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बेईमान मौसम बनाम विकास की रफ्तार………………..

UB India News by UB India News
February 14, 2026
in Breaking News, खास खबर, पर्यावरण, संपादकीय
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बेईमान मौसम बनाम विकास की रफ्तार………………..
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भारत इस समय अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के सबसे आक्रामक विस्तार के दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है-सड़कें, बंदरगाह, सुरंगें, हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, शहरों का विस्तार आदि, क्योंकि आधारभूत संरचना का विस्तार राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के लिए प्रमुख प्राथमिकता बन चुका है। परिवहन नेटवर्क, सागरमाला परियोजना के जरिये बंदरगाहों का विस्तार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर-5जी का तेजी से विस्तार, नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन) को बढ़ावा देने और स्मार्ट सिटी मिशन के तहत शहरों का आधुनिकीकरण, पीएम गतिशक्ति (नेशन मास्टर प्लान) जैसा बहुत कुछ हो रहा है।

दूसरी तरफ, जलवायु संबंधी बढ़ते जोखिम इन संपत्तियों का बीमा कराने की भारत की क्षमता से ज्यादा हो सकते हैं। भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब छिटपुट नहीं रहे, बल्कि इनकी आवृत्ति और गंभीरता में लगातार वृद्धि हो रही है। 2010 के दशक के मध्य से इसमें तीव्र उछाल आया है, क्योंकि बाढ़ जैसी आपदाएं जोखिम परिदृश्य पर हावी होती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विस्तार सबसे तेजी से हो रहा है, जिससे बीमा कंपनियां जोखिमों का सटीक आकलन करने में जूझ रही हैं। हालांकि, भारत का अधिकांश भाग बीमा योग्यता की सीमा के भीतर है। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या ये अरबों रुपये की परिसंपत्तियां जलवायु झटकों के लिहाज से वास्तव में सुरक्षित हैं और अगर नुकसान हुआ, तो उसका आर्थिक बोझ कौन उठाएगा! हाल ही में जारी क्लाइमेट ट्रेंड्स की भारत के बुनियादी ढांचे के लिए जलवायु जोखिम और बीमा रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में 1986 और 2016 के बीच शहरी क्षेत्रों में 1.3 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हुई, जबकि बाढ़ का जोखिम 2.46 फीसदी की दर से कहीं अधिक तेजी से बढ़ा। इस अंतर के और भी बढ़ने की आशंका है। जैसे-जैसे संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ता है, देश के कुछ हिस्से, खासकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के इलाके, बीमा योग्य न होने (अनइंश्योरबल) की सीमा के करीब पहुंच रहे हैं। भारत का बुनियादी ढांचे पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत से अधिक हो गया है, लेकिन अब मौसम बेईमान हो चुका है।

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वर्ष 2025 से यह साबित हो गया है कि भारत में जलवायु प्रभावों का पैटर्न बदल चुका है। बाढ़, अत्यधिक वर्षा, चक्रवात, भूस्खलन और लू अब राजमार्गों, बंदरगाहों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे बीमा प्रीमियम बढ़ रहे हैं। यह सरकारों, बीमाकर्ताओं और निवेशकों-सभी के लिए बढ़ते वित्तीय जोखिमों को उजागर करती है। भारत की कई बड़ी परियोजनाएं संवेदनशील इलाकों में हैं। ओडिशा का पारादीप पोर्ट, आंध्र प्रदेश के नए पोर्ट प्रोजेक्ट्स, हिमाचल और उत्तराखंड की सड़कें, सिक्किम का तीस्ता हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, लद्दाख का जोजिला टनल और अरुणाचल की जलविद्युत परियोजनाएं, इन सबमें करीब 2.95 लाख करोड़ रुपये का निवेश है।

प्रमुख बीमा कंपनियों-एसबीआई जनरल इंश्योरेंस, म्यूनिख री इंडिया, स्विस री इंडिया और भारतीय सामान्य बीमा निगम का मानना है कि जलवायु जोखिम अब एक ‘प्रमुख व्यावसायिक जोखिम’ बन चुका है। बीमाकर्ताओं ने स्वीकार किया कि मौजूदा मॉडल बदलते पैटर्न को पकड़ने में सक्षम नहीं हैं। वर्ष 2000 के बाद से भारत में प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक नुकसान 99 अरब डॉलर से अधिक रहा है और 2023 में ही यह 12 अरब डॉलर था। वित्तीय वर्ष 2024-25 में दुनिया भर में बीमित संपत्ति का नुकसान 140 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है।

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