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अब स्कूली बच्चे भी पढ़ेंगे इमरजेंसी का इतिहास, NCERT ने क्लास 9 के सिलेबस में जोड़ा आपातकाल

UB India News by UB India News
June 26, 2026
in खास खबर, शिक्षा
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अब स्कूली बच्चे भी पढ़ेंगे इमरजेंसी का इतिहास, NCERT ने क्लास 9 के सिलेबस में जोड़ा आपातकाल
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एनसीईआरटी ने लगभग 51 साल बाद पहली बार क्लास 9 की सोशल साइंस यानी सामाजिक विज्ञान की किताब में 1975-77 के आपातकाल पर विस्तृत अध्याय शामिल किया है. नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है.

किताब के अनुसार, 1970 के दशक की शुरुआत में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और सरकार के खिलाफ असंतोष के कारण देशभर में विरोध प्रदर्शन होने लगे थे. इसी दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़े आंदोलन खड़े हुए. 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू कर दिया.

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एनडीए की ‘मंगल मिलन’ बैठक………..

साल 2026 का अंतिम सूर्यग्रहण कल , भारत में दिखाई नहीं देगा……………

किताब में क्या-क्या बताया गया है?
एनसीईआरटी की किताब में बताया गया है कि आपातकाल के दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई थी और कई विपक्षी नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. किताब में यह भी बताया गया है कि इस अवधि ने भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं की परीक्षा ली.

अध्याय में आपातकाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन, लोकतंत्र पर पड़े प्रभाव और 1977 के आम चुनावों के बाद लोकतंत्र की बहाली का भी उल्लेख किया गया है. एनसीईआरटी के अनुसार, कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में पहली बार आपातकाल को इतने विस्तार से शामिल किया गया है.

आजाद भारत के सामने बड़ी चुनौती-पायलट
NCERT की कक्षा 9 की किताब में आपातकाल को शामिल किए जाने पर कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि जब भी किसी राज्य या केंद्र में बीजेपी सरकार सत्ता में होती है, तो वे इतिहास को अपनी मर्जी के मुताबिक पेश करने की कोशिश करते हैं. आज लोकतंत्र के सामने जो चुनौतियां हैं, वैसी आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गईं.

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया, मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही और चुनाव आयोग का इस्तेमाल करके जिस तरह से आवाजों को दबाया जा रहा है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार इन संस्थाओं का गलत इस्तेमाल कर रही है.

इंदिरा सरकार ने कब बनाई आपातकाल की योजना, जानें तब कैसे थे हिंदुस्तान के हालात

आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून 1975 की रात को इंदिरा गांधी सरकार के प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना। इसमें कहा गया- भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था।
इसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद राजनारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। श्रीमती गांधी के चिर-प्रतिद्वंद्वी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया गया।

राजनारायण सिंह की दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इंदिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।

इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इंदिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने का एलान हो गया।

उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। इस दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी।

  1. इंदिरा जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं।
  2. लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी।
  3. मीडिया और अखबार आजाद नहीं थे
  4. सरकार कैसा भी कानून पास करा सकती थी।
मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा और डीआईआर कानूनों के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जयप्रकाश नारायण कैद में रखे जाने के दौरान बीमार हो गए। उनकी किडनी खराब हो गई थी। उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं। बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला।

एक तरफ नेताओं की नई पौध राजनीति सीख रही थी, दूसरी तरफ देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिए चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।।

एक तरफ देशभर में सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर जुल्म हो रहा था तो दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडे- परिवार नियोजन, दहेज प्रथा का खात्मा, वयस्क शिक्षा, पेड़ लगाना, जाति प्रथा उन्मूलन पर काम करना शुरू कर दिया था।

बताया जाता है कि सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी ने एक ही दिन में दिल्ली के तुर्कमान गेट की झुग्गियों को साफ करवा डाला, लेकिन पांच सूत्रीय कार्यक्रम में ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस बल गांव के गांव घेर लेते थे और पुरुषों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।

कब और क्यों बनी थी आपातकाल की योजना?
इमरजेंसी के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन, इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी। 8 जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एचआर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बॉम्बे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।

आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी जिस विरोध को शांत करना चाहती थीं, उसी ने 19 महीने में देश का बेड़ागर्क कर दिया। संजय गांधी और उनकी तिकड़ी से लेकर सुरक्षा बल और नौकरशाही सभी निरंकुश हो चुके थे। एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे, लेकिन 19 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए। 21 मार्च को आपातकाल खत्म हो गया लेकिन अपने पीछे लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक छोड़ गया।

एनसीईआरटी ने लगभग 51 साल बाद पहली बार क्लास 9 की सोशल साइंस यानी सामाजिक विज्ञान की किताब में 1975-77 के आपातकाल पर विस्तृत अध्याय शामिल किया है. नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है.

