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डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फैसलों के यूरोप ने बड़ा कदम उठाया………………..

UB India News by UB India News
July 16, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर
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डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फैसलों के यूरोप ने बड़ा कदम उठाया………………..

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दुनिया की दो महाशक्तियों अमेरिका और रूस ने बीते कई दशकों से अलग-अलग देशों के सुरक्षा मानक तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। जहां पश्चिमी देश बड़े स्तर पर अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे हैं तो वहीं पूर्वी देशों की निर्भरता सोवियत संघ और फिर रूस पर रही। हालांकि, अब यह स्थिति बदल रही है। जहां रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते मॉस्को की तरफ से सुरक्षा के लिए हथियारों की आपूर्ति पहले ही मुश्किल में पड़ चुकी है तो वहीं अब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फैसलों के बाद कई देश उससे भी अपनी निर्भरता घटाने की कोशिश में जुटे हैं।

इसी कड़ी में अब यूरोप ने बड़ा कदम उठाया है। यूरोप के नौ देशों के नेताओं ने हाल ही में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ पेरिस में एक बैठक की और यूरोप के अपने एकीकृत एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल गठबंधन को बनाने का एलान किया। अब बुधवार को यूरोपीय संघ (ईयू) और यूक्रेन ने साथ में ड्रोन बनाने के एक समझौते पर भी हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस घोषणा में यूरोप ने वादा किया कि वह अलग-अलग देशों की औद्योगिक क्षमताओं और करीबी सहयोग का सही इस्तेमाल करते हुए वह एक ऐसा रक्षा कवच बनाएगा, जो कि एकीकृत होगा और इसका ढांचा हर किसी को बचाएगा।
हालांकि, अगर करीब से देखा जाए तो सामने आता है कि यूरोप बीते कई वर्षों से रूस के संभावित हमलों से सुरक्षा के लिए विकल्प तलाशने में जुटा था। पहले यूरोप इस सुरक्षा के लिए अमेरिका पर बड़े स्तर पर निर्भर था। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी नीतियों के बाद अब यूरोप ने यूक्रेन के साथ अपनी सुरक्षा की तैयारी शुरू कर दी है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यूरोप और यूक्रेन ने क्या-क्या तैयारियां की हैं और इससे किस तरह से रूस की परेशानी बढ़ सकती है? आइये जानते हैं…

पहले जानें- यूरोप और यूक्रेन के बीच कौन से समझौते हुए हैं?

हाल ही में यूरोप और यूक्रेन के बीच मुख्य रूप से दो प्रमुख रक्षा और रणनीतिक समझौते हुए हैं…

1. साझा मिसाइल रक्षा गठबंधन 

यूक्रेन और नौ अन्य यूरोपीय देशों ने मिलकर यूरोप की सुरक्षा के लिए एक एकीकृत एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल कवच- फ्रेया (FREYJA) और ब्लिकसेम एक्सो (Bliksem EXO) कार्यक्रम विकसित करने का समझौता किया है। इस समझौते के तहत रूस के मिसाइल हमलों का सामना करने के यूक्रेन के अनूठे अनुभव और तकनीक को यूरोपीय रक्षा कंपनियों की फंडिंग, रडार तकनीक और औद्योगिक निर्माण क्षमता के साथ जोड़ा जाएगा। इसका मुख्य लक्ष्य अगले 12 महीनों के अंदर एक कम लागत वाली और बड़े पैमाने पर उत्पादित होने वाली मिसाइल रक्षा प्रणाली तैयार करना है।

2. यूरोपीय संघ-यूक्रेन ड्रोन समझौता
यूक्रेन और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच बड़े पैमाने पर ड्रोन उत्पादन करने के लिए एक नए समझौते पर मुहर लगी है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन द्वारा घोषित इस ड्रोन डील का मकसद यूक्रेन की युद्धक्षेत्र की विशेषज्ञता (ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम में ज्ञान) को यूरोप के बड़े औद्योगिक ढांचे के साथ मिलाना है। यूरोप इस बात को समझ चुका है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका अहम है, इसलिए इस समझौते के जरिए यूक्रेन की तकनीक का उपयोग कर यूरोप सुरक्षित उत्पादन स्थलों पर अपने ड्रोन निर्माण का विस्तार करेगा।

अब जानें- मिसाइल रक्षा कवच बनाने के समझौते में कौन से देश शामिल? 

