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उपेंद्र कुशवाहा को झटका RLM में बगावत !

UB India News by UB India News
January 11, 2026
in पटना, बिहार
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उपेंद्र कुशवाहा को झटका RLM में बगावत !
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राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाह की परेशानी बढ़ गई है। उनकी पार्टी के तीन बागी विधायकों ने पार्टी पर दावा कर उनका संकट बढ़ा डाला है। दूसरी ओर परिवारवाद के तले उनका समाजवादी व्यक्तित्व भी तार- तार हो रहा है। अभी तक राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा ही परिवारवाद की आग से बचे थे। वर्ष 2025 में उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी राजनीत का ही स्वाहा कर डाला। यह दीगर है कि जातीय जकड़न में जकड़े बिहार के कुशवाहा राजनीति के सबसे कद्दावर नेता उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति को बागी तीनों विधायक राजनीतिक ताकत का वह रूप नहीं दिखा सकते जो अजित पवार और एकनाथ शिंदे ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे को दिखाया।

उपेंद्र कुशवाहा को झटका

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यह अलग है कि राजनीतिक गलियारा में यह आवाज उठने लगी है कि कही उपेंद्र कुशवाहा का हश्र शरद पवार और उद्धव ठाकरे वाला तो नहीं होने जा रहा है? समझते हैं बिहार के वर्तमान राजनीतिक समीकरण में रालोमो के बागी विधायक नहीं बन सकते अजीत पवार और एकनाथ शिंदे। महाराष्ट्र के बारामती विधानसभा से अजीत पवार 9 बार विधायक बने हैं। पहली बार वे 1991 के उप चुनाव में जीत कर बारामती विधानसभा के विधायक बने। यह सीट शरद पवार ने केंद्र की राजनीति हेतु अपने भतीजे के लिए खाली की, जिस उप चुनाव में अजीत पवार की जीत हुई। तब से वे अभी तक बारामती विधानसभा पर कब्जा जमाए हुए हैं।

कौन हैं एकनाथ शिंदे?

एकनाथ शिन्दे 1997 में ठाणे महानगर पालिका से पार्षद चुने गए और 2001 में नगर निगम सदन में विपक्ष के नेता बने। इसके बाद दोबारा साल 2002 में दूसरी बार निगम पार्षद बने इसके अलावा तीन साल तक पॉवरफुल स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रहे। हालांकि, दूसरी बार पार्षद चुने जाने के दो साल बाद ही विधायक बन गए। शिवसेना में सियासी बुलन्दी साल 2000 के बाद छुआ। एकनाथ शिन्दे ठाणे की कोपरी-पंचपखाड़ी सीट से साल 2004 में पहली बार विधायक निर्वाचित हुए थे। शिवसेना के टिकट पर 2004 में पहली बार विधानसभा पहुंचे शिन्दे इसके बाद 2009, 2014 और 2019 में भी विधानसभा सदस्य रहे। इन दोनों का एक लंबा राजनीत से संबंध रहा है। एक लंबे समय तक राजनीति के दाव पेंच समझते रहे। जनता के बीच सीधे जुड़ाव रखने वाले ये नेता थे। ये मूल पार्टी से अलग हुए तब भी जीते।

रालोमो के विद्रोही विधायक?

माधव आनंद के बड़े व्यवसायी हैं और पहली बार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं। इनका आधार व्यापार है और राजनीति इनके व्यवसाय का प्रोटेक्शन। उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक आयोजनों के मददगार। आलोक सिंह भी पहली बार विधायक बने हैं। ये पार्टी में थे भी नहीं। इन पर भी रालोमो के कार्यकर्ताओं ने टिकट खरीदने का आरोप लगाया। इनके तीसरे विधायक ही है जो विधायक बनने से पहले एमएलसी थे। और यह भी उपेंद्र कुशवाहा की मदद से ही विधान परिषद पहुंचे थे। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भीतर तीन विधायकों के उठे विद्रोह को लेकर अब ये सवाल उठने लगे कि क्या उपेंद्र कुशवाहा की हालत एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार या फिर शिव सेना के उद्धव ठाकरे की होने वाली है?

इसके कई बड़े कारण भी हैं…

इन तीनों विधायकों की तो जीत की लॉटरी लगी है। एन डी ए में रहने और उपेंद्र कुशवाश के विशेष कृपा पात्र बन कर चुनाव जीते हैं। इनका अपना कोई राजनीतिक आधार नहीं है जिनके कारण ये अकेले दम पर पार्टी काफी कर लें और चुनाव जीत जाएं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में जब फूट पड़ी तो उसके कारण उनके भतीजे अजीत पवार बने और वे पार्टी में नबर टू की हैसियत रखते थे। राजनीतिक रूप से शरद पवार के लिए काम करते अजीत पवार ही क्षेत्र संभालने की भूमिका में होते थे। और इस से भी बड़ी बात तो यह है कि इस टूट के पीछे अपरोक्ष रूप से भाजपा भी थी। शिव सेना के उद्धव ठाकरे के बीच से एकनाथ शिंदे विद्रोह की मशाल थामे निकले तो बीजेपी का स्पष्ट प्रभाव बैंकिंग करते हुए दिखा। इनके पीछे न तो भाजपा है और न ही जदयू। राजनीतिक गलियारी में रालोमो के तीन विधायकों के विरोध की ताप को उस स्तर का नहीं माना जा रहा। रालोमो के तीन विधायकों का न तो वह राजनीतिक रुतबा है और न कभी जमीनी पैठ रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार बनाने और बिगाड़ने का फिलहाल कोई गणित भी बनते दिख रहा है।

विधायकों का राजनीतिक असर

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बागी तीन विधायक रामेश्‍वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद का पार्टी पर कोई असर नहीं। धनबल इनकी योग्यता है। ये अपने दम पर चुनाव भी नहीं जीत सकते। संभवतः बिहार की राजनीति जिस चौराहे पर खड़ी है वहां इन तीन विधायकों का कोई महत्व नहीं। मिलने को तो जदयू और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से भी मुलाकात कर चुके हैं। पर किसी भी पार्टी की तरफ से इनका हौसला बढ़ाया नहीं गया। बीजेपी और जदयू यह मान कर चल रही है कि बागी विधायकों को साथ लेने पर गठबंधन के भीतर गलत संकेत जाएगा। महागठबंधन में शामिल हो कर भी इन्हें क्या मिलेगा? यही वजह भी है कि बागी विधायकों के बोल में विद्रोह का अंत यह है कि राजनीत‍ि से संन्‍यास ले लेंगे लेकिन ऐसे व्‍यक्‍त‍ि के पास नहीं लौटेंगे जो कहे कुछ और करे कुछ। हम पेट भरने के लिए राजनीत‍ि नहीं करते।

बागी विधायकों की उड़ान ?

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बागी तीन विधायकों रामेश्‍वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद के पास ऐसे में एक ही रास्ता बचता है। वह है अलग गुट की चर्चा।विधानसभा अध्यक्ष डॉक प्रेम कुमार के पास यह मामला जा सकता है । अब उनका विवेक कह ले कि वे सरकार की तरफ से मिल इशारा के बाद उसे अलग गुट के रूप मान्यता दे कर सदन में बैठने की अलग व्यवस्था कर दें। बागी विधायक इस से ज्यादा नहीं कर सकते। अलग गुट में रह कर भी ये एनडीए में ही रहेंगे। वर्ष 2030 विधानसभा के चुनाव के आते वक्त में इनमें से एक भी विधायक आपने बूते चुनाव जीतने की ताकत रखते हैं। ऐसे में इनका भविष्य कोई दूसरा दल ही होगा। बागी विधायकों के पक्ष में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के संगठन के साथी नहीं है। वह चाहे रामेश्वर महतो हो या माधव आनंद या फिर आलोक सिंह ,जब उन्हें टिकट मिला तो पार्टी में विरोध के लहर काफी उठे थे। अब इन विधायको के स्वर उपेंद्र कुशवाहा के विरुद्ध उभरे तो मॉरल वैल्यू उपेंद्र कुशवाहा के साथ जुड़ गए हैं।

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