ईरान का चाबहार पोर्ट आज भारत की विदेश नीति और रणनीतिक सोच का ऐसा केंद्र बन चुका है, जहां से पीछे हटना सिर्फ एक प्रोजेक्ट छोड़ना नहीं बल्कि दशकों की भू-राजनीतिक तैयारी को कमजोर करना होगा. अमेरिका की ईरान पर पाबंदियों और चाबहार को मिली सीमित छूट की समयसीमा खत्म होने के बावजूद भारत ने साफ कर दिया है कि इस पोर्ट से बाहर निकलना उसके लिए कोई विकल्प नहीं है. यह रुख बताता है कि चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि पाकिस्तान को बाईपास करने, चीन की घेराबंदी का जवाब देने और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच का एकमात्र मजबूत रास्ता है.
भारत की यह मजबूरी यूं ही नहीं बनी है. दशकों से पाकिस्तान की भौगोलिक रुकावटों के कारण भारत का पश्चिमी और मध्य एशियाई संपर्क बाधित रहा है. चाबहार ने पहली बार भारत को वह दरवाजा दिया, जहां से वह बिना पाकिस्तान पर निर्भर हुए अफगानिस्तान, ईरान और सेंट्रल एशिया तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि अमेरिका से बातचीत जारी रहने के बावजूद नई दिल्ली साफ कह रही है चाबहार ‘नो एग्जिट जोन’ है.
भारत के लिए चाबहार इतना अहम क्यों है?
न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है और यह भारत को सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ता है. पाकिस्तान के बंद रास्तों के चलते भारत के लिए यह इकलौता व्यवहारिक पश्चिमी समुद्री कॉरिडोर है, जो रणनीति और व्यापार दोनों लिहाज से बेहद जरूरी है.
PAK को बाईपास करने की भारत की सबसे बड़ी चाल
पाकिस्तान ने हमेशा भारत-अफगानिस्तान व्यापार में अड़चनें डाली हैं. जमीन के रास्ते बंद रहे. चाबहार ने इस पूरी रणनीति को फेल कर दिया. भारत यहां से समुद्र के रास्ते ईरान पहुंचता है और फिर सड़क व रेल नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक.
चीन के ग्वादर पोर्ट का जवाब
चाबहार सिर्फ पाकिस्तान को बाईपास करने का जरिया नहीं, बल्कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और ग्वादर पोर्ट का रणनीतिक जवाब भी है.
- ग्वादर, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का अहम हिस्सा है.
- चाबहार, भारत को उसी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौका देता है.
- यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का रणनीतिक संतुलन बनाता है.
INSTC: यूरोप तक भारत का शॉर्टकट
चाबहार इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का अहम हिस्सा है. यह कॉरिडोर भारत को ईरान, रूस और यूरोप से जोड़ता है. समुद्र, सड़क और रेल के मिश्रण से यह रास्ता न सिर्फ सस्ता है, बल्कि स्वेज नहर की तुलना में तेज भी है. इससे भारत की लॉजिस्टिक्स लागत घटती है और बिजनेस कंपटीशन बनता है.
ऊर्जा सुरक्षा में भी चाबहार की भूमिका
चाबहार पोर्ट ईरान और मध्य एशिया से ऊर्जा आयात का भविष्य का बड़ा रास्ता बन सकता है. इससे भारत को तेल और गैस के वैकल्पिक रूट मिलते हैं और वह अस्थिर समुद्री रास्तों पर निर्भर नहीं रहता.
- व्यापार और मानवीय मदद का केंद्र
- चाबहार सिर्फ रणनीति नहीं, जमीनी हकीकत भी है.
- भारत पहले ही यहां से अफगानिस्तान को मानवीय सहायता भेज चुका है.
- यह पोर्ट लैंडलॉक्ड देशों के लिए भारत का ट्रेड गेटवे बन सकता है.
- भारतीय निर्यात को नए बाजार मिलते हैं.
भारत को क्या-क्या फायदा?
- पाकिस्तान को पूरी तरह बाईपास करने का स्थायी रास्ता.
- अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच.
- चीन के ग्वादर पोर्ट को रणनीतिक चुनौती.
- INSTC के जरिए यूरोप तक तेज और सस्ता व्यापार.
- ऊर्जा सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स मजबूती.
- भारत की क्षेत्रीय ताकत और कूटनीतिक पकड़ मजबूत.
अमेरिकी प्रतिबंध और भारत की चुनौती
अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं लेकिन चाबहार को मानवीय और रणनीतिक कारणों से सीमित छूट दी गई. यह छूट अप्रैल 2026 तक है. अमेरिका ने भारत को ‘ऑर्डरली एग्जिट’ का विकल्प सुझाया लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह बाहर नहीं जाएगा. विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा, लेकिन चाबहार छोड़ेगा नहीं.
आगे की रणनीति
- अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत जारी.
- चाबहार में 10 साल का ऑपरेशन कॉन्ट्रैक्ट.
- लगभग 120 मिलियन डॉलर का निवेश.
- प्रत्यक्ष जोखिम कम करते हुए रणनीतिक मौजूदगी बनाए रखना.
चाबहार पोर्ट भारत के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं बल्कि उसकी पश्चिमी रणनीति की रीढ़ है. पाकिस्तान को बाईपास करना हो, चीन को संतुलित करना हो या मध्य एशिया और यूरोप से जुड़ना हो हर रास्ता चाबहार से होकर जाता है. यही वजह है कि भारत के लिए चाबहार से बाहर निकलना कोई विकल्प नहीं बल्कि रणनीतिक आत्मघात होगा.







