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राहुल के ‘जोर’ से क्या बिहार में बदलेगी कांग्रेस की सियासी तकदीर?

UB India News by UB India News
August 17, 2025
in पटना, बिहार
0
क्या सारे दाव उल्टे पड़ रहे है ?
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कभी बिहार की सत्ता पर कांग्रेस का एकछत्र राज था. कांग्रेस की बादशाहत के आगे सभी दल नतमस्तक रहते थे. लेकिन, वर्ष 1990 के बाद से कांग्रेस ऐसे बैकफुट पर आ गई कि बिहार में लगभग समाप्त ही हो गई. कई बार वह खुद के बदल पर खड़ी होने का प्रयास भी करने की कोशिश करती हुई दिखती है, लेकिन हार के डर के आगे फिर हिम्मत नहीं कर पाती है. हालांकि, बीते दिनों में राहुल गांधी बिहार को लेकर एक्टिव हो गए हैं. यहां के संगठन में बदलाव किये हैं और कई नये समीकरण (सामाजिक) बनाने की ओर कदम भी बढ़ाए हैं. लेकिन, सवाल कांग्रेस के सियासी आधार को लेकर है, जिस पर मोटे तौर पर उनकी ही सहयोगी पार्टी राजद ने कब्जा कर रखा है. हालत यह है कि राजद के रहमोकरम पर कांग्रेस की हिस्सेदारी तय होती है. अब सवाल यह है कि एक बार फिर जब कांग्रेस खुद को रिवाइव (पुनर्जनन) करने की कोशिश करती हुई दिख रही है तो भी राजद के साथ के बिना वह आगे बढ़ना नहीं चाहती. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव साथ में बिहार में वोटर अधिकार यात्रा पर निकल रहे हैं. जाहिर है कांग्रेस अभी खुद को तैयार नहीं पाती है. ऐसे में आने वाले समय में कांग्रेस की क्या स्थिति रहने की संभावना राजनीति के जानकार बताते हैं. क्या कांग्रेस फ्रंटफुट पर आने की हिम्मत भी करेगी या फिर राजद के पीछे-पीछे ही चलेगी.

बिहार में कांग्रेस की रही है बादशाहत
वर्ष 1952 से 1985 तक बिहार में कांग्रेस का दबदबा रहा. 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 324 में से 196 सीटें जीतीं, जो 39.30% वोट शेयर के साथ थी. 1952 से 1972 तक हर चुनाव में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया. 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने 214 सीटें जीतकर कांग्रेस को 57 सीटों पर सिमटा दिया, लेकिन 1980 में कांग्रेस ने 169 सीटों के साथ वापसी की. इस दौर में कांग्रेस की ताकत उसका व्यापक सामाजिक आधार था जिसमें दलित, अल्पसंख्यक और ऊपरी जातियां शामिल थीं.

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समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………

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1990 का टर्निंग पॉइंट, कांग्रेस का पतन
वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव बिहार की सियासत में टर्निंग पॉइंट साबित हुए. जनता दल ने 122 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की, जबकि कांग्रेस 71 सीटों (24.78% वोट) पर सिमट गई. मंडल आयोग और राम मंदिर आंदोलन ने सामाजिक समीकरण बदले तो लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने यादव, मुस्लिम और ओबीसी वोटरों को अपनी ओर खींच लिया. वर्ष 1995 में कांग्रेस का प्रदर्शन और खराब हुआ, जब वह सिर्फ 29 सीटें जीत पाई. वर्ष 2000 में यह आंकड़ा 23 तक गिर गया और 2005 में महज 9 सीटें ही मिल पाईं.

वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में 2005 के विधानसभा चुनाव में बिहार में कुल सीटें 243 रह गईं. इसके बाद भी कांग्रेस ने राजद के साथ गठबंधन में 51 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 9 सीटें ही जीत पाई. वर्ष 2010 में स्थिति और बदतर हुई, जब कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिलीं. वर्ष 2015 में महागठबंधन (राजद, जदयू, कांग्रेस) के साथ कांग्रेस ने 42 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीतीं, लेकिन यह राजद और जदयू की ताकत का नतीजा था. वर्ष 2020 में 70 सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं और उसका स्ट्राइक रेट महागठबंधन में सबसे कम रहा.

