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बिहार विधानसभा चुनाव : बीजेपी ने सियासी मैदान में धर्मेंद्र , केशव और पाटिल को क्यों उतारा …………

UB India News by UB India News
September 26, 2025
in पटना, बिहार विधानसभा चुनाव 2025
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बिहार विधानसभा चुनाव : बीजेपी ने सियासी मैदान में धर्मेंद्र , केशव और पाटिल को क्यों उतारा …………
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बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने पिछड़े वर्ग के दो राष्ट्रीय क्षत्रपों को तैनात कर दिया है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को बिहार में भाजपा का चुनाव प्रभारी बनाया गया है। वे पहले भी बिहार में चुनाव सहप्रभारी रह चुके हैं। इसके अलावा केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल और उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को सहप्रभारी बनाया गया है। इस तैनाती में बिहार के जातीय समीकरण का खास ध्यान रखा गया है। इनके नेतृत्व में भाजपा गैरयादव मतों को अपने पाले में करने की मुहिम चलाएगी। धर्मेंद्र प्रधान के चुनावी प्रंबधन से देश के दो सीटिंग मुख्यमंत्री खुद चुनाव हार चुके हैं। एक हैं ममता बनर्जी और दूसरे हैं नवीन पटनायक।

ओबसी चेहरों को उतारने का मतलब
धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के रहने वाले हैं और वे खंडायत कुर्मी समुदाय से आते हैं। केशव प्रसाद मौर्य कुशवाहा (कोइरी) जाति से आते हैं। सीआर पाटिल का जन्म तो महाराष्ट्र में हुआ लेकिन उनका परिवार गुजरात में आ गया। वे गुजरात पुलिस में 16 साल तक कॉन्सटेबल रहे। फिर नरेन्द्र मोदी उन्हें चुनावी राजनीति में ले आये। वे चुनाव जीतने की रणनीति बनाने में माहिर हैं। इसी विशिष्टता के कारण वे सफलता के सोपान पर ऊपर चढ़े हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी। वे मोदी-शाह के अत्यंत करीबी हैं। सीआर पाटिल बिहार चुनाव जीतने की रणनीति बनाएंगे। धर्मेंद्र प्रधान और कैशव मौर्य कोइरी-कुर्मी मतों के साथ-साथ अतिपिछड़े वोटरों को भाजपा के पक्ष में एकजुट करेंगे।

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धर्मेंद्र प्रधान मुश्किल में भी कमल खिलाते हैं
धर्मेंद्र प्रधान की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वे विपरीत परिस्थितियों में भी कमल को खिलाने की काबिलियत रखते हैं। अगर 2015 के बिहार को चुनाव को छोड़ दिया जाए तो उन्होंने अधिकतर राज्यों में भाजपा की जीत का रास्ता तैयार किया है। 2017 में उत्तराखंड, 2022 में उत्तर प्रदेश और 2024 में ओडिशा। अक्टूबर 2024 में हरियाणा विधानसभा चुनाव उनके लिए सबसे मुश्किल टास्क था। सत्ता विरोधी लहर में भाजपा के लिए सरकार को बरकरार रखना कठिन लग रहा था। लेकिन इसके बावजूद वे पार्टी को जीत दिलाने में सफल रहे। भाजपा ने 90 में 48 सीटें जीत कर बहुमत हासिल कर लिया। उस समय जाट, किसान नाराज चल रहे थे। अग्निवीर योजना को लेकर नौजवानों में गुस्सा था। दूसरी तरफ कांग्रेस बहुत मजबूती से अपना चुनाव अभियान चला रही थी। भाजपा के बागी नेता अलग चुनौती दे रहे थे।

प्रधान ने कैसे मुश्किलों पर पाया काबू
हरियाणा विधानसभा चुनाव धर्मेंद्र प्रधान की काबिलियत का सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने चुनौतियां स्वीकार की और उससे दो-दो हाथ करने की ठानी। पंचकुला, कुरुक्षेत्र और रोहतक में ज्यादा समस्याएं थीं। उन्होंने वहां कैंप लगाया। एक महीने तक इन कैंपों से हटे नहीं। स्थानीय लोगों से संवाद किया। बूथ लेवेल पार्टी कार्यकर्ताओं से बात की। उनके साथ बैठक की और धैर्यपूर्वक उनकी बातों को सुना। इससे कमजोर बूथों की पहचान में मदद मिली। कार्यकर्ताओं ओर आम लोगों से मिले फीडबैक को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाया। कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया और उनमें उत्साह पैदा किया। जिन बूथों पर पार्टी की स्थिति ठीक नहीं थी वहां गैरभाजपाई लोगों को भी अपने साथ जोड़ा। इससे योग्य उम्मीदवारों के चयन में सहूलियत हुई। टिकट मिलने के बाद करीब 25 नेताओं ने बगावत कर दी। इनमें से 22 को मना लिया गया। इस तरह मुश्किल में भी कमल खिल गया।

