नीतीश कुमार के लंबे शासनकाल के बाद अब नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार सरकार का नया दौर शुरू हो गया है। JDU का दावा है कि सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के सुशासन और विकास के विजन को ही आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। हालांकि, सम्राट ने अपने 35 दिन के कार्यकाल में अपने नीतिगत फैसलों से अलग लकीर खींचनी शुरू कर दी है।
सम्राट सरकार के 4 फैसले, जो नीतीश मॉडल को पलटते दिख रहे…
1. जनता दरबार की जगह सहयोग शिविर
30 दिन में करना होगा समाधान
- CM चौधरी ने कहा है- ‘शिविर में आने वाले आवेदनों का निपटारा 30 दिन के अंदर करना होगा। आवेदन मिलने के 10 दिन के अंदर संबंधित अधिकारी को उसे निपटाने के लिए नोटिस दी जाएगी। आवेदन के 20वें दिन भी नोटिस जारी होगी। 30 दिन के अंदर हर हाल में आवेदन का निपटारा करना होगा।
- कोर्ट से संबंधित मामले को छोड़कर आवेदन को किसी भी सूरत में अटकाना और भटकाना नहीं है। ऐसा करने वाले पदाधिकारी 31वें दिन मुख्यमंत्री सचिवालय से निलंबित कर दिए जाएंगे। मुख्यमंत्री सचिवालय आवेदन की रियल टाइम मॉनिटरिंग करेगा।’
नीतीश क्या करते थे- नीतीश कुमार जनता दरबार लगाते थे। उन्होंने इसकी शुरुआत 2006 में की थी। बीच में कुछ सालों (2016 से 2021 के बीच) के लिए यह बंद हुआ था, लेकिन 12 जुलाई 2021 से इसे नए नियमों और पूरी तरह डिजिटल मॉनिटरिंग के साथ फिर से शुरू किया गया था।
- यह कार्यक्रम हर महीने के पहले तीन सोमवार को पटना में मुख्यमंत्री सचिवालय के पास आयोजित होता था।
- इसमें शिकायतकर्ताओं को सीधे मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखने का मौका मिलता था। मुख्यमंत्री के बगल में संबंधित विभागों के मंत्री और DGP से लेकर मुख्य सचिव तक बैठते थे।
- नीतीश कुमार ऑन-द-स्पॉट अधिकारियों को फोन घुमाकर कहते थे- ‘इस मामले को तुरंत देखिए और एक्शन लीजिए।’
नीतीश काल में 60 दिन के अंदर करना था शिकायतों का निपटारा
- लोगों के काम को कम समय के अंदर करने के लिए नीतीश कुमार ने एक कानून बनाया था। बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम (PGRO)। 5 जून, 2016 से यह कानून लागू है।
- इस कानून के मुताबिक, किसी भी आम आदमी की शिकायत का निपटारा अधिक से अधिक 60 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है। इसमें शिकायतकर्ता और संबंधित विभाग के अधिकारी को आमने-सामने बैठाकर बात सुनी जाती थी।
- यदि कोई अधिकारी समय-सीमा के अंदर शिकायत का निपटारा नहीं करता था या जानबूझकर टालता था, तो उस पर 500 से लेकर 5000 रुपए तक का जुर्माना लगाने और विभागीय कार्रवाई का प्रावधान था।
सम्राट का सहयोग शिविर नीतीश से अलग कैसे?
