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उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे को मंत्री बनाए रखने के लिए क्या कर सकते हैं?

UB India News by UB India News
June 15, 2026
in पटना, बिहार
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उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे को मंत्री बनाए रखने के लिए क्या कर सकते हैं?
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RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पास 144 दिन हैं। अगर वह 6 नवंबर 2026 तक MLA या MLC नहीं बनवा पाते हैं तो उनके बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री पद छोड़ना होगा। पार्टी बचाने के लिए कुशवाहा ने दीपक को बिना किसी सदन का सदस्य बनाए मंत्री बनवा दिया, लेकिन अब उनकी कुर्सी खतरे में है। ऐसे में सवाल है कि क्या बेटे को मंत्री बनाए रखने के लिए मां स्नेहलता अपने विधायक पद की कुर्बानी देंगी? या कुशवाहा चुनाव में दम दिखाएंगे।

11 जून को बिहार विधान परिषद चुनाव में सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। इनमें एक नाम नहीं था, जिसपर सबकी नजर थी। वह हैं दीपक प्रकाश। दीपक बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं। कुशवाहा की पार्टी RLM के पास चार विधायक हैं। उन्हें भरोसा था कि बीजेपी दीपक को विधान परिषद भेज देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब उनके सामने दो चुनौतियां एक साथ हैं। बेटे को सदन भेजना और अपनी पार्टी को टूट से बचाए रखना। कार्यकर्ताओं के बीच कह चुके हैं कि एक पद के लिए पार्टी समाप्त हो यह मंजूर नहीं। हालांकि कुशवाहा पहले (14 मार्च 2021 को) अपनी पार्टी रालोसपा का विलय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में कर चुके हैं। 20 फरवरी 2023 को उन्होंने जेडीयू छोड़कर नई पार्टी RLM बनाई थी। उपेंद्र ने ‎कहा है कि ‎दीपक मंत्री रहेंगे या नहीं, यह भाजपा‎ के शीर्ष नेतृत्व के लिए सोचने का‎ विषय है।

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मंत्री दीपक प्रकाश को नहीं मालूम, कैसे जाएंगे सदन

हमने मंत्री दीपक प्रकाश से बात की। उनसे पूछा कि आप विधानसभा या विधान परिषद किस सदन के सदस्य बनाए जाएंगे ताकि 6 माह पूरे होने के बाद भी मंत्री बने रह सकें?

इसपर दीपक ने कहा कि मुझे कोई जानकारी नहीं कि कैसे सदन भेजा जाएगा। एनडीए गठबंधन के नेतृत्वकर्ता ही आपको इस बारे में बता पाएंगे।

अब तक उपेंद्र कुशवाहा ने ये 3 ऑप्शन ठुकराए

  1. RLM के पास चार विधायक हैं। इसमें से एक उनकी पत्नी स्नेहलता हैं। चार में से तीन विधायकों के बारे में कहा जाता रहा कि वे बीजेपी के संपर्क में हैं। बीच-बीच में असंतोष दिखता भी रहा है। कहा गया कि कुशवाहा अपनी पार्टी का विलय बीजेपी में कर लें। उन्होंने अब तक बेटे को MLC बनाने के लिए अपनी पार्टी की कुर्बानी देना कबूल नहीं किया है।
  2. पत्नी से इस्तीफा दिलाकर बेटे को उनकी सीट से चुनाव लड़ा सकते थे। हालांकि यह आसान रास्ता नहीं। इस पर भी चलने को कुशवाहा अब तक तैयार नहीं हुए।
  3. वादाखिलाफी का आरोप लगाकर एनडीए से अलग हो सकते थे। बीजेपी व जेडीयू के खिलाफ मोर्चा खोल सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया।

