बिहार में हर दूसरे दिन हत्या. बीच बाजार में फायरिंग. अस्पताल के अंदर गैंगस्टर को गोली मार दी जाती है, और सरकार कहती है-सब कंट्रोल में है. आए दिन गोलीबारी, हत्या और लूट की खबरें अखबारों और सोशल मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई बिहार एक बार फिर उस ‘जंगलराज’ की ओर लौट रहा है, जिससे निकलने में दशकों लग गए थे?
फिलहाल सीएम नीतीश कुमार निशाने पर हैं, और होना भी चाहिए. आखिर उन्होंने ही खुद को ‘सुशासन बाबू’ की पहचान दी थी. बिहार से क्राइम को खत्म करने का भरोसा दिलाया था. लेकिन यह मुद्दा सिर्फ नीतीश तक सीमित नहीं है. जो लोग सोचते हैं कि इससे विपक्षी नेता तेजस्वी यादव को फायदा हो सकता है, उन्हें शायद हालात की गहराई से समझ नहीं है.
याद है वो पुराना जंगलराज?
बिहार का आम वोटर जब क्राइम के बारे में सुनता है, तो उसके दिमाग में एक तस्वीर उभरती है- 90 के दशक का बिहार, जब ‘जंगलराज’ शब्द आम बातचीत का हिस्सा बन गया था. और दुर्भाग्य से उस दौर में सत्ता तेजस्वी यादव के परिवार यानी लालू यादव और राबड़ी देवी के पास थी. अब जब लोग नीतीश राज में अपराध देखते हैं तो वे सोचने लगते हैं, ‘तेजस्वी आ गए तो कहीं इससे भी बुरा न हो?’ लोग उस दौर को याद करते हैं और ये सोचते हैं, ‘नीतीश से नाराज तो हैं, लेकिन तेजस्वी से भरोसा कैसे करें?’ ये तुलना अनजाने में ही तेजस्वी के लिए खतरे का संकेत है.
बिहार का आम वोटर जब क्राइम के बारे में सुनता है, तो उसके दिमाग में एक तस्वीर उभरती है- 90 के दशक का बिहार, जब ‘जंगलराज’ शब्द आम बातचीत का हिस्सा बन गया था. और दुर्भाग्य से उस दौर में सत्ता तेजस्वी यादव के परिवार यानी लालू यादव और राबड़ी देवी के पास थी. अब जब लोग नीतीश राज में अपराध देखते हैं तो वे सोचने लगते हैं, ‘तेजस्वी आ गए तो कहीं इससे भी बुरा न हो?’ लोग उस दौर को याद करते हैं और ये सोचते हैं, ‘नीतीश से नाराज तो हैं, लेकिन तेजस्वी से भरोसा कैसे करें?’ ये तुलना अनजाने में ही तेजस्वी के लिए खतरे का संकेत है.
फायदा नहीं, उल्टा नुकसान!
तेजस्वी यादव का चेहरा अभी भी लालू राज की याद दिलाता है, खासकर बुजुर्ग और मध्यम वर्ग के वोटर उस पल को भूलना नहीं चाहते. ऊपर से एक खास वर्ग के लोगों का मर्डर आग में घी का काम कर रहा है. नीतीश के खिलाफ गुस्सा भले बढ़ रहा हो, लेकिन उस गुस्से का लाभ तेजस्वी को मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है. ‘कम से कम नीतीश के वक्त हालत थोड़े कंट्रोल में थे’, ऐसी सोच भी वोटरों के बीच मजबूत हो सकती है. वे सोच सकते हैं कि नीतीश ने भले सुशासन का दावा खो दिया हो, लेकिन लालू राज से बेहतर ही हैं.
तेजस्वी यादव का चेहरा अभी भी लालू राज की याद दिलाता है, खासकर बुजुर्ग और मध्यम वर्ग के वोटर उस पल को भूलना नहीं चाहते. ऊपर से एक खास वर्ग के लोगों का मर्डर आग में घी का काम कर रहा है. नीतीश के खिलाफ गुस्सा भले बढ़ रहा हो, लेकिन उस गुस्से का लाभ तेजस्वी को मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है. ‘कम से कम नीतीश के वक्त हालत थोड़े कंट्रोल में थे’, ऐसी सोच भी वोटरों के बीच मजबूत हो सकती है. वे सोच सकते हैं कि नीतीश ने भले सुशासन का दावा खो दिया हो, लेकिन लालू राज से बेहतर ही हैं.
