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ऐतिहासिक विजय के कर्णधार कौन !

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May 7, 2026
in खास खबर
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ऐतिहासिक विजय के कर्णधार कौन !
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पश्चिम बंगाल और असम में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक विजय वाकई आश्चर्यजनक है। वैसे ही मतदान वाले दिन भारी संख्या में वोटरों का मतदान केंद्रों पर आना चौंकाने वाला था, लेकिन 4 मई को जो नतीजे आए, वो सब आश्चर्य में डालने वाले थे।

बंगाल में आज़ादी के बाद पहली बार भाजपा की सरकार बनेगी, तमिलनाडु में 60 साल बाद द्रविड़ राजनीति की विदाई हो गई, परिवारवादी सियासत पर ब्रेक लगा और पहली बार चुनाव लड़ रहे सुपरस्टार जोसेफ विजय राजनीति में एक नये नायक के रूप में उभरे।

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2014 के बाद पिछले 12 साल में भाजपा का समूचे भारत में जिस तरह विस्तार हुआ, वह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, उस समय भाजपा और उसके मित्र दलों की सात राज्यों में सरकारें थीं, जबकि कांग्रेस और उसके मित्र दलों की 14 राज्यों में सरकारें थी। सात राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारें थी। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर पूर्वी राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं थी। चार साल बाद 2018 में भाजपा ने अपने पैर पसारे। यूपी, महाराष्ट्र, असम और जम्मू कश्मीर में भाजपा और मित्र दलों की सरकारें बनीं।

आज तस्वीर बिल्कुल अलग है। 22 राज्यों में भाजपा और उसके मित्र दलों की सरकारें हैं, जबकि कांग्रेस और उसके मित्र दलों की सिर्फ 6 राज्यों में सरकारें हैं। भाजपा की अपनी सरकारें 14 राज्यों में हैं, जबकि बाकी 8 राज्यों में मित्र दलों के साथ उसकी सरकारें हैं

कांग्रेस उल्टी दिशा में बहने लगी। 2014 में कांग्रेस और उसके मित्र दलों की सरकारें 14 राज्यों में थी, जहां की आबादी 44.5 करोड़ थी। अब यह सिमट कर 8 राज्यों की केवल 20.6 करोड़ आबादी तक सीमित रह गई।

प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 12 साल में नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को चुनाव लड़ना और जीतना सिखाया। जहां सरकारें बनीं वहां फिर से सफलता पाना सिखाया।

आज देश के 22 राज्यों में NDA की सरकारें हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक कमल खिला है और जीत की ललक का आलम ये है कि बंगाल में ऐतिहासिक जीत के बाद अभी से ही पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारी शुरू हो गई। जीत की ये लालसा जगाने का और बीजेपी को इसके लिए तैयार करने का पूरा श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है।

पश्चिम बंगाल

मुझे आज वो दिन याद आया जब 1993 में कोलकाता में Writers’ building (राज्य सचिवालय) की सीढ़ियों पर ममता बनर्जी को बालों से पकड़कर घसीटा गया था। तब उन्होंने कसम खाई थी कि वो मुख्यमंत्री बनकर ही Writers’ building में लौटेंगी। 2011 में उन्होंने कसम पूरी की लेकिन आज नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति ने ममता को 15 साल बाद मुख्यमंत्री के कार्यालय से बाहर कर दिया। खुद ममता बनर्जी भवानीपुर से चुनाव हार गईं।

ममता बनर्जी जबरदस्त फाइटर हैं। उन्हें हराना आसान नहीं था। इस चुनाव का micro management और बूथ लेवल की इंजीनियरिंग का काम अमित शाह ने अपने हाथ में लिया। सबसे पहले 2021 के चुनाव में जो गलतियां हुईं थीं, उनको ठीक किया, ममता पर व्यक्तिगत हमले बंद किए, बीजेपी ने इस बार बंगाल में चुनाव स्थानीय परिवेश में लड़ा। मुद्दे स्थानीय थे, प्रतीक स्थानीय थे, देवी-देवता स्थानीय थे, खाना-पीना, संस्कृति सब स्थानीय। स्थानीय प्रतीकों जैसे झालमूड़ी, काली बाड़ी पर मोदी ने भी फोकस किया। बीजेपी के नेता मछली लेकर चुनाव प्रचार करते दिखे। बीजेपी ने छोटे-छोटे काम किए जिनका असर बड़ा हुआ, जैसे 80 हजार फुटबॉल बांटे, 5000 क्रिकेट बैट बांटे। 220 विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर चार्जशीट बांटे गय़े।  100 किलोमीटर की परिवर्तन यात्रा निकाली। मछली और झालमुड़ी से बंगालियों के दिलों को छुआ।

