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वैश्विक तनाव और चरम मौसम ने भारत के सामने भोजन, ईंधन और पर्यावरण का खड़ा किया तिहरा संकट………….

UB India News by UB India News
June 3, 2026
in विशेष रिपोर्ट
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वैश्विक तनाव और चरम मौसम ने भारत के सामने भोजन, ईंधन और पर्यावरण का खड़ा किया तिहरा संकट………….
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पश्चिम एशियाई संघर्ष के कारण दुनियाभर में सामान की आवाजाही व आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है, जिससे ईंधन और उर्वरकों की कीमतें बढ़ गई हैं। इसी बीच भारत कई दशकों की सबसे भीषण गर्मी तथा कमजोर मानसून जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। हालांकि, इन समस्याओं की कुछ वजहें वैश्विक हालात हैं, पर कई मुश्किलें हमारी अपनी नीतियों और कमजोरियों का भी परिणाम हैं।

स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है, जब एक तरफ पीने के पानी और खेती के लिए भी पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं है, और दूसरी तरफ हम बायोएथेनॉल उत्पादन को तेजी से बढ़ावा दे रहे हैं। इस्तेमाल की गई फसल के आधार पर एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग चार से दस हजार लीटर तक पानी खर्च होता है। आज स्थिति यह है कि देश अपनी जरूरत की लगभग 20 प्रतिशत दालें आयात करता है, जबकि दालें देश में बढ़ती प्रोटीन की कमी को दूर करने के साथ यूरिया की मांग घटाने में भी मददगार साबित हो सकती हैं।

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सूक्ष्म कणों, यानी पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के कारण लोगों की सेहत प्रभावित हो रही है। फिर भी, अधिकांश कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों को ‘फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन सिस्टम’ लगाने से छूट दे दी गई है। यह तकनीक सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करती है, जो खेतों से निकलने वाली अमोनिया के साथ मिलकर हवा में खतरनाक सूक्ष्म कण पैदा करती है। वहीं, खेती के लिए जरूरी पोषक तत्व गोबर और सीवेज में बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं, पर उनके सही पुनर्चक्रण की कमी के चलते रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ गई है। खराब अपशिष्ट प्रबंधन से भी जलाशयों में यूट्रोफिकेशन जैसी समस्या बढ़ रही है, जिससे विभिन्न जलस्रोत धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जहां भी संभव हो, खेती में दालों और अन्य फलीदार फसलों पर आधारित फसल चक्र तथा बहु-फसली खेती को दोबारा बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि फलीदार फसलें हवा से प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन ग्रहण कर लेती हैं, कम पानी में तैयार हो जाती हैं और यूरिया जैसी रासायनिक खादों पर निर्भरता भी घटा देती हैं। इसी सोच के तहत अक्तूबर 2025 में शुरू किए गए ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ में सरकार ने अरहर, उड़द व मसूर जैसी दालों की अगले चार वर्षों तक 100 प्रतिशत खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर करने का वादा किया था, पर अप्रैल में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, दालों की बुआई क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में केवल 1.26 फीसदी की मामूली वृद्धि ही दर्ज की गई है। यह उत्साहजनक नहीं है, विशेष रूप से 2021-22 से 2024-25 के बीच क्षेत्र में हुई गिरावट की तुलना में।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लगभग 90 अरब क्यूबिक मीटर तक कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) उत्पादन की क्षमता मौजूद है, जिससे आयातित प्राकृतिक गैस की आवश्यकता लगभग पूरी तरह खत्म की जा सकती है और घरेलू व औद्योगिक जरूरतों की बड़ी मांग देश के भीतर ही पूरी हो सकती है। इसी दिशा में राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन, गोबरधन और सतत जैसी योजनाओं के तहत सरकार बायोगैस उत्पादन बढ़ाने तथा गैस मिश्रण को अनिवार्य बनाने के लिए कई प्रोत्साहन दे रही है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद देश की कुल उत्पादन क्षमता लगभग 3,700 टन प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत ने 2070 तक ‘नेट जीरो’, यानी शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन का जो लक्ष्य तय किया गया है, उसे हासिल करने के लिए मौजूदा नीतियों और योजनाओं की गति अभी पर्याप्त नहीं है। इन पहलों का दायरा तथा प्रभाव, दोनों को तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है। उनका सुझाव है कि रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सभी जैविक विकल्प-जैसे गोबर खाद, कंपोस्ट, बायोचार व अन्य जैविक स्रोत पूरी तरह उपयोग में लाए जा चुके हों। अखिल भारतीय समन्वित फसल परीक्षणों में भी यह साबित हो चुका है कि उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा का करीब आधा हिस्सा खाद, कंपोस्ट या बायोचार से बदला जा सकता है और इससे फसल उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर भी नहीं पड़ता। पर, समस्या यह है कि सरकारी सिफारिशों और कृषि सलाहों में इन वैकल्पिक उपायों को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाई है। नतीजतन, किसान रासायनिक उर्वरकों को ही आधार खुराक मानकर उनका अत्यधिक उपयोग करते हैं।

जरूरत इस बात की भी है कि अनाज और खाद्य फसलों से बनने वाले एथेनॉल को हतोत्साहित किया जाए और इसके उत्पादन के लिए केवल शीरा (मोलासेस) तथा अन्य बेकार बायोमास के इस्तेमाल की ही अनुमति दी जाए। नीति आयोग के अनुसार, दिल्ली, बंगलूरू और चेन्नई समेत भारत के 21 बड़े शहरों में वर्ष 2030 तक भूजल पूरी तरह समाप्त होने का खतरा है। फिर भी, एथेनॉल उत्पादन से जुड़ी डिस्टिलरी इकाइयों को ‘शून्य-अपशिष्ट उत्सर्जन’(जीरो एफ्लुएंट डिस्चार्ज) के स्व-प्रमाणन के आधार पर ही अनुमति दी जा रही है। परिणामस्वरूप, कई डिस्टिलरी बिना पर्याप्त निगरानी के भूजल और सतही जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं।

फसलों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्वों के उपयोग की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार को अगले पांच वर्षों में अपना निवेश कम-से-कम दस गुना तक बढ़ाना चाहिए। आज कृषि में इस्तेमाल होने वाले कुल यूरिया का दो-तिहाई और फॉस्फेट का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा फसल तक पहुंच ही नहीं पाता और हवा तथा पानी में प्रदूषक तत्वों के रूप में फैल जाता है। इस बर्बाद होने वाली खाद की आर्थिक कीमत सालाना 1.5 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठती है, जो भारत में होने वाले कुल सरकारी अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) खर्च के दोगुने से ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार, धान की जर्मप्लाज्म, यानी आनुवंशिक सामग्री में ही इतनी क्षमता मौजूद है कि प्रति इकाई यूरिया के उपयोग पर मिलने वाली फसल की पैदावार को दोगुना किया जा सकता है। भारत को इन समस्याओं का समाधान तुरंत और गंभीरता से करना होगा। तभी देश भोजन, ईंधन, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े उन बहुस्तरीय संकटों से बच सकेगा, जो लगातार गहराते जा रहे हैं।

केंद्र ‘राष्ट्रीय नाइट्रोजन संचालन समिति’ को दोबारा सक्रिय करने पर विचार कर सकता है, जिसकी स्थापना सतत नाइट्रोजन प्रबंधन पर भारत के नेतृत्व वाले पहले संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को लागू करने के लिए की गई थी। समिति का कार्यकाल 2024 में खत्म हो गया, पर उसकी किसी भी प्रमुख सिफारिश पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी-जैसा कि अक्सर नीतिगत स्तर पर देखने को मिलता है।

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