अब उपेंद्र कुशवाहा के पास हैं ये चार रास्ते

1- नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद बांकीपुर सीट पर विधानसभा का उप-चुनाव होना है। इस सीट से दीपक प्रकाश चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन उन्हें पता है कि नितिन नवीन अपने किसी खास को उम्मीदवार बनवाएंगे। बहुत संभव है किसी कायस्थ को उम्मीदवार बनाया जाए। इसलिए इस सीट के लिए उपेन्द्र कुशवाहा जोर-आजमाइश नहीं कर रहे हैं।

2- बीजेपी के विधायक राजू सिंह को गैर इरादतन हत्या व आर्म्स एक्ट मामले में दोषी ठहराया गया है। अगर उन्हें 2 साल से अधिक की सजा होती है तो उनकी विधायकी खत्म हो जाएगी। ऐसे में उनकी सीट साहेबगंज पर उप-चुनाव होंगे। दीपक यहां से चुनाव लड़ सकते हैं। बीजेपी तैयार हो भी जाए तो यहां से जीत आसान नहीं होगी।

3- बिहार विधान परिषद में 5 साल पहले बीजेपी ने राज्यपाल कोटे से जनक राम, प्रो. राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, देवेश कुमार घनश्याम ठाकुर, प्रमोद कुमार और निवेदिता सिंह को भेजा था। किसी का इस्तीफा कराकर दीपक प्रकाश को संजीवनी दी जा सकती है।

हालांकि, दीपक बीजेपी में शामिल नहीं होंगे या उनकी पार्टी का विलय बीजेपी में नहीं होगा तो बीजेपी उनके प्रति सहानुभूति दिखाएंगी, इसकी संभावना कम है। विधान परिषद में राज्यपाल कोटे की सीटें 16 मार्च 2027 को खाली हो रही हैं।

4. विधान परिषद की स्नातक निर्वाचन और शिक्षक निर्वाचन की 4-4 सीटें नवंबर में खाली हो रही हैं। इससे पहले यहां चुनाव कराएं जाएंगे।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में पटना से जेडीयू के नीरज कुमार, कोसी से बीजेपी के डॉ. एन. के. यादव, तिरहुत से निर्दलीय वंशीधर बृजवासी और दरभंगा से निर्दलीय सर्वेश कुमार एमएलसी हैं।

शिक्षक निर्वाचन की बात करें तो पटना से बीजेपी के नवल किशोर यादव, दरभंंगा से कांग्रेस के मदन मोहन झा, तिरहुत से सीपीआईएम के संजय सिंह और सारण से निर्दलीय आफाक अहमद एमएलसी हैं।

आफाक को जनसुराज ने समर्थन दिया था। दीपक इनमें से किसी एक सीट पर चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि उनके लिए चुनाव लड़कर जीतना आसान काम नहीं होगा।

उपेंद्र कुशवाहा आगे क्या करेंगे, ये हैं दो विकल्प

1- मोदी कैबिनेट में शामिल हो जाएं

सूत्रों के मुताबिक, 20 जून के आसपास केंद्र में मोदी कैबिनेट में फेरबदल हो सकती है। भाजपा की ओर से उपेंद्र कुशवाहा को ऑफर दिया गया है कि मोदी कैबिनेट में शामिल हो जाइए।

बात उपेंद्र कुशवाहा के मोदी कैबिनेट में मंत्री बनने की हो और दूसरी तरफ बेटे का करियर हो तो कुशवाहा बेटे का करियर चुनेंगे। कुशवाहा पहले 2014 की मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके हैं। सियासी गलियारे की चर्चा की मानें तो कुशवाहा ने पार्टी के विलय के ऑफर को ठुकराया है।

2. पत्नी की जगह बेटे को विधायक बनाएं

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने कुशवाहा को साफ कह दिया है कि दीपक को मंत्री बनाए रखना है या नहीं, यह उपेंद्र कुशवाहा खुद तय करें।

अगर बेटे का पॉलिटिकल करियर बचाये रखना है तो कुशवाहा को अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को विधायक पद से इस्तीफा दिलाना होगा। फिर सीट खाली होने पर बेटे को वहां से चुनाव लड़ाए और जिताएं।