सीएम रहते हारीं ममता बनर्जी
धर्मेंद्र प्रधान को एक और बेहद मुश्किल अभियान पर भेजा गया था जिसमें उन्होंने कामयाबी दिला कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया था। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें केवल नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र का चुनाव प्रभारी बनाया गया था। इस सीट से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी चुनाव लड़ रहे थे। ये हाई प्रोफाइल सीट थी क्योंकि यहां से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही थीं। चुनाव के समय यहां बहुत ही तनावपूर्ण माहौल था। धर्मेंद्र प्रधान की एक चुनावी सभा पर हमला भी हुआ था, जिसमें भाजपा के कई नेता घायल हो गये थे। लेकिन बिना किसी डर-भय के वे नंदीग्राम में जमे रहे। इस चुनाव में ममता बनर्जी की हार भारतीय राजनीति के लिए एक विस्मयकारी घटना थी। धर्मेंद्र प्रधान और सुवेंदु अधिकारी ने मिल एक एक नया इतिहास लिख दिया। चुनाव में भले तृणमूल कांग्रेस को जीत मिली लेकिन इस पार्टी को एक हारे मुख्यमंत्री को फिर से कुर्सी पर बैठाना पड़ा।

धर्मेंद्र प्रधान बिहार से रह चुके हैं राज्यसभा सांसद
धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के उत्कल विश्वविद्य़ालय से एंथ्रोपोलॉजी में स्नातकोत्तर हैं। उनके पिता देवेन्द्र प्रधान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान की विशिष्टता ये है कि वे किसी संगठन को मजबूत और प्रभावशाली बनाने के लिए अथक मेहनत करते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने बिहार में जो प्रदर्शन किया था उसमें एक कारण धर्मेंद्र प्रधान की सटीक रणनीति भी थी। वे 2012 में बिहार से राज्यसभा सांसद भी चुने गये थे। 2010 के विधानसभा चुनाव में वे बिहार भाजपा संगठन के सह प्रभारी थे। इस चुनाव में भाजपा ने 91 सीटें जीती थीं जो बिहार के चुनावी इतिहास में सबसे बड़ा प्रदर्शन है। वे पिछले साल ओडिशा चुनाव में भाजपा के प्रभारी थे। उन्होंने चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस चुनाव में भाजपा ने शक्तिशाली माने जाने वाले नवीन पटनायक को हरा कर बहुत बड़ी जीत दर्ज की थी। यहां तक कि मुख्यमंत्री रहते नवीन पटनायक तक चुनाव हार गये थे।

सीआर पाटिल की क्षमता से प्रधानमंत्री भी प्रभावित
चुनाव प्रबंधन में सीआर पाटिल को कितनी महारत हासिल है, ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान से स्पष्ट हो जाता है। सीआर पाटिल को 2020 में गुजरात भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। दिसम्बर 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 में से 156 सीटें जीत कर पिछले सभी रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। इस प्रचंड जीत पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, गुजरात में बड़ी जीत का श्रेय श्री पाटिल (सीआर पाटिल) को है। उनकी सफलता का राज है जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहना। बिना किसी आडम्बर के वे हर किसी से मिलने के लिए तैयार रहते हैं। नरेन्द्र मोदी को उन पर अगाध विश्वास है। इसलिए उन्होंने अपने क्षेत्र वाराणसी का चुनाव प्रबंधन भी इन्हीं को सौंप रखा है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के विकास कार्यों की देखरेख वही करते हैं।

केशव प्रसाद मौर्य की खासियत
केशव प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश में भाजपा की लगातार जीत के एक प्रमुख योजनाकार हैं। वे कुशवाहा समुदाय से आते हैं। 2016 में उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के पक्ष में गैर यादव पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया था। इससे सपा और बसपा दोनों के जातीय समीकरण छिन्न-भिन्न हो गये थे। उन्होंने पार्टी के लिए अतिपिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल किया। उनके योगदान को देख कर उन्हें 2017 में उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में वे हार गए, लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाये रखा। कुशवाहा नेता के रूप में केशव मौर्य की लोकप्रियता को भुनाने की बिहार में भी कोशिश हुई। अप्रैल 2022 में बिहार भाजपा ने सम्राट अशोक की जयंती मनाने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम के संयोजक थे बिहार सरकार के तत्कालीन पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी (कुशवाहा)। इस मौके पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी शामिल हुए थे।

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