यूरोप की इस नई मिसाइल कवच योजना, जिसे एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल गठबंधन के जरिए में कुल 10 देश शामिल हैं। इस साझा रक्षा कार्यक्रम का मुख्य मकसद यूरोप को बैलिस्टिक मिसाइलों के खतरों से बचाना है।

कौन-कौन से देश मिसाइल कवच योजना में फिलहाल शामिल नहीं?

1. पोलैंड, बाल्टिक देश और फिनलैंड
यूरोप के यह देश भौगोलिक रूप से रूस के सबसे करीब स्थित हैं। इसके बावजूद यह देश अब तक मिसाइल कवच योजना में शामिल नहीं हुए हैं।

2. अमेरिका
अमेरिका भी इस गठबंधन का औपचारिक सदस्य नहीं है। बताया गया है कि इस गठबंधन का मुख्य लक्ष्य यूरोप के लिए अपनी खुद की स्वदेशी मिसाइल रक्षा क्षमता विकसित करना है। इसका मकसद महंगे अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम पर यूरोप की निर्भरता को कम करना है, जिनकी आपूर्ति मौजूदा समय में सीमित है।

यूरोप को बैलिस्टिक मिसाइल से रक्षा के लिए कदम क्यों उठाना पड़ा?

यूरोप की तरफ से बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (ब्लिक्सेम ईएक्सओ और फ्रेया प्रोग्राम) के लिए अब यह बड़ा कदम उठाना पड़ा है।

1. रूस-यूक्रेन युद्ध से मिली सीख और बढ़ता खतरा
यूक्रेन पर रूस के लगातार बैलिस्टिक मिसाइल हमलों ने यूरोप की कमजोर रक्षा प्रणाली की पोल खोल दी है। युद्ध के मैदान में मनमाफिक सफलता न मिलने के कारण रूस अब बैलिस्टिक मिसाइलों (जैसे इस्कंदर, किंजल और नई ओरेशनिक-क्लास मिसाइलें) और भारी ड्रोन हमलों पर ज्यादा निर्भर हो गया है, जिसे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने पुतिन का अंतिम दांव कहा है। इन लगातार हमलों ने बाकी यूरोप को भी मॉस्को के दायरा बढ़ाने के इरादों को लेकर सतर्क कर दिया है।

2. मौजूदा प्रणालियों की कमी और भारी लागत
मौजूदा समय में यूरोप अमेरिकी और फ्रांसीसी-इतालवी सैंप/टी एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भर है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा सामग्री बेहद महंगी है और उनकी उत्पादन क्षमता दुनिया भर की मांग को पूरा नहीं कर पा रही है। साथ ही, यूक्रेन में युद्ध के दौरान फ्रांसीसी सैंप/टी मिसाइलों की भी काफी कमी देखी गई है।

3. अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना
यूरोप को यह अहसास हो गया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से वॉशिंगटन (अमेरिका) की सद्भावना पर निर्भर है। अमेरिका को फिलहाल ईरान से युद्ध के चलते अपनी सेनाओं, सैन्य ठिकानों और अन्य सहयोगियों, जैसे- पश्चिम एशिया के देशों को भी मिसाइलें देनी होती हैं। इससे हथियारों की आपूर्ति में अड़चनें आती हैं।

इतना ही नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यूरोप को अपने पैरों पर खड़ा होने और सुरक्षा के लिए रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए खरी-खरी सुनाते रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यूरोप को सुरक्षा देने के एवज में इसकी कीमत वसूलने तक की बात कही थी। इसलिए यूरोप अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता विकसित करके सैन्य रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनना चाहता है।

