बिहार की राजनीति में एक बार फिर लालू परिवार की अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है। आरजेडी से निकाले जाने के बाद लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने अपनी नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया। पार्टी का नाम उन्होंने ऐसा रखा है जो RJD से काफी मिलता-जुलता है। सवाल यह है कि क्या इस बगावत से तेजस्वी यादव का चुनावी खेल बिगड़ सकता है?
12 साल बाद तेज-तेजस्वी की राहें अलग
15 मई 2013 को पटना के गांधी मैदान में लालू यादव ने हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में तेज प्रताप यादव और तेजस्वी को राजनीति में लॉन्च किया था। लेकिन 12 साल बाद दोनों की राहें अलग हो गईं। तेज प्रताप ने नई पार्टी का गठन कर लिया और अपने छोटे भाई तेजस्वी पर सीधा हमला बोल दिया। तेज प्रताप ने कहा कि उन्होंने 2020 में ही ‘जनशक्ति जनता दल’ संगठन बना लिया था। उनका दावा है कि यह संगठन केवल सामाजिक न्याय और गरीब जनता के लिए काम करेगा। उन्होंने खुद को ‘गरीब का नेता’ बताते हुए कहा कि वे जनता के बीच पैदल चलकर उनकी तकलीफें समझेंगे।
तेजस्वी को कितना होगा नुकसान?
राज्य में न जनाधार और न मजबूत संगठन होने के बावजूद तेज प्रताप यादव की नई पार्टी RJD को नुकसान पहुंचा सकती है। वजह यह है कि वे लगातार खुद को लालू यादव की छवि में ढालने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है- ‘मेरे रगों में लालू यादव का खून है।’ माना जा रहा है कि वे RJD के कोर वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
पिछली बार करीब 15 सीटें कम अंतर से जीती थी राजद
दरअसल साल 2020 विधानसभा चुनाव में RJD को करीब 15 सीटों पर करीब 5 हजार से भी कम वोटों से जीत मिली थी। वहीं करीब 12 सीटों पर राजद को 2000 वोट से भी कम से हार मिली थी। राजद के लिए 12 हजार वोटों ने जीत और हार में भूमिका निभाई थी। उदाहरण के तौर पर 2020 के चुनाव में डेहरी सीट पर RJD उम्मीदवार फतेबहादुर सिंह ने BJP के सत्यनारायण सिंह को सिर्फ 81 वोट से हराया था।
कुरहनी सीट: अनिल कुमार सहनी ने BJP प्रत्याशी को 480 वोट से मात दी।
सिमरी बख्तियारपुर सीट: यूसुफ सलाउद्दीन ने VIP के मुकेश सहनी को 1474 वोट से हराया।
सिवान सीट: अवध बिहारी चौधरी ने BJP के ओम प्रकाश यादव को 1561 वोट से हराया।
यानी RJD की ये जीतें बेहद नाजुक रहीं और यहां कुछ हजार वोट का इधर-उधर होना नतीजा बदल सकता था।
जहां RJD मामूली अंतर से हारी
इसके उलट, 2020 के विधानसभा चुनाव में कई सीटें ऐसी भी थीं, जहां RJD बेहद कम वोटों से हार गई। उदाहरण के तौर पर कल्याणपुर सीट पर जेडीयू प्रत्याशी महेश्वर हजारी ने RJD उम्मीदवार को सिर्फ 1 वोट से हराया। वहीं हिलसा सीट पर जेडीयू के कृष्णमुरारी शरण ने RJD प्रत्याशी को 13 वोट से मात दी थी। जबकि चकाई सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी सुमित ने RJD उम्मीदवार सावित्री देवी को 581 वोट से हराया था।
तेज प्रताप पलट सकते हैं तेजस्वी का ‘खेल’
ऐसे में अगर तेज प्रताप यादव कुछ हजार वोट भी काट ले गए तो तेजस्वी यादव का ‘खेल’ पलट सकता है। इसका उदाहरण 2019 लोकसभा चुनाव में दिख चुका है, जब तेज प्रताप के निर्दलीय उम्मीदवार को 7,755 वोट मिले और RJD प्रत्याशी बेहद मामूली अंतर से हार गए थे।
लालू परिवार में बढ़ती कलह
तेजस्वी यादव इस खतरे को भलीभांति समझते हैं। इस बीच लालू की बेटी रोहिणी आचार्य भी नाराज चल रही हैं। हालांकि तेजस्वी ने उनके योगदान की तारीफ करते हुए कहा कि रोहिणी और मीसा भारती ने हमेशा पार्टी को आगे बढ़ाने का काम किया है और कभी निजी स्वार्थ नहीं साधा।
RJD के लिए बड़ी चुनौती
तेज प्रताप की नई पार्टी BJP या JDU से ज्यादा RJD के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। परिवार की फूट से RJD को सीधा नुकसान होगा और विरोधी इसे तेजस्वी की नाकामी के रूप में पेश करेंगे। नतीजतन, लालू परिवार का यह विवाद बिहार चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।







