आरजेडी पर पटना से लेकर दिल्ली तक इस बार विधानसभा चुनाव की मार पड़ी है. बिहार में किसी तरह नेता प्रतिपक्ष लायक आरजेडी के विधायक सदन तक तो पहुंच गए हैं, लेकिन वे कितने टिकाऊ साबित होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं. लोजपा (आर) के नेता चिराग पासवान ने पहले इसका संकेत दिया. अब तो भाजपा कोटे के मंत्री रामकृपाल यादव ने भी कह दिया कि तेजस्वी का नेता प्रतिपक्ष का पद भी बचेगा, इसमें संदेह है. महागठबंधन में कुल जमा 35 विधायक हैं. कुछ टूट गए तो विपक्ष के लोगों का राज्यसभा और विधान परिषद जाने का सपना चकनाचूर हो सकता है.
बिहार चुनाव हार तक सीमित रहेगा RJD का संकट? इधर-उधर हुए विधायक तो…
बिहार में विपक्ष जिस हाल में है, वैसी ही रह पाएगा, कहना मुश्किल है. मंत्रिपरिषद के विस्तार तक प्रतीक्षा करनी चाहिए. भाजपा और नीतीश कुमार की सियासी चालाकियां अभी बाकी हैं. वैसे भी चुनाव बाद भी बिहार में जोड़-तोड़ चलते रहने का रिवाज रहा है. चुनाव बाद कभी बसपा का विधायक दूसरी पार्टी में चला जाता है तो खुद चिराग पासवान की पार्टी का विधायक विरोधी खेमे में खिसक जाता है. वीआईपी, एआईएमआईएम और कांग्रेस की 2020 में हुई टूट तो जगजाहिर है. आरजेडी के विधायकों में किसी वजह से 1-2 की भी कमी हुई तो तेजस्वी यादव से नेता प्रतिपक्ष का दर्जा भी छिन सकता है. हालांकि अभी उनके पास जरूरत भर के विधायक हैं और वे इस पद के सर्वथा योग्य हैं.
नेता प्रतिपक्ष के लिए कितने MLA जरूरी?
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबित बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए कुल सीटों का 10 प्रतिशत यानी 24-25 विधायकों का होना जरूरी है. आरजेडी के 25 विधायक इस बार चुन कर विधानसबा पहुंचे हैं. इसलिए प्रत्यक्ष तौर पर तेजस्वी यादव के नेता प्रतिपक्ष बनने में कोई व्यवधान नहीं दिखता. आरजेडी विधायकों ने भी उन्हें विधायक दल का नेता चुन लिया है. इसलिए पार्टी में भी कोई दिक्कत नहीं है. इससे पहले के 2 चुनावों में आरजेडी के इतने विधायक तो चुने जाते ही रहे हैं, जिनसे नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी की दावेदारी में कहीं कोई दिक्कत नहीं होती थी.
2015 और 2020 में आरजेडी को आसानी
लगातार 2 बार आरजेडी के सामने इस बार जैसी गंभीर समस्या नहीं थी. इसलिए कि तब आरजेडी के पास पर्याप्त संख्या में विधायक थे. 2015 में आरजेडी के 80 विधायक जीते थे. तब महागठबंधन की सरकार भी बनी थी, लेकिन नीतीश कुमार के अलग हो जाने के कारण आरजेडी को विपक्ष में बैठना पड़ा. 2020 में भी आरजेडी के 75 विधायक चुने गए, जिससे नेता प्रतिपक्ष को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं था. 2025 में आरजेडी के सिर्फ 25 विधायक हैं. इनमें किसी ने दगा किया तो खेल बिगड़ सकता है. तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष का दर्जा हासिल नहीं कर पाएंगे.
चिराग पासवान की बातों में कितना है दम?
