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नई का सरकार बनना बांग्लादेश के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि ?

UB India News by UB India News
February 14, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, ब्लॉग
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बांग्लादेश में शेख हसीना के बगैर हुए आम चुनाव 2026 ने कई राजनीतिक मिथकों को तोड़ दिया। अवामी लीग के बायकॉट के बावजूद 60 प्रतिशत वोटिंग होना क्या बांग्लादेश की सियासत में एक नए चैप्टर की शुरुआत है? और सबसे बड़ा सवाल- ढाका में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई BNP सरकार के साथ भारत के रिश्ते अब क्या करवट लेंगे?

बांग्लादेश की राजनीति में यह शायद दूसरी या तीसरी बार है जब किसी बड़ी पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया है या उसे लड़ने नहीं दिया गया है। अगर हम पिछले ऐसे चुनावों से तुलना करें, तो आप जो वोटिंग प्रतिशत बता रहे हैं, वह अब तक का सबसे बेहतरीन आंकड़ा माना जाएगा। इसमें Gen-Z की भागीदारी एक सकारात्मक पहलू है, हालांकि वहां छात्र राजनीति हमेशा से सक्रिय रही है। अगर वोटिंग ऊपर रहा है, तो यह माना जाना चाहिए कि एक बड़े हिस्से ने इसमें भाग लिया है।

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हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यह केवल आम चुनाव नहीं था, बल्कि एक तरह का जनमत संग्रह भी था, जिस वजह से शायद वोटिंग प्रतिशत बढ़ा हो। छिटपुट हिंसा को छोड़ दें, तो युवाओं के नेतृत्व में चुनाव का शांतिपूर्ण होना सराहनीय है। हालांकि, अभी बहुत ज्यादा सकारात्मक होने की जरूरत नहीं है , लेकिन आज जिस तरह चुनाव हुए हैं, उसकी तारीफ करनी होगी।’

चुनाव हमेशा ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं होते। पार्टियों के अपने वोट बैंक होते हैं, लेकिन दुनिया भर में ‘स्विंग वोटर्स’ भी होते हैं जो किसी एक पार्टी के पक्के समर्थक नहीं होते। इसलिए, जो 20% लोग वोट देने नहीं आए, जरूरी नहीं कि वे सभी अवामी लीग के ही समर्थक हों। हो सकता है कि उन्होंने बस वोट न देने का फैसला किया हो। जिन्होंने वोट दिया, वे शायद नई व्यवस्था के साथ जाना चाहते हैं। वास्तविक वोटिंग व्यवहार तो परिणाम की घोषणा के कुछ हफ्तों बाद ही समझ आएगा। रही बात खतरे की, तो यह इस पर निर्भर करेगा कि सरकार का स्वरूप कैसा बनता है।

1996 में जब अवामी लीग ने बहिष्कार किया था, तब वोटिंग प्रतिशत लगभग 21 प्रतिशत ही था। बीएनपी के साथ यह हुआ कि उनकी ‘सेकेंड जनरेशन’ को जमीन तैयार मिली और वे मौजूदा माहौल के साथ तालमेल बिठा पाए। लेकिन इस बार अवामी लीग की सेकेंड जनरेशन को खड़े होने का मौका ही नहीं मिला। जब नेता और पार्टी दोनों ही गायब हैं, तो यह कहना मुश्किल है कि उनका जनाधार बचा है या नहीं। अगर हम यह मान लें कि उनका समर्थन पूरी तरह खत्म हो गया है, तो यह जल्दबाजी होगी, क्योंकि नेतृत्व की अनुपस्थिति में समर्थकों का आकलन करना कठिन है।

2024 की घटना के बाद बांग्लादेश पर सबसे बड़ा दबाव अंतरराष्ट्रीय निगरानी का है। पूरी दुनिया और खास तौर पर भारत, जो अल्पसंख्यकों के मुद्दों को सही उठाता रहा है, की नजर उन पर है। सरकार की तरफ से कोई भी चूक स्थिति को बिगाड़ सकती थी। इस तनाव और दबाव के बावजूद, अगर चुनाव बिना बड़ी हिंसा के संपन्न हुए हैं, तो यह वास्तव में बांग्लादेश के लिए एक उपलब्धि है। भारत भी एक पड़ोसी के तौर पर शांतिपूर्ण चुनावों की सराहना कर रहा है।

बांग्लादेश में BNP की सरकार बनने जा रही है, इसका भारत से रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? भारत को इस घटनाक्रम पर लगातार नजर क्यों रखनी चाहिए?
भारतीय कूटनीति अब काफी परिपक्व हो चुकी है। भारत ने बदलते हालातों को समझा है और आज भी दोनों देशों के बीच ‘ट्रैक-1’ या ‘ट्रैक-2’ के जरिए संवाद जारी है। भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि बांग्लादेश भारत को नजर अंदाज नहीं कर सकता, चाहे वहां किसी भी विचारधारा की सरकार हो। यही भारत के लिए सबसे बड़ा पक्ष है। भारत ने भी कोई सख्त रवैया नहीं अपनाया है और न ही संवाद तोड़ा है। हमने यह सीख लिया है कि हमें किसी एक ‘प्रो-इंडिया’ सरकार के भरोसे नहीं रहना है, बल्कि जो भी सत्ता में आए, उसके साथ कूटनीतिक रिश्ते रखने हैं। इसलिए, मुझे नहीं लगता कि भारत की तरफ से अब कोई चूक होगी।

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