बिहार विधानसभा चुनाव से 4 महीने पहले NDA सरकार ने राज्य के आयोग और बोर्ड में अपने-अपने नेताओं को सेट कर दिया है। इसमें केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बहनोई से लेकर जीतन राम मांझी के दामाद तक को जगह दी गई है।
आयोग और बोर्ड के इस गठन में जदयू ने जहां अपनी इलाकेवार जातीय समीकरण को साधने की कोशिश की है तो वहीं बीजेपी ने अपने हिस्से आई 4 में से तीन जगह पर सवर्णों को बैठाया है।
अभी तक गठित कुल 13 आयोग में से 8 के अध्यक्ष जदयू नेता को बनाया गया है। बीजेपी के हिस्से में 4 आयोग आए हैं।
एलजेपी(आर) नेता को भी एक का अध्यक्ष बनाया गया है। जबकि, गठबंधन के सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा के रालोमो को मात्र एक सदस्य और जीतन राम मांझी को एक उपाध्यक्ष और एक सदस्य के पद से ही संतोष करना पड़ा है।
सरकार की ओर से गठित 13 आयोग-बोर्ड में शामिल नेताओं का इलाके में इनका क्या कद था? किस जाति और किस इलाके के लोगों को ज्यादा तवज्जो दी गई है? किस आधार पर नेताओं को ये पद दिए गए हैं। इसका चुनाव में क्या असर हो सकता है ?
जदयू ने जाति के आधार पर पुराने नेताओं को सेट किया
राजनीतिक अनुभव – पूर्णिया के अशोक कुमार समता पार्टी के काल से ही नीतीश कुमार से जुड़े रहे हैं। इनके पिता को भी नीतीश कुमार सरकार में ललित कला अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था।
क्षेत्र में पकड़ – बीमा भारती के जदयू छोड़कर राजद में जाने से पार्टी रुपौली विधानसभा क्षेत्र में कमजोर हुई है। इनके सहारे उस डेंट की भरपाई करने की कोशिश की गई है।
जातीय समीकरण – अशोक केवट जाति से आते हैं। ‘केवल रूपौली विधानसभा में लगभग 15-20 हजार से ज्यादा केवट वोटर्स हैं।’ ऐसे में इन्हें अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने केवट जाति को साधा है।’
अल्पसंख्यक आयोग :
राजनीतिक अनुभव- गुलाम रसूल बलियावी सियासत के पुराने खिलाड़ी माने जाते हैं। लंबे समय से नीतीश कुमार के साथ हैं। बलियावी को लालू का विरोधी माना जाता है। राज्यसभा सांसद, MLC के अलावा ये जदयू के महासचिव भी रह चुके हैं।
क्षेत्र में पकड़ – गुलाम रसूल बलियावी कौमी इत्तेहाद मोर्चा संगठन के संस्थापक भी हैं। बिहार के अलावा कई राज्यों में भी ये संगठन एक्टिव हैं, जहां इनकी अपनी एक पहचान है। मुस्लिम मामलों पर बेबाक बयानबाजी के लिए भी लोग इन्हें पसंद करते हैं।
जातीय समीकरण – वक्फ संशोधन कानून को लेकर अल्पसंख्यक संगठन लगातार जदयू का विरोध कर रहा है। ऐसे में एक वोकल नेता को आगे बढ़ाकर नीतीश कुमार इस मामले में डैमेज कंट्रोल कर सकते हैं।
राजनीतिक अनुभव- नवीन कुमार आर्य की पहचान नेता से ज्यादा एक शिक्षाविद की है। ये पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं। जदयू में पार्टी कार्यालय से लेकर प्रदेश उपाध्यक्ष और महासचिव के पद पर काम कर चुके हैं।
क्षेत्र में पकड़ – इनका जमीन पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं है।
जातीय समीकरण – EBC समाज से आते हैं। लेकिन जातीय समीकरण का बहुत ज्यादा लाभ पार्टी को नहीं दिला सकते हैं।
