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केरल में सत्ता विरोधी लहर और कांग्रेस की एकजुटता का दिखा रंग………………

UB India News by UB India News
May 6, 2026
in TAZA KHABR
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केरल में सत्ता विरोधी लहर और कांग्रेस की एकजुटता का दिखा रंग………………
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कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने केरलम में एक दशक बाद सत्ता में जबरदस्त वापसी की है। यूडीएफ में कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), केरल कांग्रेस (केईसी) और रिवोल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी ऑफ इंडिया (आरएमपीआई) शामिल हैं। यूडीएफ की जीत की मुख्य वजहें कांग्रेस में आंतरिक एकजुटता कायम रखना, सत्ता विरोधी लहर और सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यूडीएफ ने इस चुनाव में 60 फीसदी मतों के साथ 102 सीटें जीतीं।

सत्ता विरोधी लहर : यूडीएफ की जीत के पीछे काफी हद तक 2016 से लगातार सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के प्रति जनता का गुस्सा है। शासन-प्रशासन, आर्थिक दबाव और राजनीतिक अहंकार के आरोपों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने इस आम धारणा को और मजबूत किया कि एलडीएफ लंबे समय तक सत्ता में रहने के बोझ तले दब गया है। राज्य की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर निर्णायक भूमिका निभाती रही है। मतदाताओं ने अक्सर बदलाव को प्राथमिकता दी है। इसके चलते सरकारें एक या दो कार्यकाल से अधिक सत्ता में बने रहने के लिए संघर्ष करती रही हैं। यह पैटर्न आंकड़ों में साफ दिखता है। 2001 में यूडीएफ 100 सीटें जीतकर सत्ता में आई, जबकि  एलडीएफ को 41 सीटें िमली थीं।  पांच साल बाद 2006 में एलडीएफ ने 102 सीटें जीतकर सत्ता में जोरदार वापसी की। हालांकि 2011 में, उसकी सीटें फिर  तेजी से गिरकर 70 रह गईं। ये उतार-चढ़ाव केरल के सत्ता-विरोधी चक्र को दर्शाते हैं।

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ईसाई वोटों का एकीकरण

त्रिशूर, आरनमुला, कुन्नाथुनाड, पथानामथिट्टा व कोट्टायम जैसी सीटों वाला मध्य केरलम एक बार फिर मुख्य चुनावी अखाड़े के तौर पर उभरा। इनमें से कई सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की। ऐसे में यूडीएफ के पीछे ईसाई वोटों का एकजुट होना इस गठबंधन की वापसी का एक बड़ा कारण रहा। एलडीएफ ने कल्याणकारी उपायों और प्रभावशाली सामुदायिक समूहों के साथ गठबंधन के जरिये ईसाइयों में समर्थन बढ़ाने की कोशिश की थी पर समुदाय के कुछ वर्गों को उसका वैचारिक बदलाव और राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास रास नहीं आया। ईसाई मतदाताओं ने ऐसे मुद्दों पर आधारित विकल्प चुना जो कृषि संकट, रबर की कीमतों, मानव-वन्यजीव संघर्ष  व अल्पसंख्यक कल्याण पर केंद्रित हैं। यूडीएफ को इस बदलाव से फायदा हुआ। उसने खुद को अल्पसंख्यक हितों के अधिक भरोसेमंद राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में पेश कर मध्य केरलम में अपना आधार पुन: हासिल कर लिया।

एलडीएफ की सांस फूली…विजयन की फीकी जीत
एलडीएफ के कई उम्मीदवार अपने गढ़ों में चुनाव हार गए। धर्मदम में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कड़े मुकाबले में महज 19,247 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर पाए। दिलचस्प बात यह है कि वामपंथियों के गढ़ पेरावूर में कांग्रेस प्रत्याशी ने राज्य की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शैलजा को हरा दिया। जबकि शैलजा की राज्य में कोविड संकट से निपटने के तरीके के लिए काफी सराहना की गई थी। एक अन्य कम्युनिस्ट गढ़ कन्नूर में भी कांग्रेस आगे है।

