बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विपक्षी दलों के विरोध के बीच चुनाव आयोग ने बड़ा बयान जारी किया है. आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया का मकसद किसी वैध मतदाता को मताधिकार से वंचित करना नहीं है. आयोग का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से मतदाता सूची से हट गया है, तो वह 1 अगस्त से 1 सितंबर के बीच जरूरी दस्तावेजों के साथ फिर से अपना नाम जुड़वा सकता है.
चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR प्रक्रिया के तहत किसी भी वैध मतदाता का नाम यदि तकनीकी कारणों या दस्तावेजों की कमी के चलते सूची से कट जाता है, तो चिंता की जरूरत नहीं है. राजनीतिक दल या खुद मतदाता निर्धारित समय सीमा में आवेदन देकर नाम फिर से जुड़वा सकते हैं. वहीं, यदि कोई अवैध रूप से शामिल मतदाता सूची में मौजूद रहता है, तो उसकी जानकारी मिलते ही उसका नाम हटाया जा सकता है. चुनाव आयोग ने अपने आदेश में यह भी साफ किया है कि यह प्रक्रिया नियमित अभ्यास का हिस्सा है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और सटीक बनाना है, ना कि किसी विशेष समुदाय या समूह को टारगेट करना.
विपक्ष का आरोप
विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के बहाने सरकार बिहार में मतदाता सूची में छेड़छाड़ कर रही है और खासतौर पर अल्पसंख्यक, दलित और गरीब वर्गों के नाम हटाए जा रहे हैं. इसी मुद्दे को लेकर राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने सड़कों से लेकर सदन तक विरोध जताया है. खुद तेजस्वी यादव ने इसे “जनतंत्र पर हमला” बताया था और चुनाव बहिष्कार तक की बात कह दी थी.नचुनाव आयोग के बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल है. जहां विपक्ष इसे “दबाव में आया बयान” कह रहा है, वहीं सत्ताधारी पक्ष इसे “स्पष्टीकरण और पारदर्शिता की कोशिश” बता रहा है.
विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के बहाने सरकार बिहार में मतदाता सूची में छेड़छाड़ कर रही है और खासतौर पर अल्पसंख्यक, दलित और गरीब वर्गों के नाम हटाए जा रहे हैं. इसी मुद्दे को लेकर राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने सड़कों से लेकर सदन तक विरोध जताया है. खुद तेजस्वी यादव ने इसे “जनतंत्र पर हमला” बताया था और चुनाव बहिष्कार तक की बात कह दी थी.नचुनाव आयोग के बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल है. जहां विपक्ष इसे “दबाव में आया बयान” कह रहा है, वहीं सत्ताधारी पक्ष इसे “स्पष्टीकरण और पारदर्शिता की कोशिश” बता रहा है.







