बिहार में महागठबंधन का सीएम फेस रहे तेजस्वी यादव की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं. माइनस आरजेडी महागठबंधन को नया स्वरूप देने के लिए जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर सक्रिय हो गए हैं. शपथ लेने के बाद तेजस्वी जिस तरह गायब हुए और आरजेडी नेताओं ने कांग्रेस को उसकी ‘ताकत’ और ‘औकात’ का एहसास कराना शुरू किया, वह उसके नेताओं को नागवार गुजरा है. प्रशांत किशोर इसका फायदा उठाने की कोशिश में जुट गए हैं.
बिहार में चुनाव खत्म हुए 2 महीने इस 14 जनवरी को पूरे हो जाएंगे. आमतौर पर चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक दलों को जोड़-तोड़ का मौका तभी मिलता है, जब नतीजों में मामूली अंतर होता है. बिहार में ऐसी बात नहीं. एनडीए के पास 202 सीटें हैं तो विपक्षी महागठबंधन के पास महज 35 सीटें. इनके अलावा विपक्ष की 2 और पार्टियों को कुल अदद 6 सीटें मिली हैं. यानी सरकार पलटने का कोई बड़ा कारण प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखता. इसके बावजूद रह-रह कर सरकार बदलने के शिगूफे महागठबंधन के अग्रणी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेताओं की ओर से आते रहते हैं. हालांकि अब तो राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन में भी फूट के संकेत मिलने लगे हैं.
राजद-कांग्रेस में मन मुटौवल
चुनाव नतीजे आने के बाद तेजस्वी यादव ने अपने को सबसे पहले नेता प्रतिपक्ष घोषित करा लिया. विधायकी की शपथ लेने के बाद सदन से वे गायब हो गए. बाद में पता चला कि वे विदेश की सैर के लिए निकले हैं. सत्ता पक्ष इसके लिए उनकी आलोचना तो कर ही रहा था, विपक्ष में भी इसे लेकर खिचड़ी पकने लगी. चुनाव में तीसरा कोण बना कर मैदान में उतरे जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर भी कुछ दिनों के लिए बिहार से बाहर चले गए. कांग्रेस और आरजेडी के नेता आपस में ही उलझने लगे. राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने कांग्रेस की ‘ताकत’ और ‘औकात’ बताई तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने भी राजद को ललकार दिया.
प्रदेश अध्यक्षों की बयानबाजी
राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने कई बार कांग्रेस की ‘ताकत’ और ‘औकात’ पर सवाल उठाए. मंडल का मानना है कि कांग्रेस की जो भी सीटें आईं और वोट मिले, वे राजद के मजबूत आधार के कारण ही संभव हुए. वे इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने चुनौती दी कि अगर कांग्रेस अकेले लड़ना चाहती है तो जाए, किसने रोक रखा है. ‘कांग्रेस अलग होकर अपनी ताकत दिखाए. महागठबंधन की हार की जिम्मेदारी राजद नेता कांग्रेस की कमजोर संगठन और प्रदर्शन पर डाल रहे हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस महागठबंधन के लिए बोझ बन गई है. आरजेडी नेताओं के तंज पर कांग्रेस के नेता कैसे चुप बैठते. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने जवाब दिया कि राजद के साथ कांग्रेस का गठबंधन सिर्फ चुनावी था, संगठनात्मक नहीं. चुनाव खत्म होने के बाद गठबंधन का सवाल ही अप्रासंगिक है. कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पटना से दिल्ली तक जब समीक्षा बैठकें कीं तो उसमें भी शकील अहमद खान, अजित शर्मा जैसे नेताओं ने आरोप लगाए कि राजद का सहयोग नहीं मिलने के कारण कम सीटें आईं. सीट शेयरिंग में देरी हुई, और फ्रेंडली फाइट को कांग्रेस नेता नुकसान की वजह बताते हैं.
राजद के तेजस्वी से उम्मीद नहीं
महागठबंधन में 7 पार्टियां- राजद, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल), इंडियन इनक्लूसिव पार्टी (आईआईपी) और वीआईपी शामिल हैं. राजद के पास 25 सीटें हैं तो कांग्रेस के पास 6. बाकी के पास सम्मिलित रूप से 4 सीटें हैं. वीआईपी का तो खाता ही नहीं खुला. यानी तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन ने चुनाव लड़ कर 243 में सिर्फ 35 सीटें जीती हैं. महागठबंधन से इतर विपक्ष की 2 पार्टियों में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने अपने दम पर 5 सीटें जीती हैं तो मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के एक उम्मदवार को जीत मिली है. सहयोगी दलों का मानना है कि तेजस्वी यादव को समन्वय की जवाबदेही तो मिली, लेकिन वे विफल रहे. भाजपा ने जिस तरह बिहार में अपनी जड़े मजबूत कर ली हैं और जेडीयू ने जिस तरह इस चुनाव में प्रदर्शन किया है, वह तेजस्वी यादव के लिए खतरे की घंटी तो है ही.
प्रशांत किशोर को अब भी उम्मीद
प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी ने विधानसभा चुनाव में जितने उम्मीदवार उतारे थे, सबकी जमानत जब्त हो गई. एनडीए के खिलाफ मजबूती से मैदान में उतरे महागठबंधन की दुर्गति जगजाहिर है. इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने हार नहीं मानी है. उन्हें लगता है कि तेजस्वी यादव के फ्लाप होने के बाद लोग उनकी ही ओर आकर्षित होंगे. इसलिए कि एनडीए और विपक्ष को मिले वोटों का अंतर अधिक नहीं है. एनडीए को करीब 47 प्रतिशत वोट मिले तो महागठबंधन को लगभग 37 प्रतिशत मत प्राप्त हुए. यानी वोटों का अंतर महज 10 फीसद का है. प्रशांत किशोर का मानना है कि अगले चुनाव में इस फासले को पाटा जा सकता है. इसके लिए जमीन पर काम करने वाले नेतृत्व की जरूरत है. यानी वे महागठबंधन का अस्तित्व तो बनाए रखने के पक्ष में हैं, लेकिन नेतृत्व बदलना जरूरी मानते हैं. उन्होंने जन सुराज पार्टी की हार की जो वजह बताई है, उसमें तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल छिपा है. पीके ने कहा कि तेजस्वी को लोगों ने जंगल राज का प्रतीक माना और उससे बचने के लिए एनडीए की ओर जाना मुनासिब समझा. जन सुराज के समर्थकों को यह भय था कि उनके वोट बर्बाद न हों जाएं. इसलिए परिणाम पलट गया.
कांग्रेस नहीं चाहती थी फेस बताना
कांग्रेस को भी भय था कि तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने पर नुकसान के खतरे बढ़ जाएंगे. इसीलिए कांग्रेस ने आखिर तक तेजस्वी को सीएम फेस घोषित करने पर पेंच फंसा दिया था. वोटर अधिकार यात्रा के दौरान तेजस्वी के साथ रहते हुए भी राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर अपनी जुबान बंद रखी. जब आरजेडी ने मनमाने ढंग से टिकट बांटने शुरू कर दिए तो दबाव में आकर कांग्रेस ने अशोक गहलौत के माध्यम से तेजस्वी को महागठबंधन का सीएम फेस घोषित कराया. तेजस्वी के कोआर्डिनेशन की दूसरी बड़ी गड़बड़ी यह रही कि उन्होंने 3 प्रतिशत से भी कम आबाददी वाली वीआईपी के नेता मुकेश सहनी का नाम भी उप मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित करा दिया. इससे 17 प्रतिशत मुसलमानों में नाराज हो गए. कांग्रेस मुसलमानों की हिमायती रही है. जाहिर है कि तेजस्वी की यह जिद कांग्रेस को नागवार गुजरी होगी.
PK व प्रियंका की मीटिंग से संकेत
प्रशांत किशोर भी चुनाव के बाद कुछ दिनों तक बिहार से बाहर रहे. इस बीच खबर आई कि उन्होंने कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी से मुलाकात की. दोनों के बीच क्या बात हुई, यह किसी ने आधिकारिक रूप से नहीं बताया. पर, सूत्रों के हवाले से जो खबरे मीडिया में चलीं, उसका संकेत यही था कि राजद से नाराज कांग्रेस के साथ प्रशांत किशोर तालमेल करना चाहते हैं. इसके लिए 2 रास्ते हैं. वे अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दें या उसके साथ मिल कर बिहार में महागठबंधन से राजद को बाहर कराएं. ऐसा होता है तो प्रशांत किशोर बिहार में महागठबंधन का नेता होंगे. कांग्रेस में प्रशांत किशोर के जाने की बात पहले भी हुई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाने का निर्णय लिया. तीनों वामपंथी दलों में सीपीआई (एमएल) हाल के वर्षों में ताकतवर बन कर उभरी है. माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य की ट्यूनिंग कांग्रेस से अच्छी है. राहुल गांधी उनकी बात मानते भी हैं. ऐसे में प्रशांत किशोर कांग्रेस और दूसरी पार्टयों को साथ लेकर महागठबंधन से आरजेडी को आउट कर खुद नेतृत्व संभाल लें तो आश्चर्य की बात नहीं.







