टाटा ट्रस्ट्स के भीतर उठे विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है. उद्योगपति मेहली मिस्त्री, जिन्हें हाल ही में ट्रस्ट्स के बोर्ड में दोबारा नियुक्ति नहीं मिली थी, ने अब मुंबई के चैरिटी कमिश्नर के समक्ष कैविएट (Caveat) दायर की है. इसमें उन्होंने अनुरोध किया है कि टाटा ट्रस्ट्स के बोर्ड में किसी भी तरह के बदलाव पर कोई निर्णय लेने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए. कैविएट एक कानूनी सुरक्षा प्रावधान है, जिसके तहत कोई व्यक्ति किसी संभावित आदेश या निर्णय से पहले अदालत या सक्षम प्राधिकारी को यह सूचित करता है कि बिना उसकी बात सुने कोई फैसला न किया जाए. मिस्त्री ने यह कैविएट चैरिटी कमिश्नर के समक्ष इसलिए दाखिल की है ताकि ट्रस्ट्स की ओर से बोर्ड में किसी भी आधिकारिक बदलाव को मंजूरी देने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का अधिकार मिले.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, मेहली मिस्त्री ने यह नोटिस सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट, सर रतन टाटा ट्रस्ट, और बाई हिराबाई जमसेटजी नवसारी चैरिटेबल इंस्टिट्यूशन के सभी ट्रस्टीज़ को भेजा है, जिनमें चेयरमैन नोएल टाटा भी शामिल हैं. टाटा ट्रस्ट्स के नियमों के अनुसार किसी भी ट्रस्टी की पुनर्नियुक्ति तभी संभव होती है जब सभी ट्रस्टी सर्वसम्मति से इसके पक्ष में हों. मेहली मिस्त्री को रतन टाटा ने अक्टूबर 2022 में तीन वर्ष के लिए बोर्ड में शामिल किया था. उनका कार्यकाल 28 अक्टूबर 2025 को समाप्त होना था. लेकिन, 23 अक्टूबर 2025 को ट्रस्ट्स ने उनकी पुनर्नियुक्ति के लिए सर्कुलर जारी किया, जिस पर ट्रस्टीज़ के बीच राय बंटी रही और मेहली को दोबारा नियुक्ति नहीं मिली.
मिस्त्री का कानूनी तर्क क्या है?
वरिष्ठ अधिवक्ता एच. पी. रानीना के अनुसार, मिस्त्री चारिटी कमिश्नर के समक्ष यह तर्क रखेंगे कि 17 अक्टूबर 2024 को ट्रस्ट्स ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था कि सभी मौजूदा ट्रस्टी अपने कार्यकाल समाप्त होने पर स्थायी ट्रस्टी के रूप में फिर से नियुक्त किए जाएंगे. रानीना ने कहा, महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट और ट्रस्ट डीड के अनुसार, ट्रस्ट्स द्वारा पारित कोई भी प्रस्ताव बाध्यकारी होता है. यदि ट्रस्ट्स इस प्रस्ताव को रद्द करना चाहते हैं, तो उन्हें नया मीटिंग बुलाकर सर्वसम्मति से इसे निरस्त करना होगा.
हालांकि, मिस्त्री की पुनर्नियुक्ति का विरोध करने वाले एक ट्रस्टी का कहना था कि 17 अक्टूबर का प्रस्ताव केवल प्रक्रिया पूरी करने के लिए था, इसे कानूनी बाध्यता नहीं माना जा सकता क्योंकि यह ट्रस्टीज़ की जिम्मेदारियों और कानून की भावना के विपरीत है. कुछ वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि अक्टूबर 2024 का प्रस्ताव तब तक लागू नहीं हो सकता, जब तक ट्रस्ट डीड में इस तरह का प्रावधान जोड़ा न गया हो. वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा, “मिस्त्री को यह दिखाना होगा कि उनकी पुनर्नियुक्ति खारिज करने की प्रक्रिया में न्यायिक त्रुटि, दुरुपयोग, या ट्रस्ट डीड का उल्लंघन हुआ है, तभी उनका तर्क मजबूत होगा.”
वरिष्ठ वकील शेखर नफाडे ने कहा, “चारिटी कमिश्नर का अधिकार क्षेत्र सीमित है. वह केवल यह देखता है कि दाखिल की गई कैविएट सच्ची और वैध है या नहीं. वह ट्रस्ट के निर्णय की बुद्धिमत्ता या उचितता पर टिप्पणी नहीं कर सकता. लेकिन अगर इससे गतिरोध या कुप्रशासन की स्थिति बनती है, तब कमिश्नर हस्तक्षेप कर सकता है. अन्यथा, ट्रस्ट अपने ट्रस्ट डीड के अनुसार अपने मामलों का संचालन करने के लिए स्वतंत्र है.”







