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जंग, तबाही और शांति, कैसे बना 27 देशों वाला यूरोपियन यूनियन? जिससे भारत ने की डील

UB India News by UB India News
January 28, 2026
in BREAK, Breaking News, अन्तर्राष्ट्रीय, कारोबार
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जंग, तबाही और शांति, कैसे बना 27 देशों वाला यूरोपियन यूनियन? जिससे भारत ने की डील
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप खंडहर में बदल चुका था. लाखों लोग मारे गए, अर्थव्यवस्थाएं टूट चुकी थीं. देशों के बीच अविश्वास बहुत गहरा था. इसी जंग और तबाही की राख से शांति और सहयोग की एक नई कल्पना उभरी और यही आगे चलकर यूरोपियन यूनियन (EU) के नाम से जानी गई.

आज जब भारत-EU व्यापार एवं निवेश समझौते पर अंतिम मुहर लग गई है तो यह समझना ज़रूरी है कि खुद EU कैसे बना, उसकी बुनियाद क्या है, कैसे वह भारत के लिए मददगार होगा और ब्रिटेन जैसे बड़े देश ने इस संगठन से बाहर निकलने का फैसला क्यों किया?

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द्वितीय विश्व युद्ध और Never Again की भावना

साल 1939 से 1945 के बीच चला द्वितीय विश्व युद्ध यूरोप के लिए अस्तित्व का संकट था. जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, सोवियत संघ जैसे बड़े देशों ने एक-दूसरे पर ऐसी तबाही ढाई कि शहर, उद्योग, कृषि, सब लगभग बर्बाद हो गए. करोड़ों लोगों की मौत हुई. यहूदियों और अन्य समूहों का नरसंहार सामने आया. भारी आर्थिक गिरावट और भुखमरी भी देखने को मिली. युद्ध खत्म होते ही यूरोपीय नेताओं के सामने दो बड़े सवाल थे.

एक-क्या यूरोप फिर से दोबारा ऐसे ही युद्धों में झोंक दिया जाएगा? दो-क्या कोई ऐसा ढांचा बनाया जा सकता है जिसमें राष्ट्र अपनी संप्रभुता कायम रखते हुए भी एक-दूसरे पर हमला न करें, बल्कि मिलकर विकास करें? इसी Never Again (अब कभी नहीं) वाली सोच से यूरोपीय एकीकरण की शुरुआत हुई.

World War Ii

द्वितीय विश्व युद्ध में करीब 70 से ज्यादा देश सीधे-सीधे प्रभावित हुए.

कोयला और इस्पात से जन्मी दोस्ती

साल 1951 में छह देशों फ्रांस, जर्मनी (तब पश्चिम जर्मनी), इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने मिलकर एक संगठन बनाया. नाम तय हुआ यूरोपियन कोल एंड स्टील कम्युनिटी (ECSC). कोयला और स्टील युद्ध की बुनियादी सामग्री थे हथियार, टैंक, मशीनें सब इन्हीं से बनते थे. इन संसाधनों पर साझा नियंत्रण मतलब कोई देश अकेले चुपचाप हथियारों का ज़खीरा नहीं बना सकता. यह एक आर्थिक समझौता था, लेकिन असल लक्ष्य था राजनीतिक शांति और भरोसा बनाना. इसकी सफलता ने दिखा दिया कि आर्थिक सहयोग से राजनीतिक तनाव कम हो सकता है.

India Eu Trade Deal (2)

इंडिया-EU बीच हुई डील

यूरोपियन इकोनॉमिक कम्युनिटी और बाज़ार की ताक़त

साल 1957 में इन्हीं छह देशों ने रोम की संधि (Treaty of Rome) पर हस्ताक्षर कर के यूरोपियन इकोनॉमिक कम्युनिटी (EEC) बनाई. यह कदम यूरोपियन यूनियन की ओर असली छलांग था. इस संगठन का लक्ष्य देशों के बीच टैरिफ और व्यापार बाधाएं कम करना, एक साझा बाज़ार बनाना, जहां सामान, सेवाएं और पूंजी आसानी से घूम सके. कृषि, व्यापार, परिवहन जैसी नीतियों में तालमेल बनाना भी इसका एक प्रमुख उद्देश्य था. धीरे-धीरे और देश जुड़ते गए. ब्रिटेन, आयरलैंड, डेनमार्क (1973), फिर ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल जैसे देश इसमें शामिल हुए. अब यह सिर्फ़ आर्थिक क्लब नहीं रहा, बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने और तानाशाही से बाहर आए देशों को स्थिर करने का मंच भी बन गया.

Eu Flag

यूरोपियन यूनियन के झंडे में बने 12 सितारे एकता, पूर्णता-संपूर्णता, सद्भाव और आदर्श के प्रतीक हैं.

