विश्व स्तर पर सामाजिक-आर्थिक ढांचा तेजी से बदल रहा है। एक नई औद्योगिक क्रांति के रूप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआई न केवल अप्रत्याशित रूप से उत्पादकता बढ़ा रहा है, बल्कि रोजगार के पुराने ढर्रे को भी पूरी तरह बदल रहा है। यह अब जटिल विश्लेषण के साथ-साथ निर्णय लेने और सृजनात्मक कार्यों में मानवीय भूमिका को चुनौती दे रहा है।
विश्व आर्थिक मंच की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, साल 2030 तक एआई और उससे संबंधित प्रौद्योगिकी के कारण दुनिया भर में लगभग 9.2 करोड़ नौकरियों के खत्म होने और 17 करोड़ नई नौकरियों के सृजन की संभावनाएं हैं। इस तरह, रोजगार के स्तर पर लगभग 7.8 करोड़ नौकरियों की बढ़ोतरी होगी। ये आंकड़े हमें आशान्वित करते हैं, पर नौकरियों के खत्म होने की वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता, जो अनगिनत परिवारों के लिए त्रासदी के रूप में सामने आ रहा है।
एआई के प्रभाव की चर्चा अक्सर अतिशयोक्तिपूर्ण होती है, मगर इससे जुड़ी कुछ प्रामाणिक रिपोर्टों पर अवश्य गौर किया जाना चाहिए। प्रसिद्ध अमेरिकी वित्तीय संस्था ‘गोल्डमैन सैक्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, एआई के कारण द़ुनिया भर में 30 करोड़ रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। यह संख्या नए पद सृजन से बहुत अधिक है। वहीं, मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का एक अध्ययन बता रहा है कि साल 2030 तक दुनिया भर के करीब 14 फीसदी कर्मचारियों को आधुनिक युग की मांग के अनुरूप अपने को बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है।
अमेरिका में तो एआई का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। नेशनल यूनिवर्सिटी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, करीब 30 फीसदी अमेरिकी कामगारों को अगले तीन साल में एआई के कारण मौजूदा नौकरी खोने का डर सताने लगा है। वहां की लगभग 23 फीसदी कंपनियों में चैट जीपीटी जैसी एआई टूल्स ने कई कर्मचारियों की जगह ले ली है। इन सबके बीच ब्रिटेन स्थित दुनिया के दूसरे सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय पेशेवर सेवा नेटवर्क ‘पीडब्ल्यूसी’ ने अपनी रिपोर्ट ‘ग्लोबल एआई जॉब बैरोमीटर 2026’ में एक सकारात्मक तस्वीर पेश की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, एआई इस्तेमाल कर रही कंपनियां उत्पादकता के साथ-साथ वेतन भी बढ़ा रही हैं और कर्मचारियों की संख्या में भी आवश्यकता के अनुरूप वृद्धि कर रही हैं। इसके भी दो परिणाम दिख रहे हैं। पहला, कुशल कर्मचारी लाभान्वित हो रहे हैं, वहीं कम दक्ष कामगारों की विदाई हो रही है। यूरोप व अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी यही प्रवृत्ति दिख रही है।
‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट’ (ओसीईडी) की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि उच्च-आय वाले देशों में एआई जनित जोखिम ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 2.3 प्रतिशत नौकरियां एआई के कारण खतरे में हैं। उच्च आय वाले देशों में जहां यह जोखिम 5.1 प्रतिशत नौकरियों से जुड़ा है, तो वहीं कम आय वाले देशों में 0.4 फीसदी नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है। ये तमाम अध्ययन यही बता रहे हैं कि महिलाएं और अकुशल कामगार इससे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। ये सभी एक बात पर सहमत हैं कि एआई नौकरियां खत्म करने से ज्यादा उनके स्वरूप में परिवर्तन कर रही हैं।
एआई का उपयोग करने वाली कंपनियां मानव क्षमता बढ़ा रही हैं, क्योंकि वे नए बाजारों में नए अवसरों के साथ प्रवेश कर रही हैं। फिर भी इस संक्रमण काल में बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक अस्थिरता का खतरा वास्तविक है। इस बदलाव का असर भारत में भी दिख रहा है। हमारे देश में आईटी क्षेत्र में लगभग 54 लाख नौकरियां हैं, लेकिन अब एंट्री-लेवल प्रोग्रामिंग, बीपीओ और कई साधारण ग्राहक सेवाएं एआई से संचालित होने लगी हैं। फोनपे जैसी कंपनियों ने अपनी कार्यप्रणाली में एआई के इस्तेमाल के बाद 60 प्रतिशत सपोर्ट स्टाफ कम कर दिया। टीसीएस व इंफोसिस जैसी बड़ी कंपनियों में नई भर्तियों में भारी गिरावट देखी गई है। टीसीएस ने हाल के वर्षों में औसतन 40,000 के बजाय 25,000 भर्तियों की ही योजना बनाई है।
आईआईएम, अहमदाबाद के साल 2024 के अध्ययन में ही यह अनुमान लगा लिया गया था कि लगभग 68 प्रतिशत पेशेवर मानते हैं कि आगामी पांच वर्षों में उनके काम आंशिक या पूर्ण रूप से एआई द्वारा किए जाने लगेंगे। 40 फीसदी कर्मचारियों को लगता है कि उनका मौजूदा कौशल आगामी पांच वर्षों में अप्रासंगिक हो जाएगा। देश के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने एआई के प्रभाव व प्रासंगिकता को यथार्थवादी तरीके से स्वीकार किया था और युवा बेरोजगारी के संदर्भ में एआई को एक बड़े खतरे के रूप में माना था। पीडब्ल्यूसी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2035 तक एआई भारत में 90 लाख नई नौकरियां जोड़ सकता है। सुखद बात है कि भारत एआई अपनाने में अग्रणी है। इसके 30 प्रतिशत से अधिक उद्यम एआई का उपयोग कर रहे हैं, जबकि वैश्विक स्तर यह दर 26 फीसदी है। साफ है, आने वाले दिन एआई के हैं, इसलिए इसे शत्रु नहीं, मित्र व सहयोगी मानकर इसके अनुरूप कार्यबल तैयार करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
हमारी सरकारों, उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों को मिल-जुलकर इस दिशा में काम करना होगा। अब हर शिक्षित को आजीवन सीखने की संस्कृति अपनानी होगी, क्योंकि एआई दुनिया में अप्रत्याशित रूप से बदलाव ला रहा है। अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए यह बहुत आवश्यक है। नौकरियां खत्म होने के विलाप का कोई औचित्य नहीं। एआई कुछ ले रहा है, तो बहुत कुछ दे भी रहा है और इतिहास गवाह है, हर औद्योगिक क्रांति ने प्रारंभ में कुछ रोजगार के अवसर खत्म किए, तो लंबे समय के लिए नए अवसर और समृद्धि भी प्रदान की है। दुनिया के आगे इस संक्रमण काल को सुगम और सकारात्मक बनाने की चुनौती है।
भारत जैसे युवा राष्ट्र के लिए यह परीक्षा का समय है। यदि हम कौशल विकास, नवाचारों के प्रोत्साहन और समावेशिता पर ठीक से ध्यान दें, तो एआई विकास का इंजन बन सकता है, वरना यह बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक अस्थिरता बढ़ाएगा, जो साल 2047 तक विकसित भारत के हमारे लक्ष्य के लिए घातक होगा। हमें ‘एआई फॉर ऑल’ सुनिश्चित करना होगा, ताकि कोई भी पीछे न रह जाए।