राहुल गांधी की सक्रियता से नई उम्मीद

राहुल गांधी ने हाल ही में बिहार में संगठन को मजबूत करने के लिए कदम उठाए हैं. बिहार में वोटर अधिकार यात्रा में तेजस्वी यादव भी शामिल हैं, 16 दिनों में 1300 किमी कवर करेगी। इसका मकसद मतदाता सूची में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के खिलाफ जागरूकता फैलाना है। राहुल ने ‘मृत’ मतदाताओं से मुलाकात कर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। हालांकि, यह यात्रा राजद के साथ गठबंधन में है, जिससे साफ है कि कांग्रेस अभी स्वतंत्र रूप से सामने आने से हिचक रही है।

राजद की छत्रछाया कांग्रेस की मजबूरी

कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक… दलित, मुस्लिम और ओबीसी-लालू यादव के राजद ने हथिया लिया. बिहार में राजद की मजबूत पकड़ के कारण कांग्रेस गठबंधन में छोटी साझेदार बनकर रह गई है. वर्ष 2020 में कांग्रेस का वोट शेयर 9.48% था, जबकि राजद का 23.11%. ऐसे में जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की रणनीति अभी भी राजद पर निर्भर है, क्योंकि बिहार में जातिगत समीकरण और स्थानीय नेतृत्व में वह कमजोर है.
voter rights yatra, bihar Chunav 2025, Voter adhikar yatra, bihar politics, Congress leader Rahul Gandhi, RJD leader Tejaswi Yadav, Bihar Assembly Elections, Bihar News, Bihar Congress, बिहार चुनाव 2025, मतदाता अधिकार यात्रा, बिहार की राजनीति, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राजद नेता तेजस्वी यादव, बिहार विधानसभा चुनाव, बिहार समाचार, बिहार कांग्रेस,
राहुल गांधी की “वोट अधिकार यात्रा” में तेजस्वी यादव भी साथ होंगे, तेजस्वी यादव के नेतृत्व होगी, फिर भला कांग्रेस का अपना क्या होगा?

बिहार में कांग्रेस के रिवाइवल पर सवाल

जानकार कहते हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की राह आसान नहीं है. राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा और संगठन में बदलाव सकारात्मक कदम हैं, लेकिन बिना मजबूत स्थानीय नेतृत्व और स्वतंत्र रणनीति के यह नाकाफी है. अगर कांग्रेस राजद के साथ गठबंधन में ही रहती है तो उसे 20-30 सीटों तक सीमित रहना पड़ सकता है. जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को दलित और अल्पसंख्यक वोटरों को वापस लाने के लिए नई सामाजिक गठजोड़ की जरूरत है. ऐसे में जानकार कहते हैं कि बिना फ्रंटफुट पर आने की हिम्मत किये बिना बिहार में कांग्रेस का बिहार में रिवाइवल मुश्किल लगता है.

राजद की छाया में ही रहेगी कांग्रेस!

कांग्रेस के लिए बिहार में स्वतंत्र पहचान बनाना चुनौतीपूर्ण है. राहुल गांधी की सक्रियता और यात्राएं जागरूकता तो बढ़ा सकती हैं, लेकिन राजद के बिना वह प्रभावी नहीं होंगी. अगर कांग्रेस 2025 में फ्रंटफुट पर आती है और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करती है तो वह कुछ हद तक अपनी खोई जमीन वापस पा सकती है. अन्यथा वह राजद की छाया में ही रहेगी. दरअसल, बड़ी हकीकत तो यही है कि राजद के दबदबे के कारण वह स्वतंत्र रणनीति बनाने में हिचक रही है.

कभी बिहार की सत्ता पर कांग्रेस का एकछत्र राज था. कांग्रेस की बादशाहत के आगे सभी दल नतमस्तक रहते थे. लेकिन, वर्ष 1990 के बाद से कांग्रेस ऐसे बैकफुट पर आ गई कि बिहार में लगभग समाप्त ही हो गई. कई बार वह खुद के बदल पर खड़ी होने का प्रयास भी करने की कोशिश करती हुई दिखती है, लेकिन हार के डर के आगे फिर हिम्मत नहीं कर पाती है. हालांकि, बीते दिनों में राहुल गांधी बिहार को लेकर एक्टिव हो गए हैं. यहां के संगठन में बदलाव किये हैं और कई नये समीकरण (सामाजिक) बनाने की ओर कदम भी बढ़ाए हैं. लेकिन, सवाल कांग्रेस के सियासी आधार को लेकर है, जिस पर मोटे तौर पर उनकी ही सहयोगी पार्टी राजद ने कब्जा कर रखा है. हालत यह है कि राजद के रहमोकरम पर कांग्रेस की हिस्सेदारी तय होती है. अब सवाल यह है कि एक बार फिर जब कांग्रेस खुद को रिवाइव (पुनर्जनन) करने की कोशिश करती हुई दिख रही है तो भी राजद के साथ के बिना वह आगे बढ़ना नहीं चाहती. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव साथ में बिहार में वोटर अधिकार यात्रा पर निकल रहे हैं. जाहिर है कांग्रेस अभी खुद को तैयार नहीं पाती है. ऐसे में आने वाले समय में कांग्रेस की क्या स्थिति रहने की संभावना राजनीति के जानकार बताते हैं. क्या कांग्रेस फ्रंटफुट पर आने की हिम्मत भी करेगी या फिर राजद के पीछे-पीछे ही चलेगी.

