि उनकी दोनों धारणाएं ध्वस्त हो जाएं, क्योंकि हिंदू धर्म में दान को पुण्य माना गया है।
एक सनातनी सामान्यत: दान देकर न तो उसका उल्लेख करता है और न ही उसके उपयोग को लेकर आग्रही होता है। मान्यता भी यही है कि यदि दाएं हाथ से दान दिया जाए तो बाएं हाथ को इसकी भनक न लगे। अतः दान और आस्था में तो कोई कमी आने वाली नहीं। लोग अभी मर्माहत, आक्रोशित हैं। इसलिए वे इस पर कोई राय रखने की मनःस्थिति में नहीं। हिंदू समाज की विशेषता है कि वह अपने समाज की कमियों, बुराइयों को जोर-शोर से उठाता है, लेकिन आपने कभी किसी अन्य वर्ग से अपने समाज की बुराइयों के विरुद्ध कोई आवाज सुनी है? वस्तुतः सेक्युलर दलों में हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग भी उन बुराइयों को ढकने का प्रयत्न करता है और जो लोग उन बुराइयों को रेखांकित करते हैं, उन्हें सांप्रदायिक कह कर अपमानित करता है। वे दल जो स्व-घोषित सेक्युलर हैं और हिंदुओं के विरुद्ध अन्य समुदायों के दमन को भी वाजिब ठहराते आए हैं, क्या वे हिंदुओं के मतों के हकदार हैं भी? हालांकि अब ऐसे दलों को भी लगने लगा है कि हिंदुओं को साथ लिए बिना उनकी दाल नहीं गलने वाली। इसीलिए, उनके नेतागण सनातन की दुहाई देने लगे हैं। सनातन तो सबका स्वागत करता है, लेकिन सनातन को ढाल बना कर राजनीति करना कहीं उन्हें महंगा न पड़े?
उत्तर प्रदेश में सपा सशक्त विपक्षी दल है। यादव-मुस्लिम समीकरण सपा की मजबूती रही है। उत्तर प्रदेश में यादव 11 प्रतिशत और मुस्लिम 21 प्रतिशत हैं। इस आधार पर 2012 में केवल 29 प्रतिशत मतों के सहारे सपा की सरकार बन गई, लेकिन अब मांग उठ रही है कि आगामी विधानसभा चुनावों में सपा किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। सपा के लिए यह काफी दुविधा की स्थिति है। यदि इसे नहीं माना गया और यह मांग जोर पकड़ गई, तो मुस्लिम समाज सपा से खिसक सकता है, क्योंकि 2027 में उसके पास कांग्रेस और बसपा सहित ओवैसी की पार्टी का ‘नया विकल्प’ होगा, जो प्रदेश में काफी सीटों से चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
ओवैसी लगभग 145 मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से अपने प्रत्याशी उतारना चाहते हैं। वहीं, राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दिनों अखिलेश यादव से कृष्ण-जन्मभूमि आंदोलन में सहयोग करने का आह्वान किया। क्या अखिलेश ऐसा कर सकेंगे? क्या उन्हें याद है कि सपा के वैचारिक मार्गदर्शक डा. लोहिया ‘रामायण-मेला’ के जनक थे? डा. लोहिया मानते थे कि जब तक भारत की आस्था प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान शिव में रहेगी, तब तक भारत का कोई बाल-बांका भी नहीं कर सकता। क्या सपा और कांग्रेस इसे दोहरा सकेंगे? क्या वे मुस्लिम हितों का संरक्षण और हिंदू संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता के मोर्चे पर आवश्यक समन्वय का परिचय दे सकेंगे? क्या वे ‘सनातन और सेक्युलरिज्म’ के द्वंद्व से बाहर निकल पाएंगे?







