बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिल गया. नीतीश कुमार के नेतृत्व में फिर से एनडीए ने सरकार भी बना ली. कैबिनेट की पहली बैठक के फैसलों से यह बात साफ हो गई है कि चुनाव के दौरान एनडीए के नेताओं ने जो वादे किए, अब उन पर अमल होंगे. अगले 5 साल तक एनडीए को अपने वादे पूरे करने होंगे. बहरहाल, चुनावी सफलता के बाद अब एक और योजना पर एनडीए में जबरदस्त मंथन चल रहा है. अभी तक भाजपा पर आरोप लगते रहे हैं कि वह ऑपरेशन लोटस के जरिए विपक्ष को खत्म करने की योजना पर काम करती है. पर, इस बार यह काम एनडीए के प्रमुख घटक दल जेडीयू की ओर से हो सकता है.
विपक्ष पर ‘तीर’ चलाने की आहट सुनाई पड़ने लगी है. इसकी जद में कौन-कौन दल आएंगे, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन माना जा रहा है कि जेडीयू के निशाने पर कांग्रेस और एआईएमआईएम के विधायक हैं.
कांग्रेस के 6 और AIMIM के 5 पर नजर
इस बार बिहार में कांग्रेस के 6 विधायक चुने गए हैं. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के 5 विधायक निर्वाचित हुए हैं. पिछली बार भी AIMIM के 5 विधायक चुने गए थे, जिनमें अमौर क्षेत्र से निर्वाचित अख्तरुल ईमान को छोड़कर 4 को आरजेडी ने अपने पाले में कर लिया था. जिन विधायकों ने अपनी निष्ठा बदल कर आरजेडी ज्वाइन किया, उनमें मोहम्मद मुर्शेद आलम (जोकीहाट), मोहम्मद सरवर आलम (कोचधामन), तौसीफ आलम (बहादुरगंज) और गुलाम सरवर (बैसी निर्वाचन क्षेत्र) शामिल थे.
नीतीश कुमार के फिर से सीएम बनने के बाद AIMIM विधायकों के टूटने का खतरा अधिक है. इसलिए कि महागठबंधन की करारी हार के बाद ओवैसी के विधायकों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है. चुनाव में हार के बाद कांग्रेस में जिस तरह सिर फुटौवल शुरू हो गया है, उससे उसके 6 विधायकों पर भी पाला बदलने का खतरा मंडरा रहा है.
मंडिमंडल में जेडीयू ने 6 सीटें खाली रखीं
विपक्षी दलों में टूट की आशंका इसलिए अधिक है कि जेडीयू ने अपने कोटे के मंत्रियों के 6 पद अभी खाली रखे हैं. बिहार में 36 मंत्री पद हैं. इनमें अभी तक सीएम समेत 27 मंत्रियों ने शपथ ली है. शपथ लेने वाले मंत्रियों में 2 उपमुख्यंत्री समेत भाजपा कोटे के 14 मंत्री हैं. जेडीयू कोटे से सिर्फ 8 मंत्रियों ने शपथ ली है. यानी भाजपा के बराबर संख्या को आधार मानें तो जेडीयू के कोटे से और 6 मंत्री बनाए जा सकते हैं.
ये पद जेडीयू ने क्यों खाली छोड़े हैं, इसमें ही विपक्ष में टूट के सूत्र छिपे नजर आ रहे हैं. पिछले चुनाव (2020) की 43 सीटों के मुकाबले इस बार जेडीयू के 85 विधायक चुने गए हैं. भाजपा 89 विधायकों के साथ अव्वल दर्जे की पार्टी बन गई है. नीतीश कुमार की कोशिश होगी कि किसी तरह अपने विधायकों की संख्या बढ़ाएं, ताकि जेडीयू को नंबर वन पार्टी बनाने का उनका सपना पूरा हो सके. नीतीश कुमार लंबे समय तक एनडीए में बड़े भाई रहे हैं. 2020 में यह सिलसिला रुक गया. चिराग पासवान के अलग चुनाव लड़ने से जेडीयू को 2020 में तकरीबन 3 दर्जन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था.
पहले भी कांग्रेस को तोड़ा है नीतीश ने
कांग्रेस के विधायक अगर टूटते हैं तो यह पहली बार नहीं होगा. इससे पहले भी कांग्रेस टूटती रही है. नीतीश कुमार 2017 में जब महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में लौट आए थे, उसके साल भर बाद 2018 में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक चौधरी के साथ कांग्रेस के कई नेता जेडीयू में शामिल हो गए थे. अशोक चौधरी ने 1 मार्च 2018 को कांग्रेस छोड़कर जेडीयू की सदस्यता ग्रहण कर ली थी. उनके साथ कांग्रेस के 3 अन्य एमएलसी भी जेडीयू में शामिल हुए थे.
जेडीयू में आने के कुछ समय बाद ही अशोक चौधरी को नीतीश ने कैबिनेट मंत्री बना दिया था. अशोक चौधरी के साथ जेडीयू ज्वाइन करने वालों में 3 अन्य एमएलसी थे- दिलीप कुमार चौधरी, तनवीर अख्तर और रामचंद्र भारती. अशोक चौधरी ने अन्य 3 एमएलसी के अलावा कांग्रेस के 13 दूसरे नेताओं को भी जेडीयू से जोड़ा था. इस तरह झटके में कांग्रेस के 17 नेता जेडीयू का हिस्सा बन गए थे.







