वर्ष 2022 से लेकर अब तक श्रीलंका, पिछले साल बांग्लादेश और अब नेपाल में हुए तीन छात्र आंदोलनों के दौरान विरोध प्रदर्शनों, उनके कारणों और सरकारों द्वारा उनसे निपटने में एक समान पैटर्न अपनाए गए हैं। ऐसा लगता है कि ये दक्षिण एशियाई क्षेत्र के अन्य देशों के लिए संदेश है, लेकिन इस क्षेत्र के सबसे बड़े देश भारत के लिए तो यह संदेश ज्यादा बड़ा है। कई समानताओं के अलावा, इन परिवर्तनों का एक बाहरी संदर्भ भी है, जो इस क्षेत्र को अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बना देता है। ये दोनों प्रतिस्पर्धी शक्तियां इस क्षेत्र में प्रभाव के लिए होड़ में हैं।
सभी आंदोलन युवाओं की प्रतिक्रिया से हो रहे हैं, जो नौकरियों व विकास के अवसरों की कमी, बढ़ती कीमतों, भ्रष्टाचार और कुशासन से निराश थे। बांग्लादेश और नेपाल में एक समानता यह उभरकर आई कि विरोध प्रदर्शन इस धारणा से शुरू हुए कि अभिजात वर्ग और उनके बच्चे अवसरों का फायदा उठा रहे हैं। स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण ने पिछले वर्ष बांग्लादेश में वह चिंगारी सुलगा दी थी, जिसे न तो सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय कम कर सका, और न ही शेख हसीना सरकार की मंजूरी इसे बुझा सकी। नेपाल में, खुद को ‘जेन-जी’ (नई पीढ़ी) कहने वाले प्रदर्शनकारी युवा, ‘नेपो किड्स’ यानी कुलीन वर्ग के बच्चों के खिलाफ हैं। सोशल मीडिया ने उन्हें मंच प्रदान किया, और सरकार द्वारा उस पर प्रतिबंध लगाने से गुस्सा और बढ़ गया।
सवाल उठता है कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में अत्याधुनिक हथियार कैसे पहुंचे? बांग्लादेश में, शस्त्रागार लूट लिए गए और विचाराधीन इस्लामवादियों को छुड़ाने के लिए जेल पर धावा बोल दिया गया। उस अराजकता के बीच ईंधन की आपूर्ति का प्रबंध किसने किया और कैसे, कि यह नदी के किनारे के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच गया? अगर बाहरी लोगों पर उंगलियां उठाई जाएं, तो भी इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। बांग्लादेश में प्रदर्शनकारी छात्रों ने मोहम्मद यूनुस को ‘नियुक्त’ किया था। उन्होंने गर्व से अपने नेता का परिचय इस रूप में कराया था कि वही विरोध आंदोलन के ‘मास्टरमाइंड’ हैं। नेपाल में, जेन-जी ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का मुखिया प्रस्तावित किया, जिस पर व्यापक सहमति नहीं बनी है।
इस कहानी के तीसरे हिस्से में एक सुखद संयोग है कि श्रीलंकाई युवा, खाद्य और ईंधन की कमी और सरकारी दमन के बावजूद, पूरे उथल-पुथल के दौरान अहिंसक बने रहे। उन्होंने धार्मिक और जातीय एकजुटता दिखाई। वे राष्ट्रपति गोतबाया को अपदस्थ करने में सफल रहे। नए राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे, जो पहले भी राष्ट्रपति रहे हैं, को बहुदलीय चुनाव कराना पड़ा। उन्होंने चुनाव लड़ा और एक युवा प्रतिद्वंद्वी से हार गए। लगता है कि अनुरा सेनानायके के नेतृत्व में श्रीलंका आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता हासिल करने की राह पर है।
इसके विपरीत, बांग्लादेश में अराजकता और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले जारी हैं, जबकि सेना व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। बदला लेने की होड़ में, यूनुस सरकार ने देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को चुनावों से बाहर रखने के लिए एक कानून बनाया है। अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को सताया जा रहा है। उसके नेता या तो भूमिगत हैं, या जेल में हैं। हसीना का भारत में निर्वासन और ढाका द्वारा उनके प्रत्यर्पण की मांग, बांग्लादेश में चुनावों की तैयारी के बीच भारत विरोधी भावना को और हवा दे रही है।
