अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का फिर बढ़ना दुखद व शर्मनाक है। ईरान के साथ युद्ध विराम के लिए बनी सहमति पर बढ़-चढ़कर खुशी का इजहार करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर ईरान में कई ठिकानों पर हमले हुए हैं। इसका जवाब ईरान ने भी बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले के साथ दिया है। युद्ध के फिर भड़कने और युद्ध विराम के खत्म होने की आशंका मंडराने लगी है। हालात के बिगड़ने के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दरअसल, यह अविश्वास से उपजा संकट है, जिसके समाधान की इच्छा अमेरिका में हाल के वर्षों में तो कभी नहीं दिखी है। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में जैसी दृढ़ता होनी चाहिए, उसका नितांत अभाव हो गया है। दरअसल, अमेरिकी प्रशासन ने ही अविश्वास का यह जाल बुना है, जिसमें वह खुद फंसा हुआ है। ट्रंप ने घोर असावधानी में यह ताजा धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने सैन्य बल का प्रयोग किया, तो ईरान का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। निस्संदेह, ट्रंप के इन चुभते शब्दों से पश्चिम एशिया में अमन-चैन को बल नहीं मिलेगा।
अस्थायी संघर्ष विराम में दरार आ गई है। तनाव बढ़ने के बाद ईरान ने अमेरिका के साथ शांति वार्ता समाप्त करने की धमकी दी है। होर्मुज समुद्री मार्ग के फिर बंद होने का खतरा पैदा हो गया है। ईरान की नाराजगी से यही लगता है कि तेल संकट में फिर इजाफे के हालात बनेंगे। सहमति पत्र पर हस्ताक्षर होने के बाद होर्मुज में यातायात शुरू हो गया था। अकेले भारत की ओर 30 से ज्यादा जहाज तेल, गैस, उर्वरक और अन्य सामान लेकर चल पड़े। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत एक समय 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी, लेकिन अब भाव वापस 70 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने वाले हैं। तेल की गिरती कीमतों से महंगाई की रफ्तार पर भी अंकुश के आसार बन रहे थे, पर अब सुधरते हालात पर सवालिया निशान लग गए हैं। अमेरिका ने ईरानी मिसाइल व ड्रोन भंडारण स्थलों और तटीय रडार ठिकानों पर हमले किए हैं, तो ईरानी नौसेना और एयरोस्पेस बलों ने कुवैत व बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल व ड्रोन से हमला किया है। उधर, इजरायल भी हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले कर रहा है और हिजबुल्लाह भी इजरायल विरोध में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। गौर करने की बात है, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम सहमति बनने के बाद इजरायल-हिजबुल्लाह के बीच भी सहमति बनी थी। यह सोचने का विषय है कि सहमतियां अब टिकती क्यों नहीं हैं?
दुनिया में यही वह मुकाम है, जहां संयुक्त राष्ट्र की कमी महसूस होती है। कभी इस प्रभावी संस्था में इतना नैतिक बल था कि वह तमाम देशों की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखती थी। दुर्भाग्य से यह संस्था अब लगभग सामुदायिक भवन जैसी बन गई है, जहां कभी-कभी लोग जुटते हैं और चर्चा करते हैं। यह विश्व संस्था लाचार है। डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका अपनी आंतरिक राजनीति से बुरी तरह से संचालित हो रहा है। बताया जा रहा है, ताजा सहमति की अमेरिका में भी निंदा हुई है और शायद ट्रंप नए सिरे से सहमति चाहते हैं। दूसरी ओर, ईरान ने भी इस सहमति को अपनी जीत की तरह प्रचारित कर दिया। फिर वही अविश्वास से जुड़ा संकट है, जिसके समाधान के लिए एक सक्षम, निष्पक्ष, मानवीय और नैतिक रूप से सबल मध्यस्थ संस्था की जरूरत है, इसके बिना दुनिया का काम नहीं चल सकता।






