कोविड से बची दुनिया मानो यह मान बैठी है कि युद्ध करना और बम गिराना ही किसी राष्ट्र की पहचान है। नहीं तो फेफड़ों को बचाती और वैक्सीन ढूंढती उन भयभीत धड़कनों के बारे में सोचिए, जिन्हें अगले पल का पता नहीं था, फिर भी सभी, इनको-उनको बचाने में लगे हुए थे, क्योंकि उन्हें पता था कि जितनी यह दुनिया इनकी है, उतनी उनकी भी है। लेकिन पता नहीं फिर से मानो इस पृथ्वी को नजर लग गई। अब बस अकड़ देखिए, उन मुल्कों की, जहां सिर्फ और सिर्फ तेल के कुएं हथियाने और बम गिराने की प्रतियोगिता चल रही है।
अगर आज विवेकानंद होते, तो वह कह जाते कि विश्व के नागरिकों के हित में महान अमेरिका वह होगा, जो युद्ध नहीं, शांति का नेतृत्व करेगा, जो आने वाली नस्लों को जीवन की क्षणभंगुरता नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता और प्रयोजन का अर्थ समझाएगा और उन्हें भी अपने ‘मैं’ से मुक्त होना सिखाएगा। आज अगर स्वामी विवेकानंद होते, तो वह बहुत चिंतित होते और फिर वह प्रश्न भी पूछते कि आखिर किसी राष्ट्र की अस्मिता क्या होती है? नेतृत्व शक्ति का केंद्र होता है या महान नैतिक मूल्यों का? किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय प्रतिष्ठा क्या है? ऐसी दुनिया में एक नागरिक का सम्मान क्या होता है, जहां इन्सानी रिश्ते व्यापारिक फायदों से ज्यादा प्रभावित होते हैं, जहां किसी देश की महानता को आसानी से तात्कालिक स्वार्थों से बदल दिया जाता है, जहां संस्थाएं कंकड़-पत्थरों को तो चमकाती हैं, लेकिन वे चुपचाप हीरों की चमक फीकी कर देती हैं, जहां देशों के रिश्ते रोज नए दुश्मनों के नाम पर बदल रहे हैं… जहां व्यापार के नाम पर, तेल के भंडार के नाम पर, टैरिफ के नाम पर, और आगे ड्रोन, मिसाइलों, लड़ाकू विमानों के नाम पर, तानाशाही के नाम पर, आतंकवाद, डर और हिंसा के नाम पर; दो राष्ट्रों के रिश्ते परिभाषित हो रहे हैं। स्वामी विवेकानंद अमेरिका से, ईरान से, सभी से पूछते, और फिर पूरी दुनिया से पूछते। उन तमाम नेतृत्व से पूछते, जिन के लिए जनता एक ग्राहक है और देश बाजार। उस हर युवा से पूछते, जो देश और समाज से ज्यादा अपनी धुन में डूबा है? अपने ज्ञान और शख्सियत से जिस विवेकानंद ने अमेरिका को मनुष्यता, राष्ट्रवाद, अध्यात्म और जीवन का उद्देश्य सिखाया, उसके लिए अमेरिका और यहां तक कि दुनिया की लीडरशिप को भी स्वामी विवेकानंद को फिर से फॉलो करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसके लिए कोई टैरिफ नहीं लगेगा और इसमें कोई आर्थिक हित या व्यापार भी शामिल नहीं होगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता काफी हद तक नेताओं की नैतिक सोच और मूल्यों पर भी निर्भर करती है। क्या संसार के नेतृत्वकर्ता, युद्ध से पहले और उसके दौरान इन्सानियत का भविष्य शांति के नजरिये से देखना चाहते हैं? क्या गांधी, लिंकन या विवेकानंद ने कभी सोचा होगा कि हिटलर के बाद फिर कोई घृणा की हवा ऐसी चलेगी, जो तमाम नेतृत्व के घमंड और जिद की खातिर लाखों लोगों को कब्र की ओर खींच सकती है। और फिर शांति के लिए यूएनओ की क्या भूमिका है? पिछले दशक से वह ज्यादातर समय चुप या निष्क्रिय क्यों रहना पसंद कर रहा है? क्या संसार के लीडर्स कंसोर्टियम ऑफ पीस नहीं बना सकते? आखिर दुनिया अगर बम से ही संचालित होनी है, तो फिर उन तेल के कुओं का क्या होगा? आखिर जीने के लिए तो हवा, पानी और मूल्यों से लैस दुनिया चाहिए। क्या शांति के मूल्य को लेकर चलने वाला अब कोई नेतृत्व नहीं आएगा क्या? क्या यह दुनिया सिर्फ बम और बाजार से ही संचालित होगी? हमें सोचना होगा कि इस पृथ्वी को कैसे बचाया जाए?