राजनीतिक अनुभव- मनोज कुमार ऋषि के पिता कटिहार के कोढ़ा से तीन बार के विधायक रहे हैं। बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। मनोज ने राजद से अपनी राजनीति की शुरुआत की। इसके बाद 2010 में उन्होंने जदयू का दामन थामा, इसके बाद पार्टी से जुड़े हुए हैं।
क्षेत्र में पकड़ – कोढ़ा विधानसभा में इनकी अच्छी पकड़ है। कोढ़ा में NDA कैंडिडेट को जिताने में इनकी अहम भूमिका रही है। सीट बंटवारे के तहत ये सीट बीजेपी के खाते में चली गई, इसलिए इनका टिकट कटता रहा। इस बार भी ये टिकट के दावेदार थे।
जातीय समीकरण – कोढ़ा विधानसभा क्षेत्र में दलित निर्णायक भूमिका में है। इनके बीच मनोज काफी लोकप्रिय हैं। पिता की लोकप्रियता भी इनके साथ है।
राजनीतिक अनुभव – समता पार्टी के दौरान से नीतीश कुमार के साथ रहे हैं। अपनी पूरी राजनीति जदयू में की है। किसी भी स्थिति में इन्होंने नीतीश का साथ नहीं छोड़ा। संगठन में काम करने का अनुभव है।
क्षेत्र में पकड़ – किशनगंज के सीनियर जर्नलिस्ट आकाश झा बताते हैं, ’किशनगंज में इनकी एक अलग छवि है। अल्पसंख्यक बहुल जिला होने के बाद भी इनकी हिंदुओं के बीच पैठ है। सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के बीच विशेष पकड़ है।
जातीय समीकरण – ये खुद सद्गगोप समाज से आते हैं, जो EBC की श्रेणी में आती है। किशनगंज विधानसभा में जीत-हार तय करने में इस जाति की अहम भूमिका होती है। इसके अलावा आदिवासियों के बीच भी इनकी पैठ है।
राजनीतिक अनुभव- अप्सरा मिश्रा जदयू के गठन काल से ही पार्टी से जुड़ी रहीं हैं। छात्र जदयू, यूथ जदयू मे कई पदों पर रह चुकी हैं। 2022 में पार्टी की तरफ से इन्हें राजनीतिक सलाहकार और 2025 में बांकीपुर विधानसभा का प्रभारी भी बनाया गया था।
क्षेत्र में पकड़ – इनका इलाके में बहुत ज्यादा पकड़ नहीं है और न ही ये किसी बड़े वर्ग को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। ये संगठन की नेत्री हैं और संगठन की बेहतर समझ रखती हैं।
जातीय समीकरण – मिश्रा समाज से आती हैं। जदयू ने समस्तीपुर में ईबीसी समाज के नेता को जिलाध्यक्ष बनाया है। जिस सरायरंजन प्रखंड से आती हैं, वहां से भूमिहार विधायक हैं। ऐसे में जिले में सवर्ण मतदाताओं के बीच एक मैसेज देने की कोशिश की गई है।
राजनीतिक अनुभव- इनके पास कोई बहुत बड़ा पॉलिटिकल अनुभव नहीं है। जदयू में लंबे समय से जुड़े रहे हैं। यहां ये सोशल मीडिया टीम के इंचार्ज रहे हैं। इनके पिता रमेंद्र कुमार रवि मधेपुरा से सांसद रह चुके हैं।
क्षेत्र में पकड़ – जमीन पर इनकी कोई मजबूत पकड़ नहीं है। पार्टी के कोषाध्यक्ष ललन सर्राफ के करीबी होने का लाभ उन्हें मिला है।
जातीय समीकरण – यादव जाति से आते हैं। नॉन यादव OBC पॉलिटिक्स करने वाले नीतीश कुमार ने इन्हें ये जिम्मेदारी देकर एक मैसेज देने की कोशिश की है।
राजनीतिक अनुभव- छपरा के रहने वाले सलीम परवेज सियासत के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। बसपा, राजद, जदयू में रह चुके हैं। लालू और राबड़ी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। 2009 से 2015 तक MLC रह चुके हैं।