बिहार में कांग्रेस की रही है बादशाहत
वर्ष 1952 से 1985 तक बिहार में कांग्रेस का दबदबा रहा. 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 324 में से 196 सीटें जीतीं, जो 39.30% वोट शेयर के साथ थी. 1952 से 1972 तक हर चुनाव में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया. 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने 214 सीटें जीतकर कांग्रेस को 57 सीटों पर सिमटा दिया, लेकिन 1980 में कांग्रेस ने 169 सीटों के साथ वापसी की. इस दौर में कांग्रेस की ताकत उसका व्यापक सामाजिक आधार था जिसमें दलित, अल्पसंख्यक और ऊपरी जातियां शामिल थीं.

1990 का टर्निंग पॉइंट, कांग्रेस का पतन
वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव बिहार की सियासत में टर्निंग पॉइंट साबित हुए. जनता दल ने 122 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की, जबकि कांग्रेस 71 सीटों (24.78% वोट) पर सिमट गई. मंडल आयोग और राम मंदिर आंदोलन ने सामाजिक समीकरण बदले तो लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने यादव, मुस्लिम और ओबीसी वोटरों को अपनी ओर खींच लिया. वर्ष 1995 में कांग्रेस का प्रदर्शन और खराब हुआ, जब वह सिर्फ 29 सीटें जीत पाई. वर्ष 2000 में यह आंकड़ा 23 तक गिर गया और 2005 में महज 9 सीटें ही मिल पाईं.

वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में 2005 के विधानसभा चुनाव में बिहार में कुल सीटें 243 रह गईं. इसके बाद भी कांग्रेस ने राजद के साथ गठबंधन में 51 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 9 सीटें ही जीत पाई. वर्ष 2010 में स्थिति और बदतर हुई, जब कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिलीं. वर्ष 2015 में महागठबंधन (राजद, जदयू, कांग्रेस) के साथ कांग्रेस ने 42 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीतीं, लेकिन यह राजद और जदयू की ताकत का नतीजा था. वर्ष 2020 में 70 सीटों पर लड़ने के बावजूद कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं और उसका स्ट्राइक रेट महागठबंधन में सबसे कम रहा.

राहुल गांधी की सक्रियता से नई उम्मीद

राहुल गांधी ने हाल ही में बिहार में संगठन को मजबूत करने के लिए कदम उठाए हैं. बिहार में वोटर अधिकार यात्रा में तेजस्वी यादव भी शामिल हैं, 16 दिनों में 1300 किमी कवर करेगी। इसका मकसद मतदाता सूची में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के खिलाफ जागरूकता फैलाना है। राहुल ने ‘मृत’ मतदाताओं से मुलाकात कर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। हालांकि, यह यात्रा राजद के साथ गठबंधन में है, जिससे साफ है कि कांग्रेस अभी स्वतंत्र रूप से सामने आने से हिचक रही है।

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बिहार में कांग्रेस के रिवाइवल पर सवाल

जानकार कहते हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की राह आसान नहीं है. राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा और संगठन में बदलाव सकारात्मक कदम हैं, लेकिन बिना मजबूत स्थानीय नेतृत्व और स्वतंत्र रणनीति के यह नाकाफी है. अगर कांग्रेस राजद के साथ गठबंधन में ही रहती है तो उसे 20-30 सीटों तक सीमित रहना पड़ सकता है. जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को दलित और अल्पसंख्यक वोटरों को वापस लाने के लिए नई सामाजिक गठजोड़ की जरूरत है. ऐसे में जानकार कहते हैं कि बिना फ्रंटफुट पर आने की हिम्मत किये बिना बिहार में कांग्रेस का बिहार में रिवाइवल मुश्किल लगता है.

राजद की छाया में ही रहेगी कांग्रेस!

कांग्रेस के लिए बिहार में स्वतंत्र पहचान बनाना चुनौतीपूर्ण है. राहुल गांधी की सक्रियता और यात्राएं जागरूकता तो बढ़ा सकती हैं, लेकिन राजद के बिना वह प्रभावी नहीं होंगी. अगर कांग्रेस 2025 में फ्रंटफुट पर आती है और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करती है तो वह कुछ हद तक अपनी खोई जमीन वापस पा सकती है. अन्यथा वह राजद की छाया में ही रहेगी. दरअसल, बड़ी हकीकत तो यही है कि राजद के दबदबे के कारण वह स्वतंत्र रणनीति बनाने में हिचक रही है.
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