कौन बन रहा है निशाना?
बिहार का क्राइम ग्राफ देखें तो हाल की हत्या और हिंसा की घटनाएं किसी वर्ग विशेष को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. बिहार जैसे समाज में यह बात सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी कारण बन जाती है. ऐसे मामलों में लोगों की प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है और भावनाएं जब डर में बदलती हैं, तो वोट बहुत सोच-समझकर डाले जाते हैं.
बिहार का क्राइम ग्राफ देखें तो हाल की हत्या और हिंसा की घटनाएं किसी वर्ग विशेष को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. बिहार जैसे समाज में यह बात सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी कारण बन जाती है. ऐसे मामलों में लोगों की प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है और भावनाएं जब डर में बदलती हैं, तो वोट बहुत सोच-समझकर डाले जाते हैं.
तेजस्वी की मजबूत छवि लेकिन
अगर तेजस्वी यादव सोचते हैं कि नीतीश सरकार की कमजोरी अपने आप उन्हें सत्ता दिला देगी, तो ये राजनीतिक भूल होगी. उनकी छवि मजबूत है. विपक्ष के नेता के तौर पर उनका ही चेहरा है, लेकिन उन्हें अपने चेहरे से उस जंगलराज की परछाई हटानी होगी, जिसकी वजह से लोग डरे रहते हैं. विकल्प वो तभी बन पाएंगे जब सिर्फ खुद को भरोसेमंद साबित कर पाएंगे.
अगर तेजस्वी यादव सोचते हैं कि नीतीश सरकार की कमजोरी अपने आप उन्हें सत्ता दिला देगी, तो ये राजनीतिक भूल होगी. उनकी छवि मजबूत है. विपक्ष के नेता के तौर पर उनका ही चेहरा है, लेकिन उन्हें अपने चेहरे से उस जंगलराज की परछाई हटानी होगी, जिसकी वजह से लोग डरे रहते हैं. विकल्प वो तभी बन पाएंगे जब सिर्फ खुद को भरोसेमंद साबित कर पाएंगे.
बिहार में हर दूसरे दिन हत्या. बीच बाजार में फायरिंग. अस्पताल के अंदर गैंगस्टर को गोली मार दी जाती है, और सरकार कहती है-सब कंट्रोल में है. आए दिन गोलीबारी, हत्या और लूट की खबरें अखबारों और सोशल मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई बिहार एक बार फिर उस ‘जंगलराज’ की ओर लौट रहा है, जिससे निकलने में दशकों लग गए थे?
फिलहाल सीएम नीतीश कुमार निशाने पर हैं, और होना भी चाहिए. आखिर उन्होंने ही खुद को ‘सुशासन बाबू’ की पहचान दी थी. बिहार से क्राइम को खत्म करने का भरोसा दिलाया था. लेकिन यह मुद्दा सिर्फ नीतीश तक सीमित नहीं है. जो लोग सोचते हैं कि इससे विपक्षी नेता तेजस्वी यादव को फायदा हो सकता है, उन्हें शायद हालात की गहराई से समझ नहीं है.
याद है वो पुराना जंगलराज?
बिहार का आम वोटर जब क्राइम के बारे में सुनता है, तो उसके दिमाग में एक तस्वीर उभरती है- 90 के दशक का बिहार, जब ‘जंगलराज’ शब्द आम बातचीत का हिस्सा बन गया था. और दुर्भाग्य से उस दौर में सत्ता तेजस्वी यादव के परिवार यानी लालू यादव और राबड़ी देवी के पास थी. अब जब लोग नीतीश राज में अपराध देखते हैं तो वे सोचने लगते हैं, ‘तेजस्वी आ गए तो कहीं इससे भी बुरा न हो?’ लोग उस दौर को याद करते हैं और ये सोचते हैं, ‘नीतीश से नाराज तो हैं, लेकिन तेजस्वी से भरोसा कैसे करें?’ ये तुलना अनजाने में ही तेजस्वी के लिए खतरे का संकेत है.
