बिहार विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) महागठबंधन में शामिल हो सकती है। पार्टी ने RJD-कांग्रेस को खुला ऑफर दिया है।
बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान ने भास्कर को बताया, ‘BJP और सांप्रदायिक ताकतों को बिहार से उखाड़ फेंकने के लिए हमने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई है। सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ हमें एकजुट होना चाहिए। यही सोचकर हमने फैसला लिया है।’
अख्तरुल इमान ने कहा, ‘RJD और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक हमने अपनी बात पहुंचा दी है। अब फैसला उन्हें लेना है, वो शामिल करते हैं या नहीं। उन्होंने हमारे विधायकों को तोड़ा, हमें कमजोर किया। इसके बाद भी हम विपक्ष के साथ ही मजबूती से खड़े रहे। ऐसे में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए हर कमजोर जमात को एक होना चाहिए।’
क्या गठबंधन के लिए AIMIM की तरफ से किसी तरह की कोई शर्त रखी गई? इस सवाल पर अख्तरुल ने कहा, ‘फायदा हो तो साथ आएं। ये सब अब उन्हें सोचना है। गठबंधन के बाद कितनी सीटों पर लड़ना है? कितनी सीटों पर लड़ना सही रहेगा। ये सब मिल बैठकर चर्चा की जाएगी। लेकिन हां, अगर ये गठबंधन नहीं करते हैं और मनमाफिक फैसला नहीं आता है तो कल ये नहीं कहें कि मेरे कारण हार गए।’
25-30 सीटें मांग रही AIMIM, RJD 8 से 10 सीट देने को तैयार
RJD के सोर्स की मानें तो AIMIM की तरफ से ऑफर दिया गया है। उन्होंने सीमांचल की 25-30 सीटों की डिमांड की है। RJD 8 से 10 सीट तक देने को तैयार है।
AIMIM से गठबंधन करना चाहिए या नहीं, इस पर आखिरी फैसला लालू यादव और तेजस्वी यादव को करना है। फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई बात नहीं हुई है।
2020 में AIMIM 20 सीटों पर लड़ी, 5 सीटें जीती
ओवैसी की पार्टी का बिहार में प्रभाव सीमांचल एरिया यानी पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जिले में अधिक है।
2020 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल में ही RJD को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के तहत उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा और बसपा एक