2025 के विधानसभा चुनाव में हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के पांच विधायक चुने गये। लेकिन इनमें किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। इसी तरह राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के चार विधायक चुने गये। इनमें से भी किसी को मंत्री नहीं बनाया गया। रालोमो के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्री पद दिला दिया जब कि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। जीतन राम मांझी ने भी चुने हुए विधायकों की बजाय अपने एमएलसी पुत्र संतोष कुमार सुमन को मंत्री बनाये रखना ही उचित समझा। यह एक तरह से लोकतंत्र की आत्मा का निरादर है। विधानसभा ही आम जनता की आवाज का लोकप्रिय मंच है। आखिर मांझी और कुशवाहा ने जनता द्वारा चुने हुए विधायकों को मंत्री क्यों नहीं बनाया ?
बेटा की बाप की विरासत संभालेगा?
जीतन राम मांझी की बहू दीपा मांझी विधायक बनने के बाद भी मंत्री नहीं बनीं। हम कोटा से उनके पति संतोष कुमार सुमन मंत्री बने। 2020 की पिछली सरकार में भी वे मंत्री थे। लेकिन उस समय दीपा विधायक नहीं बनीं थीं। अब जब वे विधायक बनीं तो मंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी क्यों कमजोर पड़ गयी ? शायद जीतन राम मांझी अपनी विरासत पुत्र को सौंपने के पक्षधर हैं। आज के दौर में नेता भले प्रगतिशील होने का दावा करें लेकिन अंदर से उनकी सोच अभी भी रूढ़िवादी है। वे पितृसत्तात्मक सोच से बाहर नहीं निकल पाए हैं। बेटा ही बाप की विरासत को आगे बढ़ाएगा, ये सोच अभी भी दिमाग में बैठी हुई है। बहू या बेटी योग्य है, फिर भी उसे मौका नहीं मिलेगा क्यों पिता बेटे की मोह में जकड़ा हुआ है।
दीपा मांझी की राजनीतिक योग्यता
दीपा मांझी ने एक साल के अंदर दो विधानसभा चुनाव जीत कर एक बड़ी कामयाबी हासिल की। इन चुनावों में उन्हें जीतन राम मांझी की बहू होने का लाभ जरूर मिला लेकिन एक कुशल वक्ता के रूप में उन्होंने अपनी गहरी छाप भी छोड़ी। 2024 में इमामगंज विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था। दीपा मांझी ने इस उप चुनाव में हम उम्मीदवार के रुप में चुनाव लड़ा और राजद के रोशन कुमार को 5945 मतों से हरा कर विधायक बनी। 2024 के लोकसभा चुनाव में जीतन राम मांझी के सांसद चुने जाने के बाद इमामगंज की सीट खाली हुई थी जिसकी वजह से उप चुनाव हुआ था। 2025 के विधानसभा चुनाव में दीपा मांझी ने अपनी सीट बरकरार रखी। उन्होंने राजद उम्मीदवार रितु प्रिया को 25 हजार से अधिक मतों से हराया।
दीपा को काबिलियत के आधार पर 2024 में मिला टिकट
दीपा मांझी ने इमामगंज सीट पर अपने ससुर जीतन राम मांझी की विरासत को कायम रखा। जीतन राम मांझी इस सीट पर 2015 और 2020 में विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। 2024 के उप चुनाव में दीपा की राजनीति में एंट्री हुई थी। वे जीतन राम मांझी के बड़े पुत्र संतोष कुमार सुमन की पत्नी हैं। जब इस चुनाव में हम उम्मीदवार के चयन पर विचार-विमर्श चल रहा था तब जीतन राम मांझी के छोटे पुत्र प्रवीण कुमार और दामाद देवेन्द्र मांझी भी टिकट के दावेदार थे। लेकिन आखिर में दीपा मांझी को टिकट दिया गया। दीपा मांझी की चुनावी राजनीति में भले देर से एंट्री हुई लेकिन वे सोशल मीडिया पर खुल राजनीतिक विचार व्यक्त करती रही हैं। 2021-22 के दौरान एक्स पर दीपा और रोहिणी आचार्या की जुबानी जंग बहुत चर्चा में रही थी। उस समय लोग दीपा को ‘दबंग दीपा’ कहने लगे थे।
दीपक प्रकाश को मंत्री बना कर उपेन्द्र कुशवाहा ने चौंकाया
पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश, उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र हैं। किसी को उम्मीद नहीं थी कि दीपक प्रकाश मंत्री बनेंगे। उन्होंने चुनाव भी नहीं लड़ा था। खुद दीपक को मंत्री पद की शपथ लेने के कुछ घंटे पहले ही इस बात का पता चला था। जब उपेन्द्र कुशवाहा की पत्नी और दीपक प्रकाश की मां स्नेहलता सासाराम से विधायक चुनी गयीं तो यही माना जा रहा था कि रालोमो कोटे से वही मंत्री बनेंगी। लेकिन अचानक दीपक प्रकाश का नाम मंत्रिपरिषद की सूची में शामिल हो गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
उपेन्द्र कुशवाहा के तर्क पर सवाल
उपेन्द्र कुशावाह से जब दीपक प्रकाश को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी पार्टी को एकजुट रखने के लिए यह दांव खेला है। 2014 में उनकी पार्टी के तीन सांसद चुने गये थे। बाद में दो ने पार्टी छोड़ दी। 2015 में उनकी पार्टी से 2 विधायक चुने गये थे। बाद में दोनों ने पार्टी छोड़ दी। चूंकि उनके सांसद और विधायक पार्टी छोड़ कर चले जा रहे थे इसलिए उन्होंने 2025 में सावधानी बरती और किसी विधायक को मंत्री नहीं बनाया। उपेन्द्र कुशवाहा का यह तर्क गले के नीचे नहीं उतरने वाला है। उनकी पत्नी विधायक चुनी गयीं। अगर उन्हें मंत्री बनाया जाता तो क्या वे पार्टी छोड़ कर चली जातीं ? जाहिर है उपेन्द्र कुशवाहा सच नहीं बोल रहे।
स्नेहलता को मंत्री नहीं बनाये जाने से सासाराम में नाराजगी
जब उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्री पद दिला दिया तो सासाराम की जनता में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। वहां के वोटरों ने स्नेहलता कुशवाहा को यह सोच कर समर्थन दिया था कि अगर वे जीतीं तो मंत्री जरूर बनेंगी। इस सोच ने भोजपुर- रोहतास जिले की 14 सीटों पर कोइरी (कुशवाहा) समुदाय को एनडीए के पक्ष में एकजुट कर दिया था। इन 14 से 13 सीटें एनडीए को मिलीं। नतीजों से समझा जा सकता है कि कोइरी समुदाय स्नेहलता कुशवाहा के प्रति कितना संवेदनशील था। लेकिन जब स्नेहलता मंत्री नहीं बनीं तो उनमें नाराजगी पैदा हो गयी। मतदाताओं की नाराजगी का खतरा मोल लेकर भी कुशवाहा ने आखिर बेटे को मंत्री क्यों बनाया ?
विधान परिषद की एक सीट पहले ही पक्की
माना जाता है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने दो कारणों से अपने पुत्र को मंत्री बनाया। पहला ये कि दीपक प्रकाश को मंत्री बना कर पहले ही विधान परिषद की एक सीट पक्की कर ली। चुनाव के बाद भाजपा विधान परिषद की एक सीट देने पर टालमटोल कर सकती थी। लेकिन अब तो दीपक प्रकाश के मंत्री पद को बरकरार रखने के लिए छह महीने के अंदर ही उन्हें विधान पार्षद बनाना होगा।
सॉफ्टवेयर इंजीनियर को बना दिया राजनीतिज्ञ
दूसरा कारण ये कि अन्य नेताओं की तरह उपेन्द्र कुशवाहा भी अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी पुत्र को ही बनना चाहते हैं। उन्होंने एक तरह से अपने पुत्र को जबरन राजनीति में उतार दिया। दीपक प्रकाश सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उन्होंने मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कम्प्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है। उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कुछ समय तक जॉब भी किया। पिछले कुछ समय से वे जंदाहा (पैतृक निवास) में आईटी क्षेत्र से जुड़ा अपना उद्यम चला रहे थे। लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा ने अपनी विरासत संभालने के लिए एक होनहार इंजीनियर को राजनीतिज्ञ बना दिया। शायद उपेन्द्र कुशवाहा की भी पितृसत्तात्मक परम्परा के समर्थक हैं।