बिहार का आम वोटर जब क्राइम के बारे में सुनता है, तो उसके दिमाग में एक तस्वीर उभरती है- 90 के दशक का बिहार, जब ‘जंगलराज’ शब्द आम बातचीत का हिस्सा बन गया था. और दुर्भाग्य से उस दौर में सत्ता तेजस्वी यादव के परिवार यानी लालू यादव और राबड़ी देवी के पास थी. अब जब लोग नीतीश राज में अपराध देखते हैं तो वे सोचने लगते हैं, ‘तेजस्वी आ गए तो कहीं इससे भी बुरा न हो?’ लोग उस दौर को याद करते हैं और ये सोचते हैं, ‘नीतीश से नाराज तो हैं, लेकिन तेजस्वी से भरोसा कैसे करें?’ ये तुलना अनजाने में ही तेजस्वी के लिए खतरे का संकेत है.
फायदा नहीं, उल्टा नुकसान!
तेजस्वी यादव का चेहरा अभी भी लालू राज की याद दिलाता है, खासकर बुजुर्ग और मध्यम वर्ग के वोटर उस पल को भूलना नहीं चाहते. ऊपर से एक खास वर्ग के लोगों का मर्डर आग में घी का काम कर रहा है. नीतीश के खिलाफ गुस्सा भले बढ़ रहा हो, लेकिन उस गुस्से का लाभ तेजस्वी को मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है. ‘कम से कम नीतीश के वक्त हालत थोड़े कंट्रोल में थे’, ऐसी सोच भी वोटरों के बीच मजबूत हो सकती है. वे सोच सकते हैं कि नीतीश ने भले सुशासन का दावा खो दिया हो, लेकिन लालू राज से बेहतर ही हैं.
तेजस्वी यादव का चेहरा अभी भी लालू राज की याद दिलाता है, खासकर बुजुर्ग और मध्यम वर्ग के वोटर उस पल को भूलना नहीं चाहते. ऊपर से एक खास वर्ग के लोगों का मर्डर आग में घी का काम कर रहा है. नीतीश के खिलाफ गुस्सा भले बढ़ रहा हो, लेकिन उस गुस्से का लाभ तेजस्वी को मिले, इसकी कोई गारंटी नहीं है. ‘कम से कम नीतीश के वक्त हालत थोड़े कंट्रोल में थे’, ऐसी सोच भी वोटरों के बीच मजबूत हो सकती है. वे सोच सकते हैं कि नीतीश ने भले सुशासन का दावा खो दिया हो, लेकिन लालू राज से बेहतर ही हैं.
कौन बन रहा है निशाना?
बिहार का क्राइम ग्राफ देखें तो हाल की हत्या और हिंसा की घटनाएं किसी वर्ग विशेष को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. बिहार जैसे समाज में यह बात सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी कारण बन जाती है. ऐसे मामलों में लोगों की प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है और भावनाएं जब डर में बदलती हैं, तो वोट बहुत सोच-समझकर डाले जाते हैं.
बिहार का क्राइम ग्राफ देखें तो हाल की हत्या और हिंसा की घटनाएं किसी वर्ग विशेष को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. बिहार जैसे समाज में यह बात सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी कारण बन जाती है. ऐसे मामलों में लोगों की प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है और भावनाएं जब डर में बदलती हैं, तो वोट बहुत सोच-समझकर डाले जाते हैं.
तेजस्वी की मजबूत छवि लेकिन
अगर तेजस्वी यादव सोचते हैं कि नीतीश सरकार की कमजोरी अपने आप उन्हें सत्ता दिला देगी, तो ये राजनीतिक भूल होगी. उनकी छवि मजबूत है. विपक्ष के नेता के तौर पर उनका ही चेहरा है, लेकिन उन्हें अपने चेहरे से उस जंगलराज की परछाई हटानी होगी, जिसकी वजह से लोग डरे रहते हैं. विकल्प वो तभी बन पाएंगे जब सिर्फ खुद को भरोसेमंद साबित कर पाएंगे.
अगर तेजस्वी यादव सोचते हैं कि नीतीश सरकार की कमजोरी अपने आप उन्हें सत्ता दिला देगी, तो ये राजनीतिक भूल होगी. उनकी छवि मजबूत है. विपक्ष के नेता के तौर पर उनका ही चेहरा है, लेकिन उन्हें अपने चेहरे से उस जंगलराज की परछाई हटानी होगी, जिसकी वजह से लोग डरे रहते हैं. विकल्प वो तभी बन पाएंगे जब सिर्फ खुद को भरोसेमंद साबित कर पाएंगे.