सबसे बड़ी बात, लोगों के दिलो दिमाग से ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का भय खत्म किया। इसीलिए 93 प्रतिशत मतदान हुआ। पश्चिम बंगाल के नतीजे का मतलब है कि ममता बनर्जी का वोटर बेस कमजोर हुआ है। नौजवान और महिला वोटर पूरी तरह बीजेपी के साथ जुड़े, जो भद्रलोक डर के मारे घर से नहीं निकलते थे, वे भी वोट देने आए। ममता बदला चाहतीं थीं, मोदी बदलाव चाहते थे। मोदी ने हिंदू वोटों को लामबंद किया, ममता का मुस्लिम वोटर बैंक भी बिखर गया। इसीलिए बीजेपी को इतनी जबरदस्त जीत मिली।

बंगाल के चुनाव नतीजों का असर देश की सियासत पर भी होगा। अब मोदी को चुनौती देने वाला विपक्ष के पास कोई नेता नहीं है। ममता दावा करती थीं कि अकेली वही हैं जो मोदी से टकरा सकती हैं, मोदी को हरा सकती हैं, लेकिन बंगाल की जनता ने जवाब दे दिया। मोदी को चुनौती देने वाले दूसरे नेता थे, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन। आज तमिलनाडु की जनता ने स्टालिन को भी घर भेज दिया।

तमिलनाडु

जोसेफ विजय चंद्रशेखर को लोग सुपरस्टार विजय के नाम से जानते हैं। अब वो चीफ मिनिस्टर विजय के रूप में जाने जाएंगे। विजय ने एक्टिंग के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी। अब राजनीति के लिए उन्होंने एक्टिंग छोड़ दी। विजय को फॉर्मूला फिल्मों ने मास हीरो बनाया लेकिन उन्होंने राजनीति का सेट फॉर्मूला छोड़ा तो  जनता ने उन्हें Chief Minister बना दिया।

विजय देश के highest paid actors में एक हैं लेकिन उन्होंने 2024 में ऐलान कर दिया कि “थलपति 69” उनकी आखिरी फिल्म होगी। बाद में “जन नायगन” फिल्म बनाई, लेकिन चुनाव आने के कारण ये फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। विजय ने ये मैसेज दिया कि उन्हें पैसे से प्यार नहीं है, तमिलनाडु की जनता से प्यार है। विजय की पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है, न ही संगठन है लेकिन उनके पास फैन्स क्लब का अच्छा नेटवर्क है जिसके बल पर चुनाव लड़ा।

जहां स्टालिन और उनके बेटे सत्ता के अहंकार में जनता की पहुंच से दूर हो गए थे, विजय ने खुद को आम इंसान की तरफ पेश किया, लोगों के बीच गए, उन्हें समझाया कि वह उनके भाई हैं। विजय पहली बार मैदान में उतरे और साठ के दशक से चले आ रहे DMK और AIADMK के वर्चस्व को एक झटके में खत्म कर दिया। जो काम राष्ट्रीय पार्टियां 60 साल में नहीं कर पाईं, वह काम विजय ने सिर्फ दो साल में कर दिखाया। ये किसी चमत्कार से कम नहीं है।

असम

असम में भाजपा को हैट्रिक जीत दिलाने वाले  मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा को राहुल गांधी बेहद नापसंद करते हैं। उनको हराने के लिए कांग्रेस ने बड़ी भारी रणनीति बनाई थी। कांग्रेस के नेताओं ने हिमंता पर बेसिरपैर के इल्जाम लगाए, व्यक्तिगत स्तर पर हमला किया। लेकिन हिमंता राहुल गांधी और कांग्रेस को अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने बिना घबराए आजकल के T-20 सलामी बैट्समैन की तरह जबरदस्त बैटिंग की। शुरुआती दौर में इतने छक्के मारे कि कांग्रेस का सारा प्लान फेल हो गया।

हिमंता ने कांग्रेस के हिंदू नेताओं को बीजेपी में आने का निमंत्रण दिया। कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी करार दे दिया। हिमंता ने “मियां” मुसलमानों को टारगेट किया। लाइन क्लीयर थी, नैरैटिव साफ था, कांग्रेस पूरी तरह ट्रैप में फंस गई। और नतीजा ये हुआ कि गौरव गोगोई चुनाव हार गए और कांग्रेस सिर्फ उन इलाकों में जीती, जहां मुस्लिम वोट ज्यादा थे।। हिमंता विश्व शर्मा की जीत राहुल गांधी को काफी परेशान करेगी।

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