9 मई, 2026 का दिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है. अवसर था पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण का. लेकिन इस पूरे समारोह में सुर्खियां केवल सत्ता परिवर्तन ने नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन खास तस्वीरों ने बटोरीं. पहली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की जनता के सामने शपथ ग्रहण वाले मंच पर नतमस्तक होकर उपस्थित लाखों के जनसमूह को नमन किया. इसी मंच पर बीजेपी के कार्यकर्ता 98 वर्ष के माखनलाल सरकार (डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सहयोगी), के पीएम नरेंद्र मोदी ने मंच पर उनके चरण स्पर्श किए, आशीर्वाद लिया और उनका बड़ा सम्मान किया. इससे पहले एक और तस्वीर तब सामने आई जब पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण समारोह ‘पचीस बैशाख’ को कवि-गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया. इस अवसर पर कवि-गुरु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां भी संपूर्ण श्रद्धा भाव से उनकी तस्वीर के सामने नमन होते देखे गए.
जब मौन संवाद भाषणों पर भारी पड़ता है!
कहा जाता है कि- राजनीति में किसी नेता के कहे गए शब्द या भाषण प्राय: याद नहीं रहते, या यूं कहिए कि भुला दिए जाते हैं, लेकिन कई ऐसे दृश्य होते हैं जो इतिहास बन कर मन मस्तिष्क में समा जाते हैं. 9 मई को पश्चिम बंगाल की धरती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे ही दृश्यों को चरितार्थ किया. जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र के प्रधान ने, जनता के सामने पूरी तरह झुककर नमन किया तो वह ‘शासक’ और ‘शासित’ के बीच की दीवार को एक झटके में ढहाते हुए नजर आए. दरअसल, यह पीएम मोदी की वह राजनीतिक शैली है जो उन्हें शुद्ध राजनीतिज्ञ से ऊपर उठाकर एक ‘जननायक’ की छवि प्रदान करती है और जनमानस को बड़ा संदेश देती है. यह नमन केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि उस जनशक्ति को यह अनुभव कराना है कि सत्ता का वास्तविक अधिष्ठान दिल्ली के गलियारे नहीं, बल्कि जनता जनार्दन के दिलों में है.

सत्ता के शीर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनशक्ति को दंडवत: बंगाल की देहरी पर मोदी का नमन और ‘सोनार बांग्ला’ के नए युग की शुरुआत.
पीएम मोदी ने दिया लोकतंत्र का सच्चा संदेश
समारोह में प्रधानमंत्री मोदी मंच पर खड़े हुए और पूरे समर्पण से पश्चिम बंगाल की जनता को नमन किया. उन्होंने दंडवत प्रणाम की मुद्रा में झुककर कहा, “मैं पश्चिम बंगाल की जनशक्ति को नमन करता हूं.” यह संकेत सामान्य नहीं था. 15 साल बाद ममता बनर्जी के शासन का अंत करके भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद जनता को धन्यवाद देना था. यह तस्वीर लोकतंत्र में जनता की सर्वोच्चता का संदेश देती है. मोदी जी अक्सर कहते हैं कि जनता ही सबसे बड़ा नेता है. इस नमन से उन्होंने साबित किया कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, न कि अहंकार के लिए. बंगाल की जनता ने परिवर्तन का निर्णय लिया तो प्रधानमंत्री मोदी ने सिर झुका दिया. यह सकारात्मक राजनीति का उदाहरण है जहां विजेता भी जनता को सम्मान देकर और विनम्र रहकर स्वयं के कद को और ऊंचा कर जाता है.
माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श, जड़ों से जुड़ाव का संदेश
दूसरी तस्वीर और भी भावुक कर देने वाली थी. प्रधानमंत्री मोदी ने मंच पर 98 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया. बता दें कि माखनलाल सरकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे हैं और भाजपा की नींव के समय से जुड़े हैं. माखनलाल सरकार जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे हैं और वे संघर्ष और निष्ठा के प्रतीक हैं. उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की अंतिम यात्रा में भी साथ दिया था और आज तक भाजपा से जुड़े रहे हैं.