कैसे बना 27 देशों वाला यूरोपियन यूनियन?

यूरोपियन यूनियन की औपचारिक नींव मास्ट्रिक्ट संधि से पड़ी. साल 1992 की मास्ट्रिक्ट संधि (Treaty of Maastricht) से यूरोपियन यूनियन (EU) औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया. इस संधि ने तीन बड़े काम किए. यूरोपीय नागरिकता की अवधारणा, जिसके तहत किसी भी सदस्य देश के नागरिक को EU के भीतर कहीं भी रहने, काम करने, पढ़ने की आज़ादी मिल गई. आर्थिक और मौद्रिक संघ के तहत आगे चलकर साझा मुद्रा यूरो की नींव रखी गई. सेंट्रल बैंक (ECB) और साझा वित्तीय मानकों की व्यवस्था भी बनाई गई. विदेश नीति, सुरक्षा और न्याय पर सहयोग करना तय हुआ. सिर्फ़ व्यापार नहीं, बल्कि कूटनीति, सुरक्षा, इमीग्रेशन, न्यायिक सहयोग तक विस्तार हुआ. इसके बाद के दशकों में मध्य और पूर्वी यूरोप के कई देश EU में जुड़े. इनमें पोलैंड, चेक गणराज्य, हंगरी, बाल्टिक आदि शामिल थे. ये पहले सोवियत संघ के प्रभाव में थे.

EU विस्तार का बड़ा राजनीतिक संदेश यह था कि यूरोप अब लोकतंत्र, मानवाधिकार और बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था पर खड़ा होगा. आज ब्रिटेन के बाहर जाने के बाद EU में 27 देश सदस्य हैं. यह एक ऐसा अनोखा ढांचा है जहां, साझा संसद (European Parliament), साझा कार्यपालिका (European Commission), साझा न्यायालय (Court of Justice of the EU) और कई साझा नीतियां और क़ानून हैं. यानी यह न तो पूरी तरह एक संघीय देश है, न ही सिर्फ़ एक ढीला-ढाला संगठन बल्कि दोनों के बीच की एक अनोखी संरचना है.

Britain Flag

यूनाइटेड किंगडम (UK) यानी ब्रिटेन ने 2016 में जनमत संग्रह के ज़रिए EU से अलग होने का फैसला किया.

ब्रिटेन EU से क्यों अलग हुआ?

जब EU एक तरफ़ मज़बूत हो रहा था, उसी बीच यूनाइटेड किंगडम (UK) यानी ब्रिटेन ने 2016 में जनमत संग्रह के ज़रिए EU से अलग होने का फैसला किया. इसे Brexit (Britain + Exit) कहा गया. इसके पीछे कई कारण क्या थे, ब्रेक्सिट समर्थकों का सबसे बड़ा तर्क था कि हमारे क़ानून हमारे निर्वाचित सांसद बनाएं, न कि ब्रसेल्स (EU की राजधानी) में बैठे नौकरशाह और नेता. EU की सदस्यता का मतलब होता कई क्षेत्रों में EU के क़ानून और नियम ब्रिटिश संसद से ऊपर माने जाते हैं.

व्यापार, प्रतिस्पर्धा, पर्यावरण, मानवाधिकार, इमीग्रेशन आदि पर EU की साझा नीतियों का पालन ज़रूरी है. ब्रेक्सिट कैंप ने कहा कि इससे ब्रिटेन की कंट्रोल लेने की क्षमता कम हो गई है. उनका नारा था-Take Back Control यानी सीमाओं पर नियंत्रण, क़ानूनों पर नियंत्रण और पैसों पर नियंत्रण वापस लो.

इमीग्रेशन और फ्री मूवमेंट का सवाल

EU में फ्री मूवमेंट ऑफ़ पीपल का सिद्धांत है यानी एक EU देश का नागरिक किसी दूसरे EU देश में आसानी से जा सकता है, बस सकता है, काम कर सकता है. पूर्वी यूरोप के कई देशों के EU में शामिल होने के बाद बड़ी संख्या में वहाँ के लोग काम की तलाश में ब्रिटेन आने लगे. इससे ब्रिटेन में दो तरह की प्रतिक्रिया हुई. एक-कई सेक्टरों जैसे, निर्माण, हेल्थकेयर, हॉस्पिटैलिटी को सस्ता और मेहनती श्रम मिला. दो-लेकिन साथ ही कुछ स्थानीय लोगों में यह धारणा बनी कि नौकरियां छिन रही हैं. वेतन पर दबाव है. सार्वजनिक सेवाओं स्कूल, अस्पताल, हाउसिंग पर बोझ बढ़ रहा है. इसी असंतोष को ब्रेक्सिट कैंप ने राजनीतिक रूप से भुनाया और इमीग्रेशन को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया.