क्षेत्र में पकड़ – सारण इलाके में इनकी अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है।
जातीय समीकरण – सलीम परवेज पसमांदा मुसलमान हैं। ये वर्ग हमेशा से NDA को सपोर्ट करते रहा है। जेडीयू की तरफ से इसी वर्ग के अली अनवर को आगे बढ़ाया गया था। अब वे पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। इस लिहाज से भी इस फैसले को देखा जा रहा है।
राजनीतिक अनुभव- महाचंद्र प्रसाद सिंह बिहार की सियासत का बड़ा नाम है। बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बीजेपी से पहले वे हम और जदयू में भी रह चुके हैं। लंबे समय तक इन्होंने कांग्रेस से राजनीति की है।
क्षेत्र में पकड़ – महाचंद्र प्रसाद सिंह मूल रूप से दक्षिण बिहार के हैं, लेकिन इन्होंने अपनी पूरी राजनीति उत्तर में की है। सारण से कई बार ये विधान परिषद चुने गए हैं। ऐसे में इन इलाकों में इस फैसले का ज्यादा असर पड़ सकता है।
जातीय समीकरण – महाचंद्र प्रसाद भूमिहार समाज से आते हैं। मौजूदा समय में भूमिहार बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में इस फैसले का लाभ उन्हें मिल सकता है।
राजनीतिक अनुभव- शैलेंद्र कुमार गढ़वाल को बेतिया के थरुअट इलाके में थारु जनजाति का बड़ा नेता माना जाता है। शैलेंद्र कुमार जिला परिषद के अध्यक्ष रह चुके हैं। फिलहाल गौनाहा प्रखंड से जिला परिषद के सदस्य हैं। सबसे अधिक वोट से जिला परिषद का चुनाव जीतने का रिकॉर्ड इनके नाम है। साथ ही 2020 में वाल्मीकि नगर लोकसभा उपचुनाव भी लड़ चुके हैं। तब इन्हें 1.25 लाख वोट मिला था।
क्षेत्र में पकड़ – थरुअट जनजाति के नेता और पार्टी के भरोसेमंद शैलेंद्र कुमार गढ़वाल को अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने ये मैसेज देने की कोशिश की है कि आज भी पार्टी उनके साथ खड़ी है। ऐसा पहली मर्तबा है कि इस क्षेत्र के नेता को ST आयोग का न केवल अध्यक्ष बनाया गया है, बल्कि इतनी बड़ी संख्या में हिस्सेदारी भी दी गई है।’
जातीय समीकरण – वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकांत बताते हैं, ‘पश्चिम चंपारण में थरुअट में थारु जनजाति की 5 लाख से ज्यादा आबादी है। वो भी मात्र 4 प्रखंड में। इन्हें बीजेपी का वोट बैंक माना जाता है। राजद समेत अन्य जातियां इसमें लगातार सेंधमारी की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक अनुभव- मृत्युंजय झा खांटी संगठन के नेता हैं। संघ से इन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। पार्टी में महानगर में संगठन प्रभारी से लेकर प्रदेश मंत्री और प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके हैं। चुनावों में सांगठनिक जिम्मेदारी निभाने का अनुभव है।
क्षेत्र में पकड़ – मृत्युंजय झा जमीन से ज्यादा संगठन के नेता माने जाते हैं।
जातीय समीकरण – मिथिलांचल का इलाका एनडीए और बीजेपी के लिए गढ़ रहा है। इन इलाकों में जीत हार में ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में होते हैं। ऐसे में इस फैसले को उस नजरिए से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