एक तरफ एआई, दूसरी तरफ युद्ध में बरसते ड्रोन, आखिर मनुष्य जाए तो कहां जाए? गांधी जी तो दंगों के समय नोआखाली पहुंच गए थे। आखिर हम कहां पहुंचें। फिर से अहिंसा की आवाज उठेगी क्या? क्या कलिंग युद्ध से कोई महान अशोक बनकर लौटेगा, क्या? वे बच्चे जो बड़े भी न हो सके, वे जरूर पूछेंगे कि आखिरकार तेल के कुएं, जलियांवाला बाग का कुआं और वह ठाकुर का कुआं इतना गहरा और निर्मम क्यों रहा कि कभी इन सबका मन मनुष्यता के लिए नहीं पसीजा। उन धमाकों के बाद, जो शहर या गांव बचेंगे, उनको कौन संभालेगा? अंत में बर्ट्रेंड रसेल हमें याद दिलाते हैं कि युद्ध यह तय नहीं करता कि कौन सही है, वह सिर्फ यह तय करता है कि कौन बचा है! इसलिए समय आ गया है कि इस दुनिया को अहिंसा के नायकों का नेतृत्व मिले और शांति के इतिहास को आवाज भी दी जाए। यह इन्सानियत की ओर वापसी होगी, उस आध्यात्मिक पुकार के साथ जो इस बार ‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ वर्ल्ड’ होगा।
कोविड से बची दुनिया मानो यह मान बैठी है कि युद्ध करना और बम गिराना ही किसी राष्ट्र की पहचान है। नहीं तो फेफड़ों को बचाती और वैक्सीन ढूंढती उन भयभीत धड़कनों के बारे में सोचिए, जिन्हें अगले पल का पता नहीं था, फिर भी सभी, इनको-उनको बचाने में लगे हुए थे, क्योंकि उन्हें पता था कि जितनी यह दुनिया इनकी है, उतनी उनकी भी है। लेकिन पता नहीं फिर से मानो इस पृथ्वी को नजर लग गई। अब बस अकड़ देखिए, उन मुल्कों की, जहां सिर्फ और सिर्फ तेल के कुएं हथियाने और बम गिराने की प्रतियोगिता चल रही है।
अगर आज विवेकानंद होते, तो वह कह जाते कि विश्व के नागरिकों के हित में महान अमेरिका वह होगा, जो युद्ध नहीं, शांति का नेतृत्व करेगा, जो आने वाली नस्लों को जीवन की क्षणभंगुरता नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता और प्रयोजन का अर्थ समझाएगा और उन्हें भी अपने ‘मैं’ से मुक्त होना सिखाएगा। आज अगर स्वामी विवेकानंद होते, तो वह बहुत चिंतित होते और फिर वह प्रश्न भी पूछते कि आखिर किसी राष्ट्र की अस्मिता क्या होती है? नेतृत्व शक्ति का केंद्र होता है या महान नैतिक मूल्यों का? किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय प्रतिष्ठा क्या है? ऐसी दुनिया में एक नागरिक का सम्मान क्या होता है, जहां इन्सानी रिश्ते व्यापारिक फायदों से ज्यादा प्रभावित होते हैं, जहां किसी देश की महानता को आसानी से तात्कालिक स्वार्थों से बदल दिया जाता है, जहां संस्थाएं कंकड़-पत्थरों को तो चमकाती हैं, लेकिन वे चुपचाप हीरों की चमक फीकी कर देती हैं, जहां देशों के रिश्ते रोज नए दुश्मनों के नाम पर बदल रहे हैं… जहां व्यापार के नाम पर, तेल के भंडार के नाम पर, टैरिफ के नाम पर, और आगे ड्रोन, मिसाइलों, लड़ाकू विमानों के नाम पर, तानाशाही के नाम पर, आतंकवाद, डर और हिंसा के नाम पर; दो राष्ट्रों के रिश्ते परिभाषित हो रहे हैं। स्वामी विवेकानंद अमेरिका से, ईरान से, सभी से पूछते, और फिर पूरी दुनिया से पूछते। उन तमाम नेतृत्व से पूछते, जिन के लिए जनता एक ग्राहक है और देश बाजार। उस हर युवा से पूछते, जो देश और समाज से ज्यादा अपनी धुन में डूबा है? अपने ज्ञान और शख्सियत से जिस विवेकानंद ने अमेरिका को मनुष्यता, राष्ट्रवाद, अध्यात्म और जीवन का उद्देश्य सिखाया, उसके लिए अमेरिका और यहां तक कि दुनिया की लीडरशिप को भी स्वामी विवेकानंद को फिर से फॉलो करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसके लिए कोई टैरिफ नहीं लगेगा और इसमें कोई आर्थिक हित या व्यापार भी शामिल नहीं होगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता काफी हद तक नेताओं की नैतिक सोच और मूल्यों पर भी निर्भर करती है। क्या संसार के नेतृत्वकर्ता, युद्ध से पहले और उसके दौरान इन्सानियत का भविष्य शांति के नजरिये से देखना चाहते हैं? क्या गांधी, लिंकन या विवेकानंद ने कभी सोचा होगा कि हिटलर के बाद फिर कोई घृणा की हवा ऐसी चलेगी, जो तमाम नेतृत्व के घमंड और जिद की खातिर लाखों लोगों को कब्र की ओर खींच सकती है। और फिर शांति के लिए यूएनओ की क्या भूमिका है? पिछले दशक से वह ज्यादातर समय चुप या निष्क्रिय क्यों रहना पसंद कर रहा है? क्या संसार के लीडर्स कंसोर्टियम ऑफ पीस नहीं बना सकते? आखिर दुनिया अगर बम से ही संचालित होनी है, तो फिर उन तेल के कुओं का क्या होगा? आखिर जीने के लिए तो हवा, पानी और मूल्यों से लैस दुनिया चाहिए। क्या शांति के मूल्य को लेकर चलने वाला अब कोई नेतृत्व नहीं आएगा क्या? क्या यह दुनिया सिर्फ बम और बाजार से ही संचालित होगी? हमें सोचना होगा कि इस पृथ्वी को कैसे बचाया जाए?
एक तरफ एआई, दूसरी तरफ युद्ध में बरसते ड्रोन, आखिर मनुष्य जाए तो कहां जाए? गांधी जी तो दंगों के समय नोआखाली पहुंच गए थे। आखिर हम कहां पहुंचें। फिर से अहिंसा की आवाज उठेगी क्या? क्या कलिंग युद्ध से कोई महान अशोक बनकर लौटेगा, क्या? वे बच्चे जो बड़े भी न हो सके, वे जरूर पूछेंगे कि आखिरकार तेल के कुएं, जलियांवाला बाग का कुआं और वह ठाकुर का कुआं इतना गहरा और निर्मम क्यों रहा कि कभी इन सबका मन मनुष्यता के लिए नहीं पसीजा। उन धमाकों के बाद, जो शहर या गांव बचेंगे, उनको कौन संभालेगा? अंत में बर्ट्रेंड रसेल हमें याद दिलाते हैं कि युद्ध यह तय नहीं करता कि कौन सही है, वह सिर्फ यह तय करता है कि कौन बचा है! इसलिए समय आ गया है कि इस दुनिया को अहिंसा के नायकों का नेतृत्व मिले और शांति के इतिहास को आवाज भी दी जाए। यह इन्सानियत की ओर वापसी होगी, उस आध्यात्मिक पुकार के साथ जो इस बार ‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ वर्ल्ड’ होगा।







