बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कथित ‘चुनावी फिक्सिंग’ का जिक्र किया था. तेजस्वी ने कहा कि बिहार में भी चुनाव को लेकर संदेह स्वाभाविक है, क्योंकि 2014 के बाद से मोदी सरकार ने देश की संवैधानिक संस्थाओं को ‘हाईजैक’ कर लिया है. राजद नेता ने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव का हवाला देते हुए दावा किया कि महागठबंधन सत्ता में आने की स्थिति में था, लेकिन चुनाव आयोग ने हमारे जीते हुए उम्मीदवारों को जबरन हरवाया. उन्होंने कहा कि उस समय आयोग को तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई देनी पड़ी और यह भाजपा के इशारे पर काम करने का सबूत .
बिहार की सियासत में नया मोड़- बता दें कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी, कांग्रस, वीआईपी और वाम दलों का महागठबंधन सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है. अभी तक जहां यह कहा जा रहा था कि कांग्रेस अपनी अलग राजनीतिक राह बना रही है, वहीं तेजस्वी यादव का यह बयान राहुल गांधी के साथ उनकी एकजुटता को दर्शाता है. ऐसे में तेजस्वी का यह बयान बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है. बता दें कि हाल के दिनों में राहुल गांधी की बिहार में सक्रियता और ओबीसी-ईबीसी वोटरों पर फोकस ने संकेत दिया है कि कांग्रेस अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश में है.
एनडीए का जवाबी हमला
दूसरी ओर एनडीए ने तेजस्वी और राहुल के आरोपों को खारिज करते हुए इसे ‘हार की हताशा’ करार दिया. जेडीयू प्रवक्ता अभिषेक झा ने कहा, तेजस्वी और राहुल पहले से ही हार का बहाना ढूंढ रहे हैं. 2020 में महागठबंधन की हार उनकी रणनीति की विफलता थी, न कि आयोग की साजिश. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी को सोशल मीडिया से निकलकर जमीनी हकीकत देखनी चाहिए.
यहां यह भी बता दें कि 2020 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने 110 सीटें जीती थीं, लेकिन एनडीए की 125 सीटों के सामने सत्ता से दूर रहा गया था. तेजस्वी यादव की अगुवाई में आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और कांग्रेस की कमजोर स्ट्राइक रेट (70 में से 19 सीटें) ने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया था. इस बार तेजस्वी यादव बेरोजगारी, पलायन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठाकर एनडीए को घेर रहे हैं. हालांकि, चिराग पासवान की नव संकल्प रैली और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी जैसे नए खिलाड़ी महागठबंधन के लिए चुनौती हैं.
महागठबंधन की हताशा या रणनीति?
बहरहाल, तेजस्वी यादव का राहुल गांधी के बयान का समर्थन और संवैधानिक संस्थाओं पर हाईजैक का आरोप बिहार में चुनावी माहौल को गर्माने वाला है. यह बयान युवा और अल्पसंख्यक मतदाताओं को लामबंद कर सकता है, लेकिन एनडीए इसे ‘विपक्ष की हताशा’ के रूप में प्रचारित कर रहा है. जैसे-जैसे बिहार चुनाव नजदीक आ रहे हैं तेजस्वी यादव और राहुल गाधी की यह रणनीति महागठबंधन को कितना फायदा पहुंचाएगी यह देखने वाली बात होगी.
बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कथित ‘चुनावी फिक्सिंग’ का जिक्र किया था. तेजस्वी ने कहा कि बिहार में भी चुनाव को लेकर संदेह स्वाभाविक है, क्योंकि 2014 के बाद से मोदी सरकार ने देश की संवैधानिक संस्थाओं को ‘हाईजैक’ कर लिया है. राजद नेता ने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव का हवाला देते हुए दावा किया कि महागठबंधन सत्ता में आने की स्थिति में था, लेकिन चुनाव आयोग ने हमारे जीते हुए उम्मीदवारों को जबरन हरवाया. उन्होंने कहा कि उस समय आयोग को तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई देनी पड़ी और यह भाजपा के इशारे पर काम करने का सबूत .
बिहार की सियासत में नया मोड़- बता दें कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी, कांग्रस, वीआईपी और वाम दलों का महागठबंधन सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है. अभी तक जहां यह कहा जा रहा था कि कांग्रेस अपनी अलग राजनीतिक राह बना रही है, वहीं तेजस्वी यादव का यह बयान राहुल गांधी के साथ उनकी एकजुटता को दर्शाता है. ऐसे में तेजस्वी का यह बयान बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है. बता दें कि हाल के दिनों में राहुल गांधी की बिहार में सक्रियता और ओबीसी-ईबीसी वोटरों पर फोकस ने संकेत दिया है कि कांग्रेस अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश में है.
एनडीए का जवाबी हमला
दूसरी ओर एनडीए ने तेजस्वी और राहुल के आरोपों को खारिज करते हुए इसे ‘हार की हताशा’ करार दिया. जेडीयू प्रवक्ता अभिषेक झा ने कहा, तेजस्वी और राहुल पहले से ही हार का बहाना ढूंढ रहे हैं. 2020 में महागठबंधन की हार उनकी रणनीति की विफलता थी, न कि आयोग की साजिश. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने भी तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी को सोशल मीडिया से निकलकर जमीनी हकीकत देखनी चाहिए.
यहां यह भी बता दें कि 2020 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने 110 सीटें जीती थीं, लेकिन एनडीए की 125 सीटों के सामने सत्ता से दूर रहा गया था. तेजस्वी यादव की अगुवाई में आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और कांग्रेस की कमजोर स्ट्राइक रेट (70 में से 19 सीटें) ने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया था. इस बार तेजस्वी यादव बेरोजगारी, पलायन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठाकर एनडीए को घेर रहे हैं. हालांकि, चिराग पासवान की नव संकल्प रैली और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी जैसे नए खिलाड़ी महागठबंधन के लिए चुनौती हैं.
महागठबंधन की हताशा या रणनीति?
बहरहाल, तेजस्वी यादव का राहुल गांधी के बयान का समर्थन और संवैधानिक संस्थाओं पर हाईजैक का आरोप बिहार में चुनावी माहौल को गर्माने वाला है. यह बयान युवा और अल्पसंख्यक मतदाताओं को लामबंद कर सकता है, लेकिन एनडीए इसे ‘विपक्ष की हताशा’ के रूप में प्रचारित कर रहा है. जैसे-जैसे बिहार चुनाव नजदीक आ रहे हैं तेजस्वी यादव और राहुल गाधी की यह रणनीति महागठबंधन को कितना फायदा पहुंचाएगी यह देखने वाली बात होगी.