- समय-सीमा आधी कर दी: नीतीश सरकार के लोक शिकायत कानून में समाधान के लिए 60 दिन मिलते थे। सम्राट चौधरी ने इसे घटाकर 30 दिन कर दिया।
- सीधे सस्पेंशन का आदेश: नीतीश सरकार में जुर्माना या विभागीय जांच (शोकॉज) का प्रावधान था। सम्राट चौधरी ने 31वें दिन सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय से निलंबित करने का आदेश दिया है।
- रियल-टाइम मॉनिटरिंग: नीतीश कुमार के समय जिला स्तर पर शिकायत निवारण पदाधिकारी (PGRO) बैठते थे। सम्राट सरकार में इन सभी पंचायतों से आने वाले आवेदनों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय से मुख्यमंत्री की टीम करेगी।

2. क्राइम कंट्रोल का सम्राट फॉर्मूला- पुलिस का हाथ खोल दिया
CM सम्राट ने कहा- अपराधियों को उन्हीं की भाषा में पुलिस जवाब दे रही है। हमने पुलिस का हाथ खोल दिया है। बिहार सुशासन वाला राज्य है। इसे हर हाल में कायम रखना है। किसी कीमत पर अपराधी बचेंगे नहीं।
सम्राट चौधरी ने कहा- 15 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ घिनौना अपराध करने वालों को माला नहीं पहनाएं, बल्कि उन पर माला चढ़ा दें। ऐसे अपराधियों को लाने या उन पर दूसरे किसी कार्रवाई की बिल्कुल जरूरत नहीं। क्राइम, करप्शन व कम्युनिलिज्म से कोई समझौता नहीं होगा।
इसका नतीजा है कि उनके गृह मंत्री और अब मुख्यमंत्री बनने के बाद यानी 20 नवंबर 2025 के बाद से 19 मई 2026 तक कुल 22 एनकाउंटर हुए, जिसमें 6 अपराधी मारे गए।
सम्राट चौधरी के हाथ खोल देने का असल मतलब…
- सेल्फ डिफेंस में गोली मारने की छूटः अगर अपराधी फायरिंग करता है तो पुलिस बिना हिचकिचाहट सेल्फ डिफेंस में सीधे पैर में गोली मार रही है।
- कानूनी पचड़ों से सुरक्षा का भरोसा: सरकार ने साफ मैसेज दिया है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर पुलिसकर्मियों को विभागीय जांच या मानवाधिकार के नाम पर प्रताड़ित नहीं किया जाएगा, बशर्ते कार्रवाई सही इरादे से की गई हो।
नीतीश मॉडल- ना फंसाते हैं; ना बचाते हैं, कानून अपना काम करेगा
- नीतीश कुमार का मूल मंत्र था-कानून अपना काम करेगा। हम ना फंसाते हैं और ना बचाते हैं। वे एनकाउंटर संस्कृति या पुलिस के कानून हाथ में लेने के सख्त खिलाफ थे।
- 2005 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपराधियों को पकड़कर अदालतों के जरिए स्पेशल ट्रायल कराकर रिकॉर्ड सजा दिलवाई। इससे सुशासन का राज स्थापित हुआ।
- उस वक्त पुलिस का काम अपराधी को पकड़ना और कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करना था। पुलिस को मनमाने तरीके से अपने स्तर पर ‘सबक सिखाने’ की छूट नहीं थी। हालांकि, एनकाउंटर पर पूरी तरह रोक नहीं थी। जरूरत पड़ने पर पुलिस गोली भी चलाती थी।
- जब भी अपराध बढ़ता था, वह अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करते, चेतावनी देते या फिर बड़े पैमाने पर IAS-IPS अधिकारियों का तबादला कर देते थे।

3. कैबिनेट बैठक का दिन बदला, तौर-तरीका भी
सम्राट चौधरी हर बुधवार को कैबिनेट की बैठक कर रहे हैं। जबकि, नीतीश कुमार हर मंगलवार या शुक्रवार को कैबिनेट की बैठक करते थे। सम्राट चौधरी ने सिर्फ बैठक का दिन ही नहीं बदला है, उसमें कई बदलाव किए हैं…
कैबिनेट की बैठक का पॉलिटिकल माइलेज
- नीतीश कैबिनेट की बैठक खत्म होने के बाद केवल कैबिनेट सचिवालय के विशेष सचिव या मुख्य सचिव प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फैसलों की जानकारी देते थे। नीतीश कुमार खुद कैबिनेट ब्रीफिंग से पूरी तरह दूरी बनाकर रखते थे।
- जबकि, सम्राट चौधरी न केवल खुद फैसलों के बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर एक्टिव होकर जनता को इसकी जानकारी दे रहे हैं, बल्कि संबंधित विभागों के मंत्रियों को भी क्रेडिट लेने के लिए आगे कर रहे हैं। इसका उद्देश्य फैसलों का तुरंत पॉलिटिकल माइलेज लेना है।
कैबिनेट में मंत्रियों की राह अहम