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जब 98 साल की ‘निष्ठा’ के आगे झुका देश का प्रधान: माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श कर मोदी ने दिया कार्यकर्ता की तपस्या को सर्वोच्च सम्मान .
‘नतमस्तक मोदी’: मूल्यों की राजनीति का सार्वजनिक सम्मान
पीएम मोदी का एक पुराने कार्यकर्ता को दिया गया यह सम्मान भाजपा के उस कैडर को संदेश है कि पार्टी अपनी जड़ों और अपने संघर्ष करने वाले ‘सिपाहियों’ को कभी नहीं भूलती. पीएम मोदी का यह सम्मान केवल एक बुजुर्ग के प्रति आदर नहीं था, यह उन लाखों अज्ञात कार्यकर्ताओं के प्रति कृतज्ञता थी जिन्होंने सालों तक बंगाल में भाजपा को खड़ा किया. विपक्षी राज्यों में भी संघर्ष करते कार्यकर्ताओं को यह संदेश गया कि उनका परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है और न जाएगा.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘पचीस बैशाख’ का संदेश
तीसरी तस्वीर में पीएम मोदी कवि-गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर के सामने नतमस्तक नजर आए. शपथ ग्रहण ‘पचीस बैशाख’ यानी टैगोर जयंती के दिन रखा गया. पीएम मोदी और सुवेंदु अधिकारी ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. दरअसल, बंगाल की सांस्कृतिक पहचान टैगोर से जुड़ी है. इस दिन समारोह रखकर भाजपा ने दिखाया कि वह बंगाल की आत्मा को समझती है. ‘सोनार बांग्ला’ का सपना अब विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक गौरव के साथ पूरा होगा.

बंगाल में बाहरी होने का नैरेटिव ध्वस्त हुआ, रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर श्रद्धा भाव से झुके पीएम मोदी, बंगाल के बौद्धिक गौरव को दिया वैश्विक सम्मान.
बंगाल की ‘सांस्कृतिक आत्मा’ को जीतने का मनोवैज्ञानिक शंखनाद
रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर नमन से मोदी का संदेश साफ है- राजनीति संस्कृति और विरासत को नकार नहीं सकती, बल्कि अपनाकर आगे बढ़नी चाहिए. प्रधानमंत्री का कवि-गुरु की तस्वीर के सामने नतमस्तक होना यह संदेश देता है कि भाजपा बंगाल की संस्कृति, साहित्य और विरासत को आत्मसात कर चुकी है . विरोधियों के ‘बाहरी’ होने के आरोपों को खारिज करते हुए मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि टैगोर और उनकी विरासत पूरे भारत की है, और बंगाल की नई सरकार इसी सांस्कृतिक चेतना की नींव पर चलेगी .
‘नतमस्तक नरेंद्र मोदी’ के संदेश क्या हैं?
अगर नरेंद्र मोदी जी के मन की बात पढ़ी जा सके, या उनके हाव-भाव के पीछे के कारण जाने जा सकें, तो लगता है कि देश की दिशा बहुत जल्दी बदल सकती है. लेकिन नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व केवल सांकेतिक रूप से संदेश देते हैं, सब कुछ कहते नहीं. इसको आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि बीजेपी ऐसे ही भारत के अधिकांश राज्यों प्रशासन नहीं कर रही है कुछ तो वह बाकी पार्टियों से अलग कर रहे हैं. स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जनता के मन मस्तिष्क पर पकड़ बनाना बीजेपी के नेतृत्व को बहुत अच्छे से आता है.
सत्ता के शीर्ष से ‘नतमस्तक मोदी’ केवल चुनावी जीत नहीं!