4. बैलिस्टिक मिसाइलों की जटिल प्रकृति
ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की तुलना में बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकना तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा कठिन होता है। इसके अलावा, मध्यम और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें अपने उड़ान के मध्य चरण में पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर- अंतरिक्ष में सफर करती हैं। यूरोप के पास वर्तमान में इस ऊपरी-परत के खतरों से निपटने के लिए कोई मजबूत रक्षा कवच नहीं था।

5. कम लागत में बड़े पैमाने पर उत्पादन की जरूरत
इस नए गठबंधन का लक्ष्य मौजूदा अमेरिकी प्रणालियों का एक कम लागत वाला विकल्प विकसित करना है। वे 12 महीनों के भीतर एक ऐसी प्रणाली तैयार करना चाहते हैं जिसका बड़े पैमाने पर निर्माण किया जा सके।

संक्षेप में कहा जाए तो रूस के आक्रामक रवैये, बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने में आने वाली तकनीकी चुनौतियों और अमेरिकी हथियारों की सीमित आपूर्ति ने यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट होने और एक स्वतंत्र, उन्नत तथा सस्ता मिसाइल कवच बनाने के लिए मजबूर किया है।

रूस की मिसाइलों से बचने के लिए यूरोप की अब तक क्या थी तैयारी?

रूस के हमलों से बचने के लिए यूरोप की अब तक की तैयारी मुख्य रूप से विदेशी, महंगी और वायुमंडल के निचले हिस्से में काम करने वाली रक्षा प्रणालियों पर निर्भर रही है।

अमेरिकी पैट्रियट और सैंप/टी पर निर्भरता: अब तक यूरोप मिसाइल रक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम और फ्रांसीसी-इतालवी सैंप/टी एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल करता आया है। हालांकि, इन प्रणालियों की सबसे बड़ी खामी इनकी लागत और उपलब्धता है। पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों की कीमत लाखों डॉलर प्रति पीस है, और मौजूदा में इनकी उत्पादन क्षमता दुनिया भर की भारी मांग को पूरा करने में असमर्थ है।

यूरोपियन स्काई शील्ड इनिशिएटिव: रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद 2022 में जर्मनी के नेतृत्व में यूरोपियन स्काई शील्ड इनीशिएटिव की शुरुआत की गई थी। इसका मकसद अलग-अलग यूरोपीय देशों द्वारा एक साथ मिलकर मौजूदा रक्षा प्रणालियों की खरीद करना था। लेकिन इस पहल की आलोचना इस बात पर हुई कि इसमें मुख्य रूप से अमेरिकी पैट्रियट और इस्राइली एरो 3 सिस्टम खरीदे जा रहे थे, जिससे यूरोप अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता विकसित नहीं कर पा रहा था। इस पहल की आलोचना फ्रांस ने ही की थी।

3. ऊपरी वायुमंडल में रक्षा की कमी: यूरोप के मौजूदा रक्षा प्रणालियां सिर्फ वायुमंडल की निचली परतों के अंदर ही मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम हैं। यूरोप के पास अब तक मध्यम और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों (जैसे रूस की नई ओरेशनिक-क्लास) को पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर (अंतरिक्ष में) रोकने के लिए कोई अपनी स्वदेशी प्रणाली नहीं थी। ऐसे में यूक्रेन और नौ देशों का एक बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कवच बनाने का समझौता सुरक्षा हासिल करने के लिहाज से अहम है।

कैसे काम करेगी यूरोप की मिसाइल कवच योजना?

यूरोप की यह नई मिसाइल कवच योजना एक बहु-स्तरीय, उन्नत और स्वदेशी प्रणाली के रूप में काम करेगी।

अंतरिक्ष में मिसाइलों को नष्ट करना
यह प्रणाली मुख्य रूप से पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर (अंतरिक्ष में) काम करेगी। जब मध्यम और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें अपनी उड़ान के मध्य चरण में होती हैं, तो यह ऊपरी पर का रक्षक उन्हें वहीं नष्ट कर देगा।