- नीतीश कैबिनेट में अंतिम फैसला हमेशा ‘वन-मैन शो’ की तरह केवल नीतीश कुमार का होता था। कई बार गठबंधन के सहयोगी मंत्रियों को बैठक की मेज पर आने से पहले तक पता नहीं होता था कि आज किस एजेंडे पर मुहर लगने वाली है।
- जबकि, सम्राट चौधरी की कैबिनेट में मंत्रियों को अपनी बात रखने और अपने विभागों के प्रस्तावों को पास कराने की ज्यादा छूट है। चूंकि सरकार में भाजपा का कोर एजेंडा और युवा नेतृत्व हावी है, इसलिए मंत्रियों के बीच समन्वय और शक्ति का संतुलन नजर आ रहा है।
4. नीतीश ने बुनियाद मजबूत की, आगे सम्राट की बारी
नीतीश कुमार का फोकस बुनियादी ढांचे के विस्तार और सामाजिक कल्याण पर था। वहीं, सम्राट चौधरी का अप्रोच शहरीकरण के आधुनिकीकरण, आर्थिक संरक्षण और प्राइवेट स्कूलों पर कड़े नियंत्रण की ओर है। दोनों के अप्रोच में 4 अंतर…
1. सम्राट का शहरों के विकास पर ज्यादा
- नीतीश कुमार का मुख्य फोकस गांवों को शहरों से जोड़ने पर था। उन्होंने सात निश्चय योजना के तहत ‘हर घर नल का जल’, ‘घर तक पक्की गली-नालियां’ और ग्रामीण सड़कों के जाल बिछाने पर जोर दिया। उनका मानना था कि ग्रामीण विकास से ही बिहार का विकास होगा।
- सम्राट सरकार का ध्यान तेजी से हो रहे अनियोजित शहरीकरण को व्यवस्थित करने पर है। कैबिनेट ने बिहार के 10 जिलों में 11 सैटेलाइट टाउनशिप बनाने के ब्लूप्रिंट को मंजूरी दी है। इसमें चौड़ी सड़कें, ग्रीन स्पेस और आधुनिक आवासीय-व्यावसायिक जोन सरकार खुद प्लान करके बनाएगी ताकि पुराने शहरों पर दबाव कम हो।
2. अर्थव्यवस्था और रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता
- नीतीश कुमार ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे पुल, एक्सप्रेसवे) के लिए ग्लोबल और नेशनल टेंडरिंग को बढ़ावा दिया। इसमें अक्सर देश की बड़ी बाहरी कंपनियां (L&T, SP Singla आदि) ठेके ले जाती थीं, जिससे बिहार का पैसा राज्य से बाहर चला जाता था।
- सम्राट सरकार ने आते ही बिहार पब्लिक वर्क्स कोड में बड़ा संशोधन किया है। नए नियम के तहत 50 करोड़ रुपए तक के टेंडर में स्थानीय ठेकेदारों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसका सीधा मकसद राज्य के पैसे को राज्य के भीतर रखना और स्थानीय युवाओं के लिए व्यापार व रोजगार के अवसर पैदा करना है।
- इसके अलावा कैबिनेट युवाओं के लिए आईटी (IT), AI और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक कोर्सों को बढ़ावा देने वाले एजेंडों को तुरंत पास कर रही है ताकि 5 वर्षों में 1 करोड़ रोजगार का लक्ष्य पूरा हो सके।

3. क्वालिटी एजुकेशन पर ज्यादा जोर, हर ब्लॉक में डिग्री कॉलेज
- नीतीश सरकार ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विस्तार पर काम किया। हर टोले में स्कूल खोलना, साइकिल-पोशाक योजना के जरिए ड्रॉप-आउट रेट कम करना और नियोजित शिक्षकों की बड़े पैमाने पर भर्ती।
- सम्राट सरकार अब शिक्षा की गुणवत्ता और आधुनिकीकरण पर फोकस कर रही है। सरकार ने 800 करोड़ रुपए का बजट पास कर हर ब्लॉक में कम से कम एक उच्च माध्यमिक विद्यालय को ‘मॉडल स्कूल’ के रूप में अपग्रेड करने का फैसला लिया है। साथ ही जिन 208 ब्लॉकों में अब तक कोई डिग्री कॉलेज नहीं था, वहां तुरंत डिग्री कॉलेज खोलने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
4. प्राइवेट स्कूल और कोचिंग पर लगाम की कोशिश
- नीतीश सरकार ने प्राइवेट स्कूलों या कोचिंग संस्थानों के कामकाज में बहुत अधिक प्रशासनिक दखल नहीं दिया। वे मानते थे कि सरकारी व्यवस्था (जैसे सिमुलतला स्कूल) को मजबूत करके प्राइवेट स्कूलों से मुकाबला किया जाए।
- सम्राट सरकार ने मिडिल क्लास को राहत देने के लिए प्राइवेट स्कूलों पर कड़ा नियमन लागू किया है। नए आदेश के तहत सभी निजी स्कूलों के लिए अपनी पूरी फीस का स्ट्रक्चर सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया गया है। मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने पर स्कूल की मान्यता रद्द करने और कोचिंग संस्थानों पर 2 लाख रुपए तक के जुर्माने का कड़ा नियम बनाया गया है।







