अप्रैल में राज्यसभा में 10 राज्यों की 37 सीटें खाली हो रही हैं। इनके लिए 16 मार्च को वोटिंग होनी है। राज्यसभा में संख्या के लिहाज से BJP लगातार मजबूत हो रही है। लेकिन, असल समस्या कांग्रेस और विपक्षी दलों के सामने है। कई ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस जीत सकती है, मगर इतिहास गवाह है कि क्रॉस वोटिंग के कारण उसने कई बार जीती सीटें भी गंवाई हैं। इसलिए, देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए इस बार जीतने से ज्यादा जरूरी क्रॉस वोटिंग रोकना होगा।
एकजुटता दिखाने का मौका
इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले राज्यसभा चुनाव के जरिये कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी में सबकुछ ठीक है और एकजुटता है। ये इलेक्शन विपक्षी एकता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।
राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए अपने विधायकों को एक साथ रखने की चुनौती होगी। पिछली बार कांग्रेस को हरियाणा में क्रॉस वोटिंग का सामना करना पड़ा था। ऐसे में इस बार कांग्रेस और सहयोगी दलों को सावधान रहना होगा। कुछ सीटों के नतीजे तय माने जा रहे हैं, लेकिन विपक्ष क्रॉस वोटिंग नहीं रोक सका तो सीट गंवाएगा।
हरियाणा में खेल शुरू
हरियाणा से BJP सांसद किरण चौधरी और रामचंद्र जांगरा का कार्यकाल 9 अप्रैल को खत्म होने वाला है। 90 सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा में एक सीट BJP और एक कांग्रेस के खाते में जा सकती है। मगर, यहां अभी से ही खेल शुरू हो गया है। अगस्त 2022 में क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस के अजय माकन हार गए थे, जबकि BJP व JJP के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा की जीत हुई थी। हरियाणा में राज्यसभा की एक सीट पर जीत के लिए 31 विधायकों का समर्थन जरूरी है। BJP के पास 48 व कांग्रेस के 37 विधायक हैं।
हिमाचल-बिहार में पेच
68 सदस्यों वाली हिमाचल विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट के लिए चुनाव होगा। 40 विधायक होने के बाद भी कांग्रेस को सावधान रहना होगा। 2024 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी बहुमत होने के बावजूद हार गए थे। तब कांग्रेस के कुछ विधायकों और निर्दलीय ने BJP प्रत्याशी को जिता दिया था। अभी BJP के 28 विधायक हैं। कांग्रेस को चिंता सता रही है कि इस बार ऐसा कुछ न हो।
बिहार में 5 सीटों के लिए चुनाव होना है। 243 सदस्यीय विधानसभा में एक सीट पर जीतने के लिए 41 विधायकों के समर्थन की दरकार है। NDA के 202 विधायक है। इस लिहाज से उसकी 4 सीटें तय हैं। आशंका है कि 35 सीटों वाला विपक्षी गठबंधन INDIA अपने बूते एक सीट भी नहीं जीत पाएगा। ऐसे में 5 विधायकों वाली AIMIM की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां अगर पूरा विपक्ष साथ आ जाए तो एक सीट उसके खाते में आ सकती है। ऐसे में RJD, कांग्रेस, वामदल और अन्य सहयोगियों की एकजुटता जरूरी होगी।
इस बार खाली हो रही 5 सीटों में 3 एनडीए की हैं. जेडीयू के हरिवंश और रामनाथ ठाकुर की जगह खाली हो रही है तो आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा की एक सीट पर रिक्ति बन रही है. जेडीयू ने 1-2 मौकों को छोड़ कर किसी को भी अब तक लगातार 2 बार से अधिक राज्यसभा नहीं भेजा है. अली अनवर और आरसीपी सिंह इसके उदाहरण हैं. जेडीयू के इतिहास में अभी तक शरद यादव समेत 2 लोग ही ऐसे भाग्यशाली रहे, जिन्हें नीतीश ने तीसरी बार राज्यसभा भेजा था. इस बार क्या होगा, इसे लेकर कयासबाजी चल रही है. कुछ लोग मानते हैं कि रामनाथ ठाकुर को लेकर नीतीश कुमार के सामने धर्म संकट है. ठाकुर केंद्र में मंत्री हैं और उनकी सबसे बड़ी पूंजी यह है कि वे बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं. अति पिछड़ा समाज से आने के कारण जातीय समीकरण में वे फिट बैठते हैं. इसलिए उनके लिए नीतीश तीसरी बार का रास्ता बना सकते हैं. अलबत्ता हरिवंश को लेकर जेडीयू का मन बदल सकता है.