‘हिट-टू-किल’ तकनीक
दुश्मन की मिसाइल को उड़ाने के लिए यह रक्षा प्रणाली किसी पारंपरिक विस्फोटक का इस्तेमाल नहीं करेगी। इसके बजाय, यह ‘हिट-टू-किल’ तकनीक पर काम करेगी, जिसका मतलब है कि यह बहुत तेज गति से सीधे दुश्मन की मिसाइल से टकराकर उसे नष्ट कर देगी।

पांच कंपनियों का तकनीकी तालमेल
जब कोई दुश्मन देश मिसाइल दागेगा, तो इस गठबंधन में शामिल पांच रक्षा कंपनियों की तकनीकें एक साथ मिलकर यह काम करेंगी।

नाटो और मौजूदा सिस्टम के साथ एकीकरण
यह नई प्रणाली अमेरिका की पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसी मौजूदा प्रणालियों की जगह नहीं लेगी, बल्कि उनके साथ मिलकर काम करेगी। निचली परत (वायुमंडल के अंदर) की रक्षा मौजूदा सिस्टम करेंगे, जबकि ऊपरी परत की रक्षा ब्लिकसेम एक्सो करेगा। इसे नाटो के इंटीग्रेटेड एयर एंड मिसाइल डिफेंस (आईएएमडी) और यूरोपियन स्काई शील्ड इनिशिएटिव (ईएसएसआई) के साथ पूरी तरह से जोड़ा जाएगा।

यूक्रेन का अनुभव और बड़े पैमाने पर उत्पादन (फ्रेया)
इस पूरी प्रणाली को कम समय और कम लागत में बनाने के लिए यूक्रेन के ‘फ्रेया’ मिसाइल प्रोग्राम के घटकों और उसके युद्ध के अनुभव को यूरोपीय देशों के रडार, फंडिंग और औद्योगिक निर्माण क्षमता के साथ जोड़ा जाएगा। इसका लक्ष्य 12 महीनों के भीतर एक ऐसी प्रणाली तैयार करना है जिसका बड़े पैमाने पर निर्माण किया जा सके।

यूरोपीय संघ-यूक्रेन के बीच ड्रोन को लेकर क्या समझौता हुआ?

यूरोपीय संघ और यूक्रेन के बीच बुधवार को एक रणनीतिक ड्रोन समझौता हुआ है। इसका मकसद यूक्रेन की युद्धक्षेत्र की विशेषज्ञता और यूरोपीय संघ (ईयू) की विशाल औद्योगिक उत्पादन क्षमता को एक साथ मिलाना है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कीव की अपनी यात्रा के दौरान इस समझौते की घोषणा की। मिसाइल कवच समझौते और ड्रोन समझौते के बीच एक सबसे बड़ा फर्क यह है कि जहां मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए अब तक नौ देश ही सामने आए हैं, वहीं ड्रोन समझौता पूरे यूरोपीय संघ के 27 देशों और यूक्रेन के बीच हुआ है।

तकनीक और जमीनी अनुभव साझा होगा: 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से ही कीव ने काफी उन्नत ड्रोन उद्योग विकसित किया है। समझौते के तहत ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम को संचालित करने के यूक्रेन के इस जबरदस्त व्यावहारिक जानकारी का फायदा अब पूरा यूरोप उठा सकेगा।

सुरक्षित और बड़े पैमाने पर निर्माण: यूक्रेन के पास तकनीक है, लेकिन युद्ध की वजह से वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन करना जोखिम भरा है। इसलिए यूरोपीय संघ इस समझौते के जरिए यूक्रेन को अपनी विशाल तकनीकी और औद्योगिक क्षमता के साथ-साथ ड्रोन निर्माण के लिए सुरक्षित उत्पादन स्थल देना सुनिश्चित किया है।

यूरोप के लिए साझा सुरक्षा: वॉन डेर लेयेन ने इस बात पर जोर दिया कि यूरोप के कई सदस्य देशों को भी ड्रोन घुसपैठ और हवाई खतरों का सामना करना पड़ा है। इसलिए दोनों पक्ष अपनी ताकतों को मिलाकर इन नई चुनौतियों का सामना करेंगे। व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह समझौता यूरोप की उस नई रक्षा रणनीति का एक अहम हिस्सा है, जिसमें पारंपरिक हथियारों, जैसे- टैंक या तोप के साथ-साथ आधुनिक युद्ध के लिए एआई-सक्षम ड्रोन्स पर भारी निवेश किया जा रहा है।

यूरोप के यूक्रेन से इन समझौतों का रूस पर क्या असर?

