बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar Assembly Elections 2025) का बिगुल भले ही अभी आधिकारिक रूप से नहीं बजा हो, लेकिन माहौल चुनावी हो चुका है. तमाम दल अपनी-अपनी ताकत झोंकने में जुटे हैं. चुनावी रणनीतियां, रैलियां और गठजोड़ की कवायद तेज हो गई है. ऐसे समय में राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप गुप्ता का बयान खास मायने रखता है. बिहार चुनाव को लेकर इस बार समीकरण बेहद दिलचस्प हैं. बिहार में बीजेपी और एनडीए के समर्थक चाहते हैं कि वे एक बार फिर सत्ता में लौटें. उनका कहना है कि बीजेपी की असली ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा है. जैसे छत्तीसगढ़ में बिना मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किए बीजेपी ने जीत हासिल की थी, वैसे ही बिहार में भी मोदी फैक्टर असर डाल सकता है. हालांकि बिहार का चुनाव जातीय समीकरण और क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी के कारण काफी पेचीदा है.
बीजेपी-एनडीए सत्ता वापसी की कोशिश में है और मोदी फैक्टर उसके लिए अहम साबित हो सकता है. आरजेडी मुस्लिम-यादव समीकरण पर भरोसा बनाए हुए है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को कुछ सीटें मिल सकती हैं, लेकिन सत्ता में आना अभी संभव नहीं है. जन सुराज पार्टी कुछ सीटें जरूर जीत सकती है, लेकिन सत्ता की राह अभी लंबी और मुश्किल है. वहीं बीजेपी-एनडीए सत्ता वापसी की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि आरजेडी मुस्लिम-यादव समीकरण पर भरोसा बनाए हुए है. गुप्ता ने कहा कि बिहार का चुनाव जातीय फैक्टर और नीतीश कुमार की भूमिका के कारण हमेशा जटिल होता है.
आरजेडी का समीकरण इंटैक्ट
बिहार में मुस्लिम-यादव समीकरण लगभग 32% है जो आरजेडी को मजबूत बनाता है. लंबे समय से विपक्ष में रहने के बावजूद आरजेडी की पकड़ कमजोर नहीं हुई है. पिछली बार आरजेडी सत्ता से बस एक कदम दूर रह गई थी. उन्होंने याद दिलाया कि अगर उस चुनाव में लोजपा ने एनडीए के साथ गठबंधन किया होता तो एनडीए को 138 सीटें मिलतीं. इस बार लोजपा एनडीए के साथ है और यह समीकरण को बदल सकता है.
प्रशांत किशोर की चुनौती बड़ी
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर लगातार दो साल से जनता के बीच हैं, सभाएं और पदयात्राएं कर रहे हैं. उनकी लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन वोट में तब्दील करना आसान नहीं है.प्रशांत किशोर की पार्टी कुछ सीटें जीत सकती है मगर सत्ता तक पहुंचना अभी बहुत दूर की बात है.
नीतीश कुमार फैक्टर बड़ा आधार
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार दो दशकों से बड़ा नाम हैं. र विश्लेषण में नीतीश का फैक्टर सबसे अहम होता है और इस बार भी है. लेकिन, सवाल यह है कि नीतीश के विकल्प के रूप में जनता किसे चुनती है. यही कारण है कि बिहार में वोटिंग होने के बाद भी परिणाम का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल होता है.
जातीय समीकरण और बिहार
बिहार जातिगत राजनीति का केंद्र रहा है और यही वजह है कि यहां चुनाव सिर्फ विकास या चेहरे पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरण पर भी तय होते हैं. 20-30 सालों में बिहार ने जाति जनगणना कराकर इस ट्रेंड को और मजबूत किया है. यही कारण है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही जातीय गणित पर ध्यान दे रहे हैं.







