साल 2014 के बाद से केंद्र की सत्ता पर बीजेपी का मजबूत कब्जा है. लेकिन राज्यों की राजनीति में बीते कुछ सालों में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है. भारतीय राजनीति के कई पुराने किले अब पूरी तरह ढह चुके हैं. एक वक्त था जब राज्यों की सियासत कुछ खास चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती थी. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे का भारी दबदबा था. ओडिशा में नवीन पटनायक और बंगाल में ममता बनर्जी की तूती बोलती थी. बिहार में नीतीश कुमार और तमिलनाडु में एमके स्टालिन का एकछत्र राज था. केरल में पिनराई विजयन अपनी सत्ता में काफी मजबूत माने जाते थे. अचानक राजनीतिक बिसात पलट गई और नए चेहरों ने एंट्री ले ली. अब इन दिग्गजों की जगह नए लीडर्स ने ले ली है. दशकों तक राज करने वाले क्षत्रप सत्ता से बेदखल हो गए हैं. इसके पीछे राजनीतिक जानकारों ने कई अहम कारण बताए हैं.
बीजेपी ने चले राज्यों में नए और हैरान करने वाले दांव
भारतीय जनता पार्टी की इंटरनल पॉलिटिक्स में बहुत बड़ा बदलाव आया है. पार्टी अब क्षेत्रीय क्षत्रप बनाने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखती है. बीजेपी लीडरशिप चाहती है कि राज्यों में हमेशा नए चेहरों को मौका मिले. इससे पार्टी के भीतर किसी एक नेता का एकाधिकार आसानी से खत्म होता है. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘नए चेहरों को लाने से कैडर में ऊर्जा बनी रहती है’. इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने अपने स्थापित नेताओं को धीरे-धीरे किनारे कर दिया.
- राजस्थान में वसुंधरा राजे को हटाकर भजनलाल शर्मा को सीएम बनाया गया. यह पार्टी का एक बहुत बड़ा और साहसिक फैसला था.
- मध्य प्रदेश में भी शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को कमान सौंपी गई. शिवराज सिंह चौहान को सम्मान के साथ केंद्र की राजनीति में शिफ्ट कर दिया गया.
- छत्तीसगढ़ में भी पूर्व सीएम रमन सिंह को विधानसभा स्पीकर बना दिया गया. वहां आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को नया सीएम चुना गया.
- हरियाणा में भी मनोहर लाल खट्टर को हटाकर नायब सिंह सैनी को कुर्सी दी गई. खट्टर को बाद में केंद्रीय मंत्री बना दिया गया.
यह दिखाता है कि बीजेपी में अब कोई भी नेता संगठन से बड़ा नहीं है. पार्टी हर राज्य में अपनी लीडरशिप की सेकेंड लाइन तैयार कर रही है. इससे नेताओं को यह साफ मैसेज जाता है कि कोई भी कंफर्ट जोन में न रहे. पार्टी जब चाहे किसी भी नेता की जिम्मेदारी में बदलाव कर सकती है. यह एक ऐसा मॉडल है जो बीजेपी को लगातार चुनावी सफलता दिला रहा है.
बंगाल से लेकर ओडिशा तक, कैसे पलटी पूर्वी भारत की सियासी बाजी?
पूर्वी भारत में राजनीति का चक्का अब पूरी तरह से घूम चुका है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का मजबूत तिलिस्म बुरी तरह टूट गया है. तीन बार सत्ता में रहने के बाद टीएमसी को भारी सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा. इसके साथ ही वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन से भी राजनीतिक समीकरण बदल गए. बीजेपी ने टीएमसी को सत्ता से उखाड़ फेंका और अपना परचम लहरा दिया.
ममता बनर्जी न सिर्फ सीएम की कुर्सी हार गईं बल्कि अपना चुनाव भी हार गईं. नंदीग्राम में बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें लगातार दूसरी बार करारी शिकस्त दी. टीएमसी अब 294 में से सिर्फ 80 सीटों पर सिमट कर रह गई है. ममता बनर्जी के हाथ से अपनी पार्टी का कंट्रोल भी पूरी तरह फिसल रहा है. कई विधायक खुलकर बगावत पर उतर आए हैं और पार्टी टूटने की कगार पर है.
दूसरी तरफ ओडिशा में भी एक बड़ा सियासी उलटफेर हुआ है. नवीन पटनायक का 24 साल का अजेय किला एक ही झटके में ढह गया. लगातार पांच बार सत्ता में रहने के बाद बीजेडी को करारी हार का सामना करना पड़ा. जनता के बीच पटनायक सरकार को लेकर थकान और नाराजगी साफ दिख रही थी. नौकरशाह से नेता बने वीके पांडियन का विवाद भी बीजेडी को चुनाव में भारी पड़ा. जनता ने उन्हें बाहरी नेता के तौर पर देखा और नकार दिया.
साल 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया. बीजेपी ने इसके बाद मोहन चरण माझी को ओडिशा का नया सीएम बना दिया. असम में भी बीजेपी ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर अपनी पकड़ मजबूत रखी है. वहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी लगातार मजबूती से राज कर रही है.
दक्षिण भारत की राजनीति में कैसे हुआ सिनेमाई और बड़ा उलटफेर?
दक्षिण भारत की सियासी जमीन पर भी एकदम नए समीकरण बन गए हैं. तमिलनाडु में एमके स्टालिन की डीएमके को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. जनता के गुस्से का फायदा विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके को भी नहीं मिल सका. जे जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके वैसे भी कमजोर हो चुकी थी. इसका सीधा फायदा फिल्म सुपरस्टार सी जोसेफ विजय की नई पार्टी टीवीके को मिला.