रूसी नेतृत्व में बौखलाहट और जवाबी हमलों की धमकी
इन समझौतों ने रूस को स्पष्ट रूप से उकसाया है। रूसी राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने इस यूरोपीय गठबंधन को युद्ध भड़काने वालों और भ्रमित देशों का गुट करार दिया है। वहीं, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए धमकी दी है कि रूसी क्षेत्र, खासकर तेल रिफाइनरियों और ठिकानों पर होने वाले किसी भी हमले का जवाब वह कई गुना ज्यादा ताकतवर हमलों से देंगे।

बेअसर हो सकता है रूस का अंतिम दांव- बैलिस्टिक मिसाइलें

युद्ध के मैदान में रूस को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली है, जिसके बाद उसने यूक्रेन के शहरों और बुनियादी ढांचों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने को अपना अंतिम दांव बना लिया है, ताकि युद्ध को खींचा जा सके। लेकिन नए यूरोपीय मिसाइल कवच- फ्रेया और ब्लिंकसेम एक्सो के बन जाने से रूस की यह रणनीति काफी हद तक बेअसर होने का खतरा पैदा हो गया है। इससे उसकी मिसाइल हमलों की ताकत पर प्रभाव पड़ सकता है।

रूस के अंदर और अधिक तबाही, ड्रोन उत्पादन पर असर 
यूरोपीय संघ की विशाल औद्योगिक क्षमता के साथ मिलकर यूक्रेन द्वारा बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाने के समझौते से रूस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अटलांटिक काउंसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, मौजूदा समय में ही युद्ध के मैदान में रूस के कुल नुकसान का तीन-चौथाई (75% से ज्यादा) हिस्सा ड्रोनों के कारण हुआ है।

यूक्रेनी समुद्री ड्रोनों ने पहले ही रूसी ब्लैक सी फ्लीट को कब्जे वाले क्रीमिया से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। हाल ही में यूक्रेन ने आठ दिनों के अंदर अजोव सागर में 105 रूसी जहाजों- टैंकरों, कार्गो जहाजों और फेरी पर सफल हमले किए हैं, जिससे क्रीमिया में भारी ईंधन संकट पैदा हो गया है। स्वदेशी ड्रोनों के सहारे यूक्रेन अब सीधे रूस के अंदरूनी हिस्सों में स्थित क्रेमलिन की वॉर-मशीनों और रणनीतिक बॉम्बर बेड़े पर भारी बमबारी कर रहा है, जो आगे और तेज होगी।

तकनीकी दौड़ में रूस का पिछड़ना
इन समझौतों ने यह भी साफ कर दिया है कि रूस नवाचार में पिछड़ रहा है। यूं तो रूस युद्ध के मैदान में यूक्रेन की ड्रोन रणनीतियों की नकल करने की कोशिश करता है, लेकिन रूस की सैन्य नौकरशाही और युद्ध में जुड़े होने की वजह से वह यूक्रेन और यूरोप के स्टार्ट-अप आधारित रक्षा क्षेत्र जितनी तेजी से नई तकनीकें विकसित नहीं कर पा रहा है।

कूटनीतिक चेतावनी और आर्थिक नाकेबंदी
इन समझौतों ने रूस को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि यूरोप लंबे समय तक यूक्रेन का साथ देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके अलावा यूरोप अब रूस पर अपना 21वां प्रतिबंध पैकेज लागू करने जा रहा है, जो सीधे रूस के शैडो फ्लीट (गुपचुप तेल ले जाने वाले जहाजों) को निशाना बनाएगा। इन जहाजों के जरिए ही रूस प्रतिबंधों से बचकर युद्ध के लिए पैसा जुटा रहा है।

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