बीते सोमवार की रात को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति उपचार केंद्र पर हुए पाकिस्तानी हमले, जिसमें 400 से अधिक लोगों के मरने और करीब ढाई सौ लोगों के घायल होने की खबर है, दोनों देशों के रिश्तों में गहराते तनाव को तो दर्शाते ही हैं, यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का भी घोर उल्लंघन है। एक ओर तो कहा जा रहा है कि ईरान पर हुए अमेरिकी-इस्राइली हमले ने इस्लाम के अंदरूनी मतभेदों को पीछे कर दिया है, लेकिन दूसरी ओर रमजान के पवित्र महीने में एक मुस्लिम राष्ट्र का दूसरे मुस्लिम राष्ट्र पर हमला पाकिस्तान व अफगानिस्तान के रिश्तों में मौजूद अंतर्विरोध को ही दर्शाता है।
दरअसल, जिस तालिबान को पाकिस्तान ने पाला-पोसा, उसी का एक गुट तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) चाहता है कि पाकिस्तानी हुकूमत शरीयत के अनुसार चले और इसलिए वह पाकिस्तान में विभिन्न ठिकानों पर हमले करता रहता है। पाकिस्तान का आरोप है कि काबुल में तालिबानी शासन टीटीपी को संरक्षण देता है, जबकि तालिबान इससे इन्कार करता है। यह पाकिस्तान के लिए अपने गिरेबान में झांकने का भी अवसर है कि आतंकी संगठनों की मदद करने और आश्रय देने का अंजाम क्या होता है। हालांकि, अस्पताल पर हमला किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
जिनेवा कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अस्पताल, स्कूल और नागरिक सुविधाएं युद्ध में भी सुरक्षित रहनी चाहिए। जाहिर है, इस क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता भारत के लिए भी सुरक्षा जोखिम को बढ़ाने वाली है। भारत ने काबुल में पाकिस्तान की ओर से अस्पताल पर हुए हमले की निंदा करते हुए उसे उचित ही ‘कायरतापूर्ण’ और ‘जनसंहार’ बताया है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि यह ‘अफगानिस्तान की संप्रभुता पर सीधा हमला’ है, पर ‘पाकिस्तान अब इस जनसंहार को सैन्य अभियान के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।’
भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसके लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की अपील भी की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर संयुक्त राष्ट्र को इस पर सख्त कदम उठाना चाहिए, क्योंकि इन हमलों से अफगानिस्तान में मानवीय संकट पैदा हो सकता है, जिससे वहां की स्थिति और भी अधिक जटिल हो सकती है। एक तरफ, जब पश्चिम एशिया संघर्ष की आग में जल रहा है, तब अफगानिस्तान के साथ संघर्ष ने पाकिस्तान को एक बेहद नाजुक रणनीतिक स्थिति में तो खड़ा किया ही है, इससे पूरे दक्षिण एशिया में अस्थिरता फैलने की आशंका भी पैदा हो गई है। अमेरिका-इस्राइल और ईरान युद्ध फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा है, ऐसे में जरूरी है कि क्षेत्रीय शक्तियां संयम और संवाद का रास्ता अपनाएं, ताकि युद्ध के नए मोर्चे न खुलें।







