एक नौसिखिया निवेशक भी इस बात को गांठ बांधकर चलता है कि अगर शेयर बाजार में गिरावट आई है और दुनिया में कहीं भी युद्ध लड़ा जा रहा है तो निश्चित रूप से सोना एक सुरक्षित जगह बन जाता है. ऐसा पहले दर्जनों बार हुआ भी है. चाहे रूस और यूक्रेन का युद्ध हो या फिर पिछले साल ईरान पर अमेरिका और इजराइल की बमबारी. हर बार सोने पर दांव खेलना ही सबसे सुरक्षित रहा है. फिर इस बार ऐसा क्या हुआ जो मिसाइलों की धधकती आग और ढहते शेयर बाजार के बीच सोना तपकर कुंदन बनने के बजाय टूटता जा रहा है. आखिर जोखिम में सुरक्षित बनकर सामने आने वाला सोना इस बार क्यों निवेशकों में असुरक्षा पैदा कर रहा है.
इसी साल जनवरी के अंत तक ग्लोबल मार्केट में सोने का भाव 5,600 डॉलर प्रति औंस के आसपास दिख रहा था, जो पिछले साल के मुकाबले करीब दोगुना था. लेकिन, युद्ध शुरू होने के बाद से ही इसमें 20 फीसदी तक गिरावट आ चुकी है. इतिहास पर नजर डालें तो सोने का भाव बीते एक दशक में 3 गुना तक बढ़ा है, जिसमें से दोगुना भाव तो बीते साल से ही दिख रहा है. हमेशा से ही खतरे बढ़ने सुरक्षित माना जाने वाले सोने ने अब यह भ्रम तोड़ दिया है और कीमतों में आ रही भारी उथल-पुथल ने निवेशकों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है. इस मुद्दे ने यह सवाल बड़े पैमाने पर उठा दिया है कि आखिर किस वजह से इस बार युद्ध और शेयर बाजार में गिरावट के बावजूद सोना बढ़ने के बजाय घटता जा रहा है.
खतरे में कब-कब खरा उतरा सोना
ईरान और इजराइल युद्ध के पहले भी दुनिया पर कई बार खतरा आया और हर बार सोना खरा उतरा है. साल 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान सोना उन कीमती धातुओं में सबसे स्थिर रहा जिन पर निवेशक हमेशा भरोसा करते हैं. हालांकि, इसकी कीमत गिरी जरूर, लेकिन बाकी कीमती धातुओं जैसी भारी गिरावट नहीं आई. इसके बाद साल 2011 में भी ऐसा ही हुआ, जब रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (S&P) ने पहली बार अमेरिका की AAA क्रेडिट रेटिंग घटाकर AA+ कर दी और ग्लोबल मार्केट में बड़ी गिरावट दिखी. तब भी सोने में निवेश बढ़ा और इसकी कीमतों ने भी जमकर उछाल देखा था. कोरोनाकाल के दौरान जब शेयर बाजार थोक के भाव गिर रहे थे, तब भी सोने और चांदी की डिमांड निवेशकों के बीच बनी हुई थी.
ईरान और इजराइल युद्ध के पहले भी दुनिया पर कई बार खतरा आया और हर बार सोना खरा उतरा है. साल 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान सोना उन कीमती धातुओं में सबसे स्थिर रहा जिन पर निवेशक हमेशा भरोसा करते हैं. हालांकि, इसकी कीमत गिरी जरूर, लेकिन बाकी कीमती धातुओं जैसी भारी गिरावट नहीं आई. इसके बाद साल 2011 में भी ऐसा ही हुआ, जब रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (S&P) ने पहली बार अमेरिका की AAA क्रेडिट रेटिंग घटाकर AA+ कर दी और ग्लोबल मार्केट में बड़ी गिरावट दिखी. तब भी सोने में निवेश बढ़ा और इसकी कीमतों ने भी जमकर उछाल देखा था. कोरोनाकाल के दौरान जब शेयर बाजार थोक के भाव गिर रहे थे, तब भी सोने और चांदी की डिमांड निवेशकों के बीच बनी हुई थी.
इस बार क्यों दिख रहा अलग नजारा
जैसा कि आपको ऊपर बताया कि जब-जब संकट आया तो सोना और चमका है, लेकिन इस बार के संकट में इस पर दबाव दिख रहा है. एक्सपर्ट और बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इस बार की स्थिति इसलिए अलग दिख रही, क्योंकि सारा मामला तेल पर आकर अटक गया है. उसकी दो बड़ी वजहें हैं, एक तो क्रूड की डिमांड औद्योगिक रूप से ज्यादा दिखती है जो सोने में नहीं है. दूसरा कि क्रूड की डिमांड बढ़ने से डॉलर पर भी निवेशकों का जोर बढ़ा है. इसकी वजह साफ है कि दुनियाभर में 90 फीसदी से ज्यादा तेल का कारोबार डॉलर में ही होता है. उद्योगों की बात करें तो उन्हें अपनी जरूरत और जोखिम सोने से कहीं ज्यादा तेल में दिखती है. अगर उन्हें चुनना हो तो निश्चित रूप से तेल को ही चुनेंगे.
जैसा कि आपको ऊपर बताया कि जब-जब संकट आया तो सोना और चमका है, लेकिन इस बार के संकट में इस पर दबाव दिख रहा है. एक्सपर्ट और बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इस बार की स्थिति इसलिए अलग दिख रही, क्योंकि सारा मामला तेल पर आकर अटक गया है. उसकी दो बड़ी वजहें हैं, एक तो क्रूड की डिमांड औद्योगिक रूप से ज्यादा दिखती है जो सोने में नहीं है. दूसरा कि क्रूड की डिमांड बढ़ने से डॉलर पर भी निवेशकों का जोर बढ़ा है. इसकी वजह साफ है कि दुनियाभर में 90 फीसदी से ज्यादा तेल का कारोबार डॉलर में ही होता है. उद्योगों की बात करें तो उन्हें अपनी जरूरत और जोखिम सोने से कहीं ज्यादा तेल में दिखती है. अगर उन्हें चुनना हो तो निश्चित रूप से तेल को ही चुनेंगे.







