कभी नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाला बिहार का मुंगेर जिला अब पूरी तरह बदल चुका है. केंद्र सरकार की नई गाइडलाइंस के तहत मुंगेर को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की ‘लेगेसी और थ्रस्ट जोन’ श्रेणी से बाहर कर दिया गया है. यानी अब मुंगेर आधिकारिक तौर पर नक्सल मुक्त जिला घोषित हो गया है. केंद्र और बिहार सरकार की सख्त रणनीति ‘सरेंडर करो या कानून का सामना करो’ के साथ विकास योजनाओं और सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों ने यह ऐतिहासिक सफलता दिलाई है.
मुंगेर में खत्म हुआ लाल आतंक
यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि मुंगेर में नक्सलवाद के खात्मे के पीछे सुरक्षा बलों की लंबी और रणनीतिक कार्रवाई अहम रही. एसटीएफ और अर्धसैनिक बलों ने जंगलों और दुर्गम इलाकों में लगातार ऑपरेशन चलाए. पेसरा कैंप और जमुई के चोरमारा कैंप जैसी रणनीतिक चौकियों की स्थापना से नक्सलियों की गतिविधियां पूरी तरह कमजोर पड़ गईं. हाल के दिनों में कई बड़े और इनामी नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने संगठन की कमर तोड़ दी. खड़गपुर में डीजीपी के सामने तीन इनामी नक्सलियों ने हथियार डाल दिए, जिसके बाद जिले में नक्सली गतिविधियां लगभग समाप्त हो गईं.
सख्त नीति से बदला मुंगेर का नक्शा
पुलिस अधीक्षक सैयद इमरान मसूद के अनुसार, केवल सुरक्षा अभियान ही नहीं बल्कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और पुलिस-जन संवाद ने भी बड़ा बदलाव लाया है. दूरदराज गांवों तक विकास योजनाएं पहुंचने से लोगों का भरोसा प्रशासन पर बढ़ा है और वे मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं. सबसे बड़ा बदलाव हालिया विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जहां पहले सुरक्षा कारणों से शिफ्ट होने वाले मतदान केंद्रों पर इस बार शांतिपूर्ण और भयमुक्त मतदान हुआ.
मुंगेर ने ऐसे तोड़ी नक्सलवाद की कमर
पुलिस और प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा अभियान के साथ विकास योजनाओं ने भी माहौल बदला. गांवों तक सड़क, बिजली और सरकारी योजनाएं पहुंचीं तो लोगों का भरोसा बढ़ा. हालिया चुनाव में शांतिपूर्ण मतदान इसका बड़ा संकेत माना जा रहा है. यही वजह है कि केंद्र सरकार की नई गाइडलाइंस के तहत मुंगेर को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की ‘लेगेसी और थ्रस्ट जोन’ श्रेणी से बाहर कर दिया गया है.
आत्मसमर्पण और ऑपरेशन का असर
अब मुंगेर आधिकारिक तौर पर नक्सल मुक्त जिला घोषित हो गया है. मुंगेर का यह मॉडल बताता है कि सख्ती और विकास साथ चलें तो बड़ी से बड़ी चुनौती भी खत्म की जा सकती है. मुंगेर की यह सफलता दिखाती है कि सख्त सुरक्षा नीति, आत्मसमर्पण की पहल और विकास की रफ्तार जब साथ चलती है तो नक्सलवाद जैसी बड़ी चुनौती को भी खत्म किया जा सकता है.





