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अब बंगला न छोड़ने की जिद क्यों जब 2015 में लालू ने अपने विधायकों से खुद कहा, मारामारी क्यों? नियम से मिलेगा आवास

UB India News by UB India News
November 27, 2025
in पटना, बिहार, राजद
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राजनीति में सिर्फ आवास बदलना नहीं होता, बल्कि सत्ता, प्रभाव और पहचान के परिवर्तन का संकेत होता है………………
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आज लालू यादव और राबड़ी आवास को लेकर बिहार में राजद ने हंगामा खड़ा कर रखा है। एक वक्त यही लालू यादव थे जिन्होंने आज से 10 साल पहले कहा था कि आवास के लिए मारामारी ठीक नहीं। खुद का उदाहरण देते हुए कहा था कि पहले कार्यकाल में वो 4 महीने चपरासी क्वार्टर में रहे।

पटना: राबड़ी देवी को 39, हार्डिंग रोड आवास आवंटित होने के बाद लालू परिवार के आवास का मुद्दा सुर्खियों में है। लेकिन ये वही लालू यादव हैं जो मुख्यमंत्री बनने के बाद भी चार महीने तक अपने पूरे परिवार के साथ चपरासी क्वार्टर में रहे। यह क्वार्टर भी उनका नहीं था। उनके दो बड़े भाई पटना वेटनेरी कॉलेज में चपरासी (प्यून) के पद पर कार्यरत थे। उन्हें ही वेटनरी कॉलेज परिसर में चपरासी आवास आवंटित हुए थे। लालू यादव तब से अपने बड़े भाई के साथ यहां रहते थे जब वे पढ़ने के लिए फुलवरिया (गोपालगंज) से पटना आये थे। उनका छात्र जीवन वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर में गुजरा। 1980 में पहली बार विधायक बने तो भी यहीं रहे। 1988 में नेता प्रतिपक्ष बने तो भी यहीं रहे। 1990 में मुख्यमंत्री बने तो चार महीने तक चपरासी क्वार्टर में ही रहे।
सीएम पद की शपथ लेने के बाद चले गये चपरासी क्वार्टर
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद लालू यादव चपरासी क्वार्टर चले गये थे। इससे प्रशासनिक अधिकारियों को सीएम प्रोटोकॉल पूरा करने में बहुत दिक्कत हुई। आम लोग उनसे वहीं मिलने आने लगे। उन्होंने जनता को संदेश दिया कि सत्ता का संचालन आधुनिक दफ्तरों और साज-सज्जा वाली इमारतों से नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे जनता के बीच बैठ कर होगा। मुख्यमंत्री के रूप में लालू यादव ने चपरासी क्वार्टर में पहला जनता दरबार लगाया था। वहां कोई प्रशासनिक दफ्तर नहीं था। एक लकड़ी की चौकी और उसके अगल-बगल काठ की तीन-चार कुर्सियां रहतीं। सुरक्षा का बड़ा तामझाम भी नहीं रहता। कुछ पुलिसकर्मी ही भीड़ को संभाल लेते। मुख्यमंत्री के पास जाने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं थी। प्रोटोकॉल के नाम पर जांच का भी कोई झंझट नहीं थी। आने वाले लोग आसानी से मुख्यमंत्री से मिल कर अपनी परेशानी बता रहे थे। ऐसा कर के लालू यादव यह स्थापित करना चाहते थे कि वे गरीब-गुरबों के मुख्यमंत्री हैं।
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सत्ता की चौखट पर आम लोग आसानी से पहुंचे
यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन था। कई दशकों तक आम लोगों के लिए सत्ता की चौखट तक पहुंचना किसी सपने से कम नहीं था। अब वे मुख्यमंत्री के सामने बैठ कर अपनी समस्याएं रख रहे थे। लालू यादव किसी समस्या को सुन कर पास बैठे अफसर को कहते कि फलां अफसर को फोन लगा कर तुरंत इसका समाधान निकालने के लिए कहो। समाधान आज का आज होना चाहिए। मैं कोई बहाना नहीं सुनूंगा। लालू यादव की इसी शैली ने उन्हें लोकप्रियता की बुलंदी पर पहुंचा दिया। तब पटना के अखबारों में छपा था, मुख्यमंत्री चपरासी क्वार्टर से बिहार का शासन चला रहे हैं।
लालू सरकार के मंत्री रहे अपने मित्र के घर
ऐसा नहीं है कि उस समय सिर्फ मुख्यमंत्री लालू यादव ही चमक-दमक से दूर साधारण जीवन जी रहे थे। उनके मंत्रिमंडल के एक प्रमुख सदस्य रामजीवन सिंह अपने मित्र के घर पर रह रहे थे। कृषि मंत्री के रूप में वे सरकारी बंगले में रहने नहीं गये थे। मंत्री रामजीवन सिंह जिस घर में मेहमान थे वहां टेलीफोन की भी व्यवस्था नहीं थी। ऊर्जा और सिंचाई मंत्री जगदानंद सिंह भी एक डाकबंगले में रह रहे थे और वहां भी टेलीफोन नहीं था। अन्य मंत्री वृष्णि पटेल, मंगल सिंह और रमई राम भी छोटे सरकारी आवास में रहे। इन्होंने मंत्री के रूप में किसी बड़ी कोठी की मांग नहीं की।
मैं जमींदार का बेटा नहीं, पब्लिक का आदमी हूं- लालू यादव
एक साक्षात्कार में लालू यादव ने 1995 में कहा था, मैंने इतना काम किया फिर लोग कहते हैं लालू यादव जोकर है। उसे संयमित हो कर बोलना चाहिए। ये संयमित क्या होता है? जो संयमित रहते हैं वे अक्सर दिल का दौरा पड़ने से मर जाते हैं। मुझे खुलापन पसंद है। लोग बहुत कुछ कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं लालू यादव को अंग्रेजी नहीं आती। मुझसे अंग्रेजी आने की उम्मीद कैसे की जा सकती है, मैं तो मवेशी चराने वाला हूं। क्या अंग्रेजी सीखना इतना आसान है? क्या यह इंजेक्शन जैसा है कि लगा लें? मैं तो लाखों लोगों से इस तरह (ग्रामीण शैली) बात करता हूं ताकि लोग जान सकें कि मैं कौन हूं? वे जान सकें कि मैं भी उन्ही का एक हिस्सा हूं। मैं कोई जमींदार का बेटा नहीं बल्कि पब्लिक का आदमी हूं।
मैं तुरंत फैसला लेता हूं- लालू यादव
लालू यादव ने दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद कहा था, मुझे किसी सलाहकार की जरूरत नहीं। मैं सारे प्रशासनिक कार्य कर सकता हूं। मैं तुरंत फैसला लेता हूं और कभी-कभी तो कैबिनेट से भी राय मशवरा नहीं करता। मंत्रियों का काम ये बताना है कि उनके इलाके में क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए। फैसला तो मुख्यमंत्री लेता है। मैं जो भी करता हूं आम जनता के हित में करता हूं।
आवास के लिए इतनी मारामारी क्यों, नियम से मिलेगा- लालू यादव
सरकारी बंगलों को लेकर मंत्री और विधायक का क्या रवैया होना चाहिए ये सीख खुद लालू यादव ने 2015 में दी थी। लालू-नीतीश गठबंधन के बहुमत में आते ही राजद के दो और जदयू के एक विधायक पर आरोप लगा था कि उन्होंने बिना आवंटन के ही पूर्व विधायकों के आवास पर जबरन कब्जा कर लिया है। उस समय आरोप लगा था कि राजद विधायक अरुण कुमार यादव, अनिल कुमार यादव और जदयू विधायक आरएन सिंह ने कथित रूप से पहले रहने वाले विधायकों के नेम प्लेट को हटा कर अपने नेम प्लेट लगा दिये थे। हालांकि इस मामले में कोई प्रमाणिक शिकायत नहीं मिली थी। मीडिया रिपोर्ट के आधार पर ये आरोप लगाया गया था।

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