Euro Currency Of Eu

यूरोपियन यूनियन की करंसी यूरो है.

आर्थिक तर्क, योगदान और नियंत्रण

ब्रिटेन EU बजट में बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता था. ब्रेक्सिट समर्थक कहते थे कि हम हर सप्ताह अरबों पाउंड EU को भेजते हैं, जबकि ये पैसा हम अपने देश की हेल्थ सर्विस, कृषि या इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च कर सकते हैं. हालांकि अनेक अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि EU सदस्यता से ब्रिटेन को बड़े बाज़ार, निवेश और वित्तीय सेवाओं का फायदा मिला लेकिन यह जटिल बहस आम जनता तक नेट योगदान बनाम नेट लाभ के तकनीकी रूप में नहीं, बल्कि हम पैसा यूरोप को क्यों दे रहे हैं, जैसी सरल भावनाओं में पहुंची.

पहचान, इतिहास और अलग यूरोपीय सोच

ब्रिटेन की भौगोलिक और ऐतिहासिक पहचान भी अलग रही. वह एक द्वीपीय देश है, जिसने अक्सर खुद को कॉन्टिनेंटल यूरोप से थोड़ा अलग समझा. साम्राज्य का इतिहास, कॉमनवेल्थ देश, ट्रांस-अटलांटिक (अमेरिकाब्रिटेन) संबंध आदि उसकी विदेश नीति और पहचान को विशिष्ट बनाते हैं. कई लोगों को लगता था कि EU के भीतर रहकर ब्रिटेन अपनी पुरानी महाशक्ति वाली स्वतंत्र पहचान खो रहा है. नतीजा 2016 का जनमत संग्रह कराया गया. लगभग 52 फीसदी लोगों ने EU छोड़ने के पक्ष में तथा लगभग 48 फीसद ने EU में बने रहने के पक्ष में वोट किया. आखिरकार, 31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन आधिकारिक रूप से EU से बाहर हो गया, और 27 सदस्य देशों वाला EU अस्तित्व में आया.

भारत के लिए क्या सीख और अवसर?

भारत-EU डील की चर्चा के बीच EU के इतिहास और ब्रेक्सिट की कहानी से कुछ अहम संकेत मिलते हैं. आर्थिक एकीकरण शांति और विकास लाता है, लेकिन अगर लोगों को लगता है कि फैसले दूर बैठी संस्थाएं ले रही हैं, या लाभ बराबर नहीं बांटे जा रहे, तो असंतोष पैदा हो सकता है. भारत और EU दोनों बड़े लोकतंत्रों के समूह हैं, जहाँ जनता की राय, मीडिया, सिविल सोसाइटी और चुनावी राजनीति नीतियों को प्रभावित करती है. इसलिए किसी भी डील को सिर्फ़ आंकड़ों के हिसाब से नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक नज़रिए से भी संतुलित होना होगा.

EU के साझे मूल्य लेकिन अलग प्राथमिकताएं हैं. उसका ज़ोर क्लाइमेट, मानवाधिकार, डेटा प्रोटेक्शन पर है, वहीं भारत की प्राथमिकता रोज़गार, औद्योगिकीकरण और गरीबी घटाने की है. कोई भी दीर्घकालिक समझौता इन्हें संतुलित किए बिना टिकाऊ नहीं होगा. किसी भी बड़े एकीकरण या समझौते में अगर सामान्य नागरिक अपने को विजेता नहीं, हारा हुआ महसूस करने लगें, तो लोकतांत्रिक रास्ते से भी बड़े बदलाव आ सकते हैं. इसलिए पारदर्शिता, संवाद और जन-समर्थन बहुत ज़रूरी है.

जंग और तबाही से पैदा हुआ यूरोपियन यूनियन आज 27 देशों का एक अनोखा प्रयोग है. शांति, साझा बाज़ार और साझा क़ानूनों पर टिका हुआ. यह हमें दिखाता है कि सदियों से लड़ने वाले देश भी अगर चाहें, तो आपसी अविश्वास को आर्थिक साझेदारी और राजनीतिक सहयोग में बदल सकते हैं. भारत-EU डील इसी बड़े परिप्रेक्ष्य का हिस्सा है. यह सिर्फ़ टैरिफ घटाने या बाज़ार खोलने की बात नहीं, बल्कि दो बड़े लोकतांत्रिक समूहों के बीच भविष्य की साझेदारी का सवाल भी है. वहीं ब्रिटेन का EU से अलग होना यह याद दिलाता है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय ढांचे की मजबूती अंततः लोगों के विश्वास, संतुलन और पारदर्शिता पर निर्भर करती है.

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