वाम सरकार का वैचारिक बदलाव
यूडीएफ की वापसी की एक वजह यह भी है कि लोगों में धारणा बनी कि सत्ता में एक दशक बिताने के बाद वामपंथ अपने पारंपरिक वैचारिक रुख से भटक गया है। यूडीएफ ने एलडीएफ पर ठीक वैसी ही भाषा और रणनीतियां अपनाने का आरोप लगाया जिनकी उसने कभी आलोचना की थी। यह बात जमात-ए-इस्लामी को लेकर हुए विवाद के दौरान विशेष रूप से सामने आई, जब भाकपा नेताओं ने इस संगठन के साथ संबंधों को लेकर यूडीएफ पर हमला बोला और इसके लिए उन्होंने ऐसी बयानबाजी की जिसे विरोधियों ने खुले तौर पर सांप्रदायिक करार दिया।

  • एके बालन की मराड दंगों का जिक्र करने वाली टिप्पणियों और सीएम पी विजयन के शुरू में उनका समर्थन करने से कांग्रेस को यह तर्क देने का मौका मिल गया कि वामपंथी दल अब तेजी से उसी ध्रुवीकरण की राजनीति की नकल कर रहे हैं, जिसका वे ऐतिहासिक रूप से विरोध करते रहे हैं। साथ ही एलडीएफ के धार्मिक व सामुदायिक समूहों तक पहुंच बनाने के प्रयास ने वैचारिक पुनर्समायोजन की धारणा को मजबूत किया।
  • सबरीमला विवाद के दौरान भाकपा के पहले के कड़े रुख के बावजूद, ग्लोबल अयप्पा संगमम के लिए सरकार के सक्रिय समर्थन को विपक्ष ने बहुसंख्यक तुष्टीकरण के प्रयास के रूप में पेश किया। समस्ता जैसे प्रभावशाली मुस्लिम संगठनों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए वामपंथियों की ओर से किए गए प्रयासों ने यूडीएफ के इस दावे को और मजबूत किया कि भाकपा अपनी पुरानी वर्ग-आधारित राजनीति के बजाय, एक सावधानीपूर्वक संतुलित पहचान की राजनीति अपना रही है।

राहुल व प्रियंका की निजी अपील का असर
केरलम में यूडीएफ की वापसी का एक और कारण राहुल गांधी व प्रियंका गांधी का जनता से व्यक्तिगत जुड़ाव माना जा रहा है। खासकर वायनाड में भूस्खलन के बाद प्रियंका ने बतौर स्थानीय सांसद लोकसभा में मुआवजे का मुद्दा कई बार उठाया, जिससे उन्हें लोगों का भरोसा मिला। कांग्रेस ने कल्याणकारी वादों पर विशेष जोर दिया। चुनाव अभियान का राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व राहुल ने किया। इस रणनीति का एक अहम हिस्सा महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाना था।

फातिमा आईयूएमएल की पहली महिला विधायक
केरल की राजनीति में नया अध्याय जुड़ा, जब इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) की फातिमा थाहिलिया पार्टी की पहली महिला विधायक बनीं। उन्होंने कोझिकोड की पेराम्ब्रा सीट पर एलडीएफ संयोजक टीपी रामकृष्णन को हराया। थाहिलिया 2022 में आईयूएमएल के भीतर लैंगिक समानता की मांग उठाने के बाद चर्चा में आई थीं। वह मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन की महिला इकाई ‘हरीथा’ की संस्थापक राज्य अध्यक्ष भी रही हैं। आईयूएमएल ने कुल 27 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें पेशे से वकील और कोझिकोड नगर निगम की पार्षद रह चुकी थाहिलिया समेत दो महिला उम्मीदवार थीं।

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