किताब के अनुसार, 1970 के दशक की शुरुआत में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और सरकार के खिलाफ असंतोष के कारण देशभर में विरोध प्रदर्शन होने लगे थे. इसी दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़े आंदोलन खड़े हुए. 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू कर दिया.

किताब में क्या-क्या बताया गया है?
एनसीईआरटी की किताब में बताया गया है कि आपातकाल के दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई थी और कई विपक्षी नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. किताब में यह भी बताया गया है कि इस अवधि ने भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं की परीक्षा ली.

अध्याय में आपातकाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन, लोकतंत्र पर पड़े प्रभाव और 1977 के आम चुनावों के बाद लोकतंत्र की बहाली का भी उल्लेख किया गया है. एनसीईआरटी के अनुसार, कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में पहली बार आपातकाल को इतने विस्तार से शामिल किया गया है.

आजाद भारत के सामने बड़ी चुनौती-पायलट
NCERT की कक्षा 9 की किताब में आपातकाल को शामिल किए जाने पर कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि जब भी किसी राज्य या केंद्र में बीजेपी सरकार सत्ता में होती है, तो वे इतिहास को अपनी मर्जी के मुताबिक पेश करने की कोशिश करते हैं. आज लोकतंत्र के सामने जो चुनौतियां हैं, वैसी आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गईं.

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया, मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही और चुनाव आयोग का इस्तेमाल करके जिस तरह से आवाजों को दबाया जा रहा है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार इन संस्थाओं का गलत इस्तेमाल कर रही है.

इंदिरा सरकार ने कब बनाई आपातकाल की योजना, जानें तब कैसे थे हिंदुस्तान के हालात

आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून 1975 की रात को इंदिरा गांधी सरकार के प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना। इसमें कहा गया- भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था।
इसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद राजनारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। श्रीमती गांधी के चिर-प्रतिद्वंद्वी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया गया।

राजनारायण सिंह की दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इंदिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।

इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इंदिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने का एलान हो गया।

उस समय आकाशवाणी ने रात के अपने एक समाचार बुलेटिन में यह प्रसारित किया कि अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी। इस दौरान जनता के सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी।

  1. इंदिरा जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं।
  2. लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी।
  3. मीडिया और अखबार आजाद नहीं थे
  4. सरकार कैसा भी कानून पास करा सकती थी।
मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा और डीआईआर कानूनों के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जयप्रकाश नारायण कैद में रखे जाने के दौरान बीमार हो गए। उनकी किडनी खराब हो गई थी। उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए। एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं। बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला।

एक तरफ नेताओं की नई पौध राजनीति सीख रही थी, दूसरी तरफ देश को इंदिरा के बेटे संजय गांधी अपने दोस्त बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता की तिकड़ी के जरिए चला रहे थे। संजय गांधी ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।।

एक तरफ देशभर में सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर जुल्म हो रहा था तो दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडे- परिवार नियोजन, दहेज प्रथा का खात्मा, वयस्क शिक्षा, पेड़ लगाना, जाति प्रथा उन्मूलन पर काम करना शुरू कर दिया था।

बताया जाता है कि सुंदरीकरण के नाम पर संजय गांधी ने एक ही दिन में दिल्ली के तुर्कमान गेट की झुग्गियों को साफ करवा डाला, लेकिन पांच सूत्रीय कार्यक्रम में ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। लोगों की जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। कहा तो ये भी जाता है कि पुलिस बल गांव के गांव घेर लेते थे और पुरुषों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती थी।

कब और क्यों बनी थी आपातकाल की योजना?
इमरजेंसी के बहुत बाद एक साक्षात्कार में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है। लेकिन, इस शॉक ट्रीटमेंट की योजना 25 जून की रैली से छह महीने पहले ही बन चुकी थी। 8 जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के मुताबिक ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एचआर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बॉम्बे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।

आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी जिस विरोध को शांत करना चाहती थीं, उसी ने 19 महीने में देश का बेड़ागर्क कर दिया। संजय गांधी और उनकी तिकड़ी से लेकर सुरक्षा बल और नौकरशाही सभी निरंकुश हो चुके थे। एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे, लेकिन 19 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों ही हार गए। 21 मार्च को आपातकाल खत्म हो गया लेकिन अपने पीछे लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक छोड़ गया।

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