विजय ने अपने पहले ही चुनाव में राज्य के भीतर शानदार जीत दर्ज की. उनकी इस जीत ने एमजी रामचंद्रन के सुनहरे दौर की याद दिला दी है. विजय का सीएम बनना तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है. राज्य की मुख्य द्रविड़ विचारधारा अब भी पहले जैसी ही रहने की उम्मीद है.
केरल में भी सत्ता विरोधी लहर ने वामपंथी मोर्चे को बहुत बड़ा झटका दिया है. सीपीआईएम के नेतृत्व वाला एलडीएफ वहां बुरी तरह से चुनाव हार गया. दस साल बाद कांग्रेस ने केरल की सत्ता में जोरदार वापसी की है. कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदलते हुए वीडी सतीसन को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया है.
कर्नाटक में भी कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक बिसात में बड़ा बदलाव किया है. वहां सिद्धारमैया की जगह अब डीके शिवकुमार को सीएम बनाया गया है. शिवकुमार अपने आप में एक कद्दावर नेता हैं और जनता में लोकप्रिय हैं. वह भविष्य में दक्षिण भारत के एक बड़े क्षेत्रीय क्षत्रप बन सकते हैं. तेलंगाना में भी कांग्रेस ने 2023 में ही रेवंत रेड्डी को सत्ता की चाबी सौंप दी थी. रेड्डी अब एक नए क्षेत्रीय चेहरे के तौर पर वहां बहुत तेजी से उभर रहे हैं.
दिल्ली और बिहार में किस तरह से बदले पुराने राजनीतिक समीकरण?
उत्तर भारत की राजनीति में भी स्थापित पार्टियों को बड़े झटके लगे हैं. बिहार में एनडीए को विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत मिला था. चुनाव के कुछ महीने बाद ही नीतीश कुमार ने अचानक सीएम पद छोड़ दिया. जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष का यह फैसला सबको हैरान करने वाला था. उनकी जगह बीजेपी के तेज-तर्रार नेता सम्राट चौधरी को नया सीएम बनाया गया. यह बिहार में बीजेपी की रणनीति का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना गया. नीतीश कुमार का हटना क्षेत्रीय राजनीति के एक बहुत बड़े युग का अंत है. बिहार की जनता ने भी इस नए बदलाव को आसानी से स्वीकार कर लिया है.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी का राजनीतिक दबदबा खत्म हो गया. साल 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हरा दिया. एक दशक पहले राजनीति बदलने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल सत्ता से बाहर हो गए. बीजेपी ने दिल्ली में रेखा गुप्ता को अपना नया सीएम चुना है.
रेखा गुप्ता का नाम राजनीति के कई जानकारों के लिए एकदम नया था. यह फैसला दिखाता है कि बीजेपी हर राज्य में नए चेहरों पर दांव खेल रही है. पंजाब में हालांकि आम आदमी पार्टी अब भी बहुत मजबूत स्थिति में है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने वहां क्लीन स्वीप किया था. भगवंत मान वहां सीएम के रूप में एक नया क्षेत्रीय चेहरा बन चुके हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह का खाली स्पेस अब पूरी तरह भगवंत मान ने ले लिया है.
आखिर किन राज्यों में अभी भी बरकरार है दिग्गजों की पुरानी लीडरशिप?
देशभर में हुए इतने भारी बदलावों के बीच कुछ राज्यों में पुरानी लीडरशिप अब भी कायम है.
- आंध्र प्रदेश में टीडीपी चीफ एन चंद्रबाबू नायडू का राजनीतिक जादू अब भी बरकरार है. वह लंबे समय से राज्य के एक बहुत मजबूत और स्थापित नेता बने हुए हैं.
- उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक निरंतरता मजबूती के साथ बनी हुई है. बीजेपी के सीनियर नेता और दो बार के सीएम योगी आदित्यनाथ अपने पद पर डटे हैं. वह अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में तीसरी बार जीत की तैयारी कर रहे हैं. यूपी में उनकी लोकप्रियता और कानून-व्यवस्था के मॉडल में कोई कमी नहीं आई है. बीजेपी उन्हें अपना सबसे बड़ा और सुरक्षित चेहरा मानती है.
- महाराष्ट्र में भी बीजेपी ने अपने सबसे अनुभवी नेता देवेंद्र फडणवीस पर भरोसा जताया है. महायुति गठबंधन में कई अन्य मजबूत नेता भी मौजूद हैं. बीजेपी ने आपसी सहमति से फडणवीस को राज्य की कमान सौंपी है. जनवरी 2026 में अजित पवार के निधन के बाद वहां के सियासी समीकरण थोड़े बदले हैं. इसके बावजूद देवेंद्र फडणवीस राज्य की राजनीति में सबसे मजबूत धुरी बने हुए हैं.
- असम में भी हिमंत बिस्वा सरमा अपनी पुरानी पकड़ के साथ राज कर रहे हैं. वह अन्य नए मुख्यमंत्रियों के मुकाबले खुद को पूरी तरह से स्थापित कर चुके हैं. उनकी कार्यशैली को राष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद किया जाता है.
इन सारे सियासी घटनाक्रमों से एक बात अब पूरी तरह साफ हो चुकी है. भारतीय राजनीति अब किसी भी बड़े नेता या परिवार की जागीर नहीं रही है. देश की जनता का मूड अब बहुत तेजी से बदल रहा है. राजनीतिक दल भी जनता की इस बदलती नब्ज को अच्छे से समझ चुके हैं. कोई भी पार्टी अपने नेताओं को लेकर अब कंफर्ट जोन में नहीं रहना चाहती है. नए चेहरों की एंट्री से राजनीति का हर दांव अब और भी ज्यादा दिलचस्प हो गया है.