राजनीतिक अनुभव– रणवीर नंदन की राजनीति बीजेपी और जदयू के इर्द-गिर्द रही है। जदयू में रहते हुए ये 2014 से 2020 तक एमएलसी भी रह चुके हैं। जदयू में प्रवक्ता और बीजेपी के प्रदेश मंत्री रह चुके हैं।
क्षेत्र में पकड़ – रणवीर नंदन ने हमेशा बैक डोर पॉलिटिक्स किया हैं। जमीन पर इनकी पकड़ बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है।
जातीय समीकरण – रणवीर नंदन कायस्थ समाज से आते हैं। जाति के कार्यक्रमों में भी आयोजित रहे हैं। ऐसे में बीजेपी ने रणवीर नंदन के सहारे इस समाज को मैसेज देने की कोशिश की है।
परिवार के हवाले SC आयोग
LJP(R) के हिस्से एकमात्र अनुसूचत जाति (SC) आयोग आया था, इसे पूरी तरह परिवार के हवाले कर दिया गया है। पार्टी सुप्रीमो चिराग पासवान के बहनोई मृणाल पासवान को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। इसके साथ हम सुप्रीमो जीतन राम मांझी के दामाद देवेंद्र कुमार को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है।
करीबी, अधिकारी और रिश्तेदार को भी खुश किया
आयोग के गठन में समीकरण सेट करने के साथ-साथ बड़े नेताओं के करीबी और रिश्तेदारों को भी खुश करने की कोशिश की गई है। साथ ही अधिकारी भी अपने परिवार को सेट करने में सफल रहे हैं। सीएम नीतीश कुमार के प्रधान सचिव दीपक कुमार ने अपनी पत्नी रश्मि रेखा सिन्हा को महिला आयोग में सदस्य बनाया है।
टिकट के दावेदारों को भी कम किया
आयोग और बोर्ड में अपने नेताओं को सेट कर सत्ताधारी पार्टी ने टिकट में अपने दावेदारों को भी कम किया है। ऐसा माना जा रहा है कि जिन्हें भी इन बोर्ड और आयोग का अध्यक्ष बनाया गया हैं, चुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिलेगा। ST आयोग के अध्यक्ष बने शैलेंद्र कुमार, महादलित आयोग के अध्यक्ष बने मनोज कुमार, बाल श्रमिक आयोग के अध्यक्ष बने अशोक कुमार टिकट के प्रबल दावेदार माना जा रहे थे। इसके अलावा भी कई नेता जो MLC की रेस में थे, उन्हें भी इसमें सेट कर दिया गया है।
20 सूत्री में 1 हजार कार्यकर्ताओं को जगह दी गई
NDA सरकार बनने के 6 महीने बाद ही नीतीश कुमार ने 20 सूत्री का गठन कर दिया था। इसमें हर जिले में एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष सहित 25 सदस्य मनोनीत किए गए हैं। इसमें भी बड़ी संख्या में जदयू, बीजेपी, हम, LJP(R) के कार्यकर्ताओं को जगह दी गई है। 38 जिले में हजार से अधिक कार्यकर्ताओं को जगह दी गई है।
अध्यक्ष को 2.5 लाख से ज्यादा की सैलरी
बोर्ड और आयोग के अध्यक्ष को बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को उसके सदस्य के समकक्ष वेतन, भत्ता और अन्य सुविधाएं दी जाती है। साथ ही राज्य सरकार इन्हें अपने विवेक से मंत्री, राज्य मंत्री या उप मंत्री का दर्जा दे सकती है।
2023 में जब सरकार की तरफ से ये संशोधन जारी किया गया था, तब लोकसभा आयोग के अध्यक्ष की सैलरी 2.25 लाख के अलावा डीए अलग से और इसी तरह सदस्य की सैलरी 2 लाख रुपए प्लस सैलरी थी। इसके अलावा आवास और गाड़ी की सुविधा इन्हें अलग से दी जाती है।