नेपाल की घटनाओं से चीन को भी उतनी ही चिंता होनी चाहिए, जितनी भारत को। लंबे समय से दोनों के बीच बफर माना जाने वाला यह हिमालयी राष्ट्र अराजकता के कगार पर खड़ा है। राजनीतिक गतिरोध, गहरी सामाजिक दरारें और विदेशी प्रभाव का साया एक तूफान में तब्दील हो गया है। यह भारत के लिए तो बुरा संकेत है ही, चीन के लिए यह और भी बुरा होगा, यदि नेपाल के विभिन्न विचारधाराओं वाले झगड़ालू कम्युनिस्टों को ग्रहण लग जाए। यह स्पष्ट नहीं है कि नेपाली आंदोलनकारी क्या चाहते हैं।
बीजिंग समर्थक माने जाने वाले प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पद छोड़ना पड़ा। हाल के वर्षों में पाला बदलने के कारण ओली और उनके प्रतिद्वंद्वी पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’, दोनों तीन-तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। अपने क्रांतिकारी अतीत को पीछे छोड़ते हुए, कम्युनिस्टों ने कथित लोकतंत्रवादियों और यहां तक कि राजशाही की वापसी की पक्षधर ताकतों के साथ भी गठजोड़ किया। इसने नेपाल को बाहरी ताकतों के साथ घरेलू राजनीति के लिए उपजाऊ जमीन बना दिया।
पूरब की ओर देखें, तो म्यांमार में शासन कर रहे चीन समर्थित सैन्य जुंटा ने बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में गहरे भू-राजनीतिक बदलावों की ओर बढ़ते हुए दिसंबर में चुनावों की घोषणा की है। म्यांमार में एक ‘मानवीय गलियारा’ बनाना है, जिसे यूनुस शासन द्वारा सुगम बनाया जा रहा है। कथित तौर पर इसे ट्रंप का समर्थन प्राप्त है। 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर और संभवतः हथियार भी भारत के पूर्वोत्तर, बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर पहुंचाए गए हैं। यह ‘गलियारा’ म्यांमार के रखाइन प्रांत से गुजरता है, जिस पर रखाइन आर्मी का नियंत्रण है, जो विद्रोहियों की सेना है और सैन्य जुंटा से लड़ रही है। इस ‘गलियारे’ के जरिये बांग्लादेश दस लाख रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने की उम्मीद कर रहा है। यह ‘गलियारा’ कलादान नदी के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह तक जाने वाली भारत की 22,000 करोड़ रुपये की परियोजना को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, ठोस सुबूत मिलना मुश्किल है, लेकिन सवाल यह है कि नेपाल में कम्युनिस्टों के हाशिये पर चले जाने और बांग्लादेश में इस्लामवादियों के संभावित उदय से किसे लाभ हो सकता है? इस दक्षिण एशिया के सिंहावलोकन में पाकिस्तान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिलहाल, पाकिस्तान अपने सेना प्रमुख, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ ‘खुशी’ के पल बिता रहा है, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप भोज पर आमंत्रित करते हैं और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग उनका स्वागत करते हैं।
कुल मिलाकर, भारत को यह ध्यान रखना चाहिए कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता तेज होती जा रही है। बांग्लादेश के साथ 4,300 किलोमीटर और नेपाल के साथ 1,700 किलोमीटर से ज्यादा लंबी छिद्रपूर्ण सीमाओं और दोनों ओर के समुदायों को जोड़ने वाले गहरे सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों के कारण अस्थिरता सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहेगी।