दरअसल, ये वही राजनीतिक शैली है जिसने उन्हें करोड़ों लोगों से भावनात्मक रूप से जोड़ रखा है. जब एक प्रधानमंत्री मंच से झुककर जनता को प्रणाम करते हैं, तो वो खुद को शासक नहीं बल्कि सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं. यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति भी है कि लोगों को यह महसूस कराना कि उनकी ताकत जनता से आती है. पश्चिम बंगाल की धरती को नमन करते हुए उन्होंने सिर्फ सम्मान नहीं दिखाया, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव भी बना लिया.

बंगाल चुनाव में प्रचंड जीत के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनता के सामने झुकना यह दर्शाता है कि सत्ता सेवा का माध्यम है, शक्ति प्रदर्शन का नहीं .
‘नतमस्तक मोदी’: सत्ता नहीं, सेवा का संकल्प
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नमन होना यह बताता है कि वे बंगाल को केवल एक राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रेरणा पुंज के रूप में देखते हैं. यह ‘नमन’ बंगाल की जनता के प्रति जवाबदेही का वादा है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन प्रतीकों से उपजी ऊर्जा बंगाल के विकास में कितनी सहायक होती है, लेकिन फिलहाल इन तस्वीरों ने बंगाल के लोगों का दिल जीतने में बड़ी भूमिका निभाई है.
‘नतमस्तक मोदी’, जनता, विरासत और संस्कृति का सम्मान
एक पत्रकार की दृष्टि से देखें तो प्रधानमंत्री मोदी के इन हाव-भावों के पीछे एक गहरी रणनीति छिपी है. वे जानते हैं कि बंगाल एक ऐसा राज्य है जो अपनी अस्मिता और सम्मान के प्रति बेहद संवेदनशील है. यहां सत्ता का रास्ता सचिवालय से नहीं, बल्कि लोगों के घरों और उनके सांस्कृतिक प्रतीकों से होकर गुजरता है. प्रधानमंत्री का यह ‘नतमस्तक’ स्वरूप उस सेवक भाव को प्रदर्शित करता है, जो आम जनता को यह महसूस कराता है कि ‘लोकतंत्र में वे (जनता) ही असली मालिक हैं’.
9 मई, 2026 का दिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है. अवसर था पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण का. लेकिन इस पूरे समारोह में सुर्खियां केवल सत्ता परिवर्तन ने नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन खास तस्वीरों ने बटोरीं. पहली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की जनता के सामने शपथ ग्रहण वाले मंच पर नतमस्तक होकर उपस्थित लाखों के जनसमूह को नमन किया. इसी मंच पर बीजेपी के कार्यकर्ता 98 वर्ष के माखनलाल सरकार (डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सहयोगी), के पीएम नरेंद्र मोदी ने मंच पर उनके चरण स्पर्श किए, आशीर्वाद लिया और उनका बड़ा सम्मान किया. इससे पहले एक और तस्वीर तब सामने आई जब पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण समारोह ‘पचीस बैशाख’ को कवि-गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया. इस अवसर पर कवि-गुरु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां भी संपूर्ण श्रद्धा भाव से उनकी तस्वीर के सामने नमन होते देखे गए.
जब मौन संवाद भाषणों पर भारी पड़ता है!
कहा जाता है कि- राजनीति में किसी नेता के कहे गए शब्द या भाषण प्राय: याद नहीं रहते, या यूं कहिए कि भुला दिए जाते हैं, लेकिन कई ऐसे दृश्य होते हैं जो इतिहास बन कर मन मस्तिष्क में समा जाते हैं. 9 मई को पश्चिम बंगाल की धरती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे ही दृश्यों को चरितार्थ किया. जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र के प्रधान ने, जनता के सामने पूरी तरह झुककर नमन किया तो वह ‘शासक’ और ‘शासित’ के बीच की दीवार को एक झटके में ढहाते हुए नजर आए. दरअसल, यह पीएम मोदी की वह राजनीतिक शैली है जो उन्हें शुद्ध राजनीतिज्ञ से ऊपर उठाकर एक ‘जननायक’ की छवि प्रदान करती है और जनमानस को बड़ा संदेश देती है. यह नमन केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि उस जनशक्ति को यह अनुभव कराना है कि सत्ता का वास्तविक अधिष्ठान दिल्ली के गलियारे नहीं, बल्कि जनता जनार्दन के दिलों में है.