अभी तक की चर्चाओं में एनडीए में भाजपा और जेडीयू के अलावा 2 और दावेदार दिख रहे हैं. हालांकि उनके पास संख्या बल नहीं है. अगर उन्होंने 3-4 विधायकों का बंदोबस्त कर लिया तो उनमें 1 का राज्यसभा जाना संभव हो जाएगा. आरएलएम नेता उपेंद्र कुशवाहा की सीट खाली हो रही है. यकीनन उनकी इच्छा फिर राज्यसभा जाने की होगी. चिराग पासवान अपनी मां रीना पासवान के लिए प्रयासरत हैं. उनके पास 19 विधायक हैं. भाजपा और जेडीयू से 10 विधायकों का जुगाड़ हो सकता है. पर, उनका काम इससे भी नहीं चलेगा. उन्हें जीतन राम मांझी की पार्टी हम और उपेंद्र कुशवाहा के आरएलम के विधायकों की मदद लेनी पड़ेगी. पर, ऐसा तभी हो पाएगा, जब भाजपा की हरी झंडी मिले. जीतन राम मांझी और चिराग पासवान में कभी रिश्ते सामान्य नहीं रहे. उपेंद्र कुशवाहा अपनी दावेदारी आसानी से छोड़ देंगे, यह संभव नहीं दिखता. ऐसे में भाजपा और जेडीयू अगर उदारता दिखाएं तो सबके मन की संतु्ष्टि हो जाएगी. मसलन पूर्व की भांति भाजपा उपेंद्र कुशवाहा को अपने हिस्से की 2 में 1 सीट दे दे तो कुशवाहा फिर राज्यसभा जा सकते हैं. जेडीयू और भाजपा की मदद लेकर चिराग 5वीं सीट के लिए 3-4 विधायकों का बंदोबस्त कर लें तो उनकी साध भी पूरी हो जाएगी.
हरिवंश जेडीयू कोटे से दूसरी बार राज्यसभा में हैं. तीसरी बार उन्हें मौका मिलेगा या नहीं, इस पर संशय बना हुआ है. जेडीयू के जातीय समीकरण में भी वे फिट नहीं बैठते. वैसे राज्यसभा का उपसभापति रहते उन्होंने कई मौकों पर सरकार की मदद की है. इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भाजपा उन्हें शायद ही छोड़े. पत्रकार से पोलिटिशियन बने हरिवंश की यो्ग्यता और समझ को देखते हुए अनुमान लगाया जाता है कि उनके लिए भाजपा कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेगी. यह भी संभव है कि राज्यसभा न जाने की स्थिति में उन्हें राज्यपाल या इसी तरह के किसी संवैधानिक पद पर उन्हें बिठा दिया जाए. वैसे रामनाथ ठाकुर के बारे में यदि नीतीश अपने अघोषित नियम को शिथिल करते हैं तो हरिवंश को भी इसका लाभ मि सकता है.
एनडीए 5 में 4 सीटें तो अपने ही कुनबे के सहारे जीत जाएगा. 5वीं सीट भी उसके पाले में आ सकती है. सिर्फ 3-4 विधायकों का जुगाड़ करना होगा. इन विधायकों के बंदोबस्त के लिए कांग्रेस और एआईएमआईएम के विधायक मददगार बन सकते हैं. नीतीश कुमार के रिश्ते एआईएमआईएम से अच्छे हैं. कांग्रेस में जिन 3 विधायकों के हाव-भाव पार्टी लाइन से इतर दिखते रहे हैं, उनकी मदद मिल गई तो एनडीए को 5वीं सीट निकालने में मुश्किल नहीं होगी. संभव है कि इसके लिए इन पार्टियों के विधायक सौदेबाजी भी करें. कोई मंत्री पद मांग सकता है तो कोई एमएलसी की सीट मांग सकता है. भाजपा के नाम पर एआईएमआईएम बिदक सकती है. इसलिए कि कांग्रेस और आरजेडी की तरह वह भी नीतिगत रूप से भाजपा की विरोधी है. चिराग पासवान जिस तरह अपने को मुसलमानों का हितैषी बताते रहे हैं, अगर वे चाहें तो 3-4 विधायकों का बंदोबस्त कर सकते हैं, पर यह उपेंद्र कुशवाहा के लिए आसान नहीं दिखता.
महागठबंधन को लीड करने वाले आरजेडी की भी अपना उम्मीदवार उतारने की तैयारी है. हालांकि उसके पास भी अपने या महागठबंधन के दम पर सीट मिल पाना असंभव है. संपूर्ण विपक्ष में अगर तालमेल बन पाया तो महागठबंधन के खाते में 1 सीट जा सकती है. इसके लिए आरजेडी को अपने सहयोगियों के अलावा एआईएमआईएम के साथ तालमेल बिठाना होगा. तब जाकर 41 का नंबर उसके पक्ष में बन पाएगा. इसके लिए एआईएमआईएम के 5 और बसपा के 1 विधायक को अपने पक्ष में तैयार करना होगा. अगर विधानसभा चुनाव की तल्खी बरकरार रही तो एआईएमआईएम से उम्मीद नहीं की जा सकती. पर, दोनों की मानसिकता एनडीए के विरोध की है, इसलिए थड़ी उम्मीद दिखती है. बसपा विधायक अपनी पार्टी के दिशा निर्देश पर वोट करेंगे या अंतरात्मा की आवाज पर, यह उन्हें तय करना है. पर, यह काम भी आसान नहीं दिखता. आरजेडी अगर किसी मुस्लिम को उम्मीदवार बनाता है तो संभव है कि एआईएमआईएम के विधायकों का साथ मिल जाए. चर्चा है कि सीवान के मरहूम सांसद शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब को राजद उतार सकता है. ऐसा हुआ तो एआईएमआईेएम का समर्थन शायद मिल जाए. ऐसा हो भी गया तो कांग्रेस के वे 3 विधायक मुश्किल पैदा कर सकते हैं, जिन्होंने अभी तक बागी रुख अपनाया है.