एनडीए की घटक लोजपा (आर) के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने दावा किया है कि महागठबंधन के कई विधायक नरेंद्र मोदी से प्रभावित हैं. वे एनडीए में आना चाहते हैं. इस बीच एक चर्चा यह भी चल रही है कि कांग्रेस के साथ आरजेडी के भी कुछ विधायकों का मन डोल रहा है. ऐसे विधायक कौन हैं, इस बारे में कोई नहीं बता रहा, लेकिन टूटने के खतरे की शंका सभी जाहिर कर रहे हैं. अगर ऐसा हुआ तो इसका सबसे अधिक नुकसान तेजस्वी यादव को होगा, क्योंकि तब उनके पास वह संख्या नहीं बचेगी, जिस आधार पर वे नेता प्रतिपक्ष का दावा कर सकें.
कांग्रेस पर भी खतरा, मिलने लगे हैं संकेत
आरजेडी के अलावा महागठबंधन की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस पर भी खतरा मंडरा रहा है. इस बार कांग्रेस के जीते विधायकों में 4 पिछले दिनों महागठबंधन की बैठक से नदारद रहे. वे कांग्रेस में टिके रह पाएंगे, इसे लेकर संदेह जताया जा रहा है. कहा तो यह जा रहा है कि उनकी डील जेडीयू से हो चुकी है. वे कभी भी पाला बदल सकते हैं. कांग्रेस के बारे में कयास को खारिज भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए 2018 में कांग्रेस ऐसी टूट का सामना कर चुकी है. तब कांग्रेस के 4 एमएलसी जेडीयू में शामिल हो गए थे. उनमें अशोक चौधरी तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके थे.
छोटी पार्टियों के विधायक तोड़ना तो आसान
इस बार एनडीए ने 202 सीटों पर जीत दर्ज की है. बाकी 41 सीटों में 25 पर आरजेडी, 6 पर कांग्रेस, 5 पर एआईएमआईएम के अलावा आईपी और बसपा ने 1-1 सीट पर जीत दर्ज की है. बसपा का पुराना रिकार्ड रहा है कि उसके विधायक जीतने के बाद सत्ताधारी खेमे में चले जाते हैं. एआईएमआई का भी टूट का रिकार्ड रहा है. पिछली बार उसके 5 में 4 विधायक आरजेडी के साथ चले गए थे. इंडियन इनक्लूसिव पार्टी का सिर्फ एक विधायक पहली बार सदन विधानसभा पहुंचा है. आरजेडी के भी कुछ विधायकों ने 2024 में फ्लोर टेस्ट के दौरान पाला बदल लिया था. उनमें प्रमुख थे आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद और बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी. इसलिए विधायकों में पाला बदल का खेल फिर शुरू हो तो आश्चर्य नहीं. हालांकि इस बार जो पाला बदलेंगे, उनकी पसंद एनडीए के ही घटक दल होंगे, इतना तो निश्चित है.
विधान परिषद और राज्यसभा में होगा असर
बिहार विधानसभा चुनाव में कम सीटें आने का असर बिहार विधान परिषद और राज्यसभा में भी परिलक्षित होगा. राज्यसभा के लिए 35 विधायकों का होना जरूरी है, जो महागठबंधन की सम्मिलित संख्या से तो पूरा हो जाता है, लेकिन इसके लिए सभी विधायकों का अपनी पार्टी में बने रहना जरूरी होगा. अगर यह संख्या घटती है तो विपक्ष (महागठबंधन) एक भी सदस्य राज्यसभा नहीं जा पाएगा. इसी तरह विधान परिषद चुनाव में कम संख्या बल का असर दिखना स्वाभाविक है. विधान परिषद में ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि राबड़ी देवी की नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी खिसक जाए. जिस हैसियत से उन्हें 10 सर्कुलर रोड बंगला आवंटित हुआ था, वह हैसियत भी जा सकती है. इसलिए आने वाला तेजस्वी यादव के लिए आसान नहीं दिखता. कोर्ट-कचहरी के मामले तो अलग सिरदर्द बने ही हुए हैं.
समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………
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