बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में मिली करारी हार ने राजद (RJD) और महागठबंधन खेमे को चौंका दिया है. तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और बड़े पैमाने पर प्रचार के बावजूद पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. वहीं, चुनावी समीक्षा बैठकों में यह बात साफ हो रही है कि हार का कारण सिर्फ विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि पार्टी की अपनी बड़ी गलतियां थीं.
करिश्मा फीका या रणनीति फेल, तेजस्वी से कहां हुई चूक? कड़वी सीख पर RJD में मंथन
RJD की हार के कारण और तेजस्वी यादव की रणनीति पर उठे सवाल.
पटना. बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की अगुवाई करने वाली पार्टी आरजेडी को उम्मीद थी कि तेजस्वी यादव की लोकप्रियता इस बार बेहतर प्रदर्शन कराएगी, लेकिन परिणाम उम्मीदों के उलट रहे. हार के बाद राजद में लगातार बैठकें हो रही हैं और इन बैठकों में जो बातें निकलकर सामने आई हैं, वे पार्टी की अंदरूनी कमजोरी की ओर इशारा करती हैं. राजद के नेताओं का मानना है कि सिर्फ विपक्ष मजबूत नहीं था, बल्कि RJD खुद भी रणनीतिक गलतियों में उलझ गई. चुनाव परिणामों के बाद अब राजद में अंदरूनी हलचल तेज हो गई है.
दरअसल, महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को उम्मीद थी कि इस बार सत्ता उनके करीब होगी, लेकिन नतीजों ने सभी समीकरण बिगाड़ दिए. पार्टी को 25 सीटों पर ही सिमटना पड़ा, जबकि 2020 में उसके पास 75 सीटें थीं. लगातार बैठकों में नेता यह मान रहे हैं कि यह हार सिर्फ आंकड़ों की नहीं बल्कि रणनीति, संगठन और नेतृत्व में हुई बड़ी चूक का नतीजा है. गलत टिकट बंटवारा, फर्जी सर्वे, झूठे आत्मविश्वास और नेतृत्व तक पहुंच की कमी सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है.
उम्मीदों से बहुत कम सीटें
इस चुनाव में RJD को केवल 69 सीटें मिलीं, जबकि 2020 के चुनाव में यह आंकड़ा 75 सीटों पर था. वोट शेयर लगभग 23% पर 2020 के चुनाव की तरह ही टिक गया. तेजस्वी यादव ने करीब 40 से ज्यादा सीटों पर खुद प्रचार किया, लेकिन उसका कोई खास असर नहीं दिखा. कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह सिर्फ सीटों की हार नहीं, बल्कि मानसिक और रणनीतिक गलती है. चर्चा में यह भी सामने आया कि टिकट वितरण सोच-समझकर नहीं किया गया. कई जगह स्थानीय मजबूत नेताओं को छोड़कर पार्टी के करीबियों को टिकट दे दिया गया जिससे कार्यकर्ताओं में नाराज़गी फैल गई. उत्साह तो था, अनुभव कम
तेजस्वी यादव की छवि युवा नेता की है, लेकिन अंदरूनी बैठकों में कई नेताओं ने कहा कि अनुभव की कमी रणनीति में दिखी. पार्टी के कई पुराने नेताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान उनसे मिलने या सलाह लेने में कठिनाई होती थी.एक नेता ने कहा-तेजस्वी जी तक बात पहुंचाना मुश्किल हो गया था. कार्यकर्ताओं की आवाज़ नेतृत्व तक नहीं जा रही थी. हालांकि, तेजस्वी यादव के समर्थक मानते हैं कि यह हार आखिरकार एक सीख है और पार्टी इससे मजबूत होकर निकलेगी.
हार के बाद सबसे बड़ा मुद्दा नकली सर्वे का भी सामने आया. बताया गया कि चुनाव से पहले कई एजेंसियों ने RJD को बहुमत का दावा किया था. कुछ सर्वे में तो पार्टी को 150 सीटें तक दी गई थीं. इससे पार्टी में आत्मविश्वास बढ़ा, लेकिन असल जमीन पर कार्यकर्ताओं ने मेहनत कम कर दी और विपक्ष ने मौके का फायदा उठाया. जानकारों का मानना है कि फर्जी सर्वे ने RJD को आत्मसंतुष्ट बना दिया और जमीनी सच्चाई अनदेखी हो गई.
टिकट बंटवारे पर बड़ा विवाद
बैठकों में सबसे तीखी चर्चा टिकट बंटवारे पर हुई. कई जिलों में बाहरी उम्मीदवारों को उतारने से स्थानीय स्तर पर नाराजगी बढ़ी इससे कोर वोट बैंक में भी दरार पड़ी. विपक्ष की एकजुटता और बूथ मैनेजमेंट भी RJD से बेहतर रहा.एक पूर्व विधायक ने कहा, हमने सोचा था महागठबंधन जीतेगा, लेकिन NDA की एकजुटता ने सब बदल दिया. हालांकि, पार्टी अब सुधार की बात कर रही है.सवाल यह है-क्या तेजस्वी इस सीख को संगठनात्मक ताकत में बदल पाएंगे?
गलतियों से क्या सबक?
बहरहाल, बिहार चुनाव में हार ने RJD को सोचने पर मजबूर कर दिया है. अब आरजेडी भविष्य की तैयारी में जुट गई है और नजरें लोकसभा चुनाव पर हैं. पार्टी अब टिकट चयन प्रक्रिया सुधारने, जमीनी नेताओं और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को ज्यादा भूमिका देने और चुनावी रणनीति में पारदर्शिता लाने की बात कर रही है. सवाल अब यह है कि क्या तेजस्वी यादव इस हार को सबक में बदल पाएंगे और क्या आरजेडी अब फिर से उभरकर राजनीतिक मैदान में मजबूत दावेदार बन पाएगी? बिहार की राजनीति के अगले अध्याय में यह सबसे बड़ा सवाल होगा-जवाब समय ही देगा.