सत्ता के शीर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनशक्ति को दंडवत: बंगाल की देहरी पर मोदी का नमन और ‘सोनार बांग्ला’ के नए युग की शुरुआत.
पीएम मोदी ने दिया लोकतंत्र का सच्चा संदेश
समारोह में प्रधानमंत्री मोदी मंच पर खड़े हुए और पूरे समर्पण से पश्चिम बंगाल की जनता को नमन किया. उन्होंने दंडवत प्रणाम की मुद्रा में झुककर कहा, “मैं पश्चिम बंगाल की जनशक्ति को नमन करता हूं.” यह संकेत सामान्य नहीं था. 15 साल बाद ममता बनर्जी के शासन का अंत करके भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद जनता को धन्यवाद देना था. यह तस्वीर लोकतंत्र में जनता की सर्वोच्चता का संदेश देती है. मोदी जी अक्सर कहते हैं कि जनता ही सबसे बड़ा नेता है. इस नमन से उन्होंने साबित किया कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, न कि अहंकार के लिए. बंगाल की जनता ने परिवर्तन का निर्णय लिया तो प्रधानमंत्री मोदी ने सिर झुका दिया. यह सकारात्मक राजनीति का उदाहरण है जहां विजेता भी जनता को सम्मान देकर और विनम्र रहकर स्वयं के कद को और ऊंचा कर जाता है.
माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श, जड़ों से जुड़ाव का संदेश
दूसरी तस्वीर और भी भावुक कर देने वाली थी. प्रधानमंत्री मोदी ने मंच पर 98 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया. बता दें कि माखनलाल सरकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे हैं और भाजपा की नींव के समय से जुड़े हैं. माखनलाल सरकार जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे हैं और वे संघर्ष और निष्ठा के प्रतीक हैं. उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की अंतिम यात्रा में भी साथ दिया था और आज तक भाजपा से जुड़े रहे हैं.
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‘नतमस्तक मोदी’: मूल्यों की राजनीति का सार्वजनिक सम्मान
पीएम मोदी का एक पुराने कार्यकर्ता को दिया गया यह सम्मान भाजपा के उस कैडर को संदेश है कि पार्टी अपनी जड़ों और अपने संघर्ष करने वाले ‘सिपाहियों’ को कभी नहीं भूलती. पीएम मोदी का यह सम्मान केवल एक बुजुर्ग के प्रति आदर नहीं था, यह उन लाखों अज्ञात कार्यकर्ताओं के प्रति कृतज्ञता थी जिन्होंने सालों तक बंगाल में भाजपा को खड़ा किया. विपक्षी राज्यों में भी संघर्ष करते कार्यकर्ताओं को यह संदेश गया कि उनका परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है और न जाएगा.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘पचीस बैशाख’ का संदेश
तीसरी तस्वीर में पीएम मोदी कवि-गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर के सामने नतमस्तक नजर आए. शपथ ग्रहण ‘पचीस बैशाख’ यानी टैगोर जयंती के दिन रखा गया. पीएम मोदी और सुवेंदु अधिकारी ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. दरअसल, बंगाल की सांस्कृतिक पहचान टैगोर से जुड़ी है. इस दिन समारोह रखकर भाजपा ने दिखाया कि वह बंगाल की आत्मा को समझती है. ‘सोनार बांग्ला’ का सपना अब विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक गौरव के साथ पूरा होगा.

बंगाल में बाहरी होने का नैरेटिव ध्वस्त हुआ, रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर श्रद्धा भाव से झुके पीएम मोदी, बंगाल के बौद्धिक गौरव को दिया वैश्विक सम्मान.
बंगाल की ‘सांस्कृतिक आत्मा’ को जीतने का मनोवैज्ञानिक शंखनाद
रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर नमन से मोदी का संदेश साफ है- राजनीति संस्कृति और विरासत को नकार नहीं सकती, बल्कि अपनाकर आगे बढ़नी चाहिए. प्रधानमंत्री का कवि-गुरु की तस्वीर के सामने नतमस्तक होना यह संदेश देता है कि भाजपा बंगाल की संस्कृति, साहित्य और विरासत को आत्मसात कर चुकी है . विरोधियों के ‘बाहरी’ होने के आरोपों को खारिज करते हुए मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि टैगोर और उनकी विरासत पूरे भारत की है, और बंगाल की नई सरकार इसी सांस्कृतिक चेतना की नींव पर चलेगी .
‘नतमस्तक नरेंद्र मोदी’ के संदेश क्या हैं?
अगर नरेंद्र मोदी जी के मन की बात पढ़ी जा सके, या उनके हाव-भाव के पीछे के कारण जाने जा सकें, तो लगता है कि देश की दिशा बहुत जल्दी बदल सकती है. लेकिन नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व केवल सांकेतिक रूप से संदेश देते हैं, सब कुछ कहते नहीं. इसको आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि बीजेपी ऐसे ही भारत के अधिकांश राज्यों प्रशासन नहीं कर रही है कुछ तो वह बाकी पार्टियों से अलग कर रहे हैं. स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जनता के मन मस्तिष्क पर पकड़ बनाना बीजेपी के नेतृत्व को बहुत अच्छे से आता है.
सत्ता के शीर्ष से ‘नतमस्तक मोदी’ केवल चुनावी जीत नहीं!
दरअसल, ये वही राजनीतिक शैली है जिसने उन्हें करोड़ों लोगों से भावनात्मक रूप से जोड़ रखा है. जब एक प्रधानमंत्री मंच से झुककर जनता को प्रणाम करते हैं, तो वो खुद को शासक नहीं बल्कि सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं. यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति भी है कि लोगों को यह महसूस कराना कि उनकी ताकत जनता से आती है. पश्चिम बंगाल की धरती को नमन करते हुए उन्होंने सिर्फ सम्मान नहीं दिखाया, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव भी बना लिया.

बंगाल चुनाव में प्रचंड जीत के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनता के सामने झुकना यह दर्शाता है कि सत्ता सेवा का माध्यम है, शक्ति प्रदर्शन का नहीं .
‘नतमस्तक मोदी’: सत्ता नहीं, सेवा का संकल्प
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नमन होना यह बताता है कि वे बंगाल को केवल एक राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रेरणा पुंज के रूप में देखते हैं. यह ‘नमन’ बंगाल की जनता के प्रति जवाबदेही का वादा है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन प्रतीकों से उपजी ऊर्जा बंगाल के विकास में कितनी सहायक होती है, लेकिन फिलहाल इन तस्वीरों ने बंगाल के लोगों का दिल जीतने में बड़ी भूमिका निभाई है.
‘नतमस्तक मोदी’, जनता, विरासत और संस्कृति का सम्मान
एक पत्रकार की दृष्टि से देखें तो प्रधानमंत्री मोदी के इन हाव-भावों के पीछे एक गहरी रणनीति छिपी है. वे जानते हैं कि बंगाल एक ऐसा राज्य है जो अपनी अस्मिता और सम्मान के प्रति बेहद संवेदनशील है. यहां सत्ता का रास्ता सचिवालय से नहीं, बल्कि लोगों के घरों और उनके सांस्कृतिक प्रतीकों से होकर गुजरता है. प्रधानमंत्री का यह ‘नतमस्तक’ स्वरूप उस सेवक भाव को प्रदर्शित करता है, जो आम जनता को यह महसूस कराता है कि ‘लोकतंत्र में वे (जनता) ही असली मालिक हैं’.