अगर इस महीने या अगले महीने भी स्नेहलता कुशवाहा सासाराम विधानसभा सीट से इस्तीफा देती हैं तो संभव है कि बांकीपुर के साथ यहां भी उप-चुनाव हो।

बांकीपुर विधानसभा सीट 30 मार्च को भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफा देने से खाली हुई है। वहां 6 महीने के अंदर यानी 30 सितंबर तक चुनाव करना अनिवार्य है।

अगर कुशवाहा की पत्नी इस्तीफा देंगी तो दोनों उप-चुनाव साथ होंगे। अगर दीपक लड़कर जीते तो उनका मंत्री पद बरकरार रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क कहते हैं कि उपेन्द्र कुशवाहा अपनी पत्नी स्नेहलता से इस्तीफा दिलवाकर उप-चुनाव में बेटे दीपक को जीत दिला सकते हैं। आरएलएम में दीपक के लिए मां स्नेहलता को छोड़कर कोई दूसरा विधायक अपनी कुर्बानी को तैयार नहीं है।

हम पार्टी से 2 सीख ले सकते हैं उपेंद्र कुशवाहा

पहली: एक समय जीतन राम मांझी और उनके बेटे डॉ. संतोष सुमन पर काफी दबाव था कि वे हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) का विलय जेडीयू में कर लें। मांझी तैयार नहीं हुए।

उनके बेटे सुमन ने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया, लेकिन हम का विलय जेडीयू में नहीं किया। आगे जीतन राम मांझी गयाजी से लोकसभा का चुनाव जीते और केन्द्र में मंत्री बनाए गए। बेटे संतोष सुमन को दो विभागों का प्रभार मिला। 2025 में हम ने विधानसभा चुनाव में 5 सीटों पर जीत हासिल की।

दूसरी: अपनी पार्टी को टूट से बचाने के लिए परिवारवाद को बढ़ावा दें। हम पार्टी में जीतन राम मांझी सांसद हैं, उनकी समधन ज्योति मांझी और बहू दीपा मांझी विधायक हैं।

पुत्र संतोष कुमार सुमन एमएलसी व बिहार सरकार में मंत्री हैं। दामाद प्रफुल्ल कुमार मांझी भी पार्टी से जुड़े हुए हैं। इस वजह से हम पार्टी में टूट का खतरा नहीं के बराबर रहता है।

RJD और JDU से भी सीख ले सकते हैं कुशवाहा

आरजेडी में पार्टी की कमान लालू प्रसाद ने हमेशा अपने पास रखी। वे राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पार्टी का उत्तराधिकारी घोषित करने का समय आया तो अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया।

चारा घोटाला में जेल जाने लगे थे तो किसी पर भी भरोसा नहीं किया बल्कि अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवाया। बेटी मीसा भारती को पाटलिपुत्र से तीन बार लोकसभा का टिकट दिया, दो बार राज्यसभा भी भेजा। अभी मीसा भारती पाटलिपुत्र से सांसद हैं। बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी का बनाया।

नीतीश कुमार ने जब तय किया कि राज्यसभा जाएंगे तो अपने बेटे निशांत कुमार को मंत्री और एमएलसी बनाकर पार्टी में टकराव रोकने की कोशिश की। जेडीयू में नीतीश कुमार के करीबी नेता निशांत में नीतीश कुमार की छाया देख रहे हैं।

समय का इंतजार कर रहे उपेंद्र कुशवाहा

 दीपक 6 महीने तक मंत्री तो बने रह ही सकते हैं। किसी सदन का सदस्य नहीं बन पाएंगे तो सम्राट चौधरी की तरह उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा। अभी बीजेपी इतनी ताकतवर है कि उपेंद्र कुशवाहा उससे लड़ नहीं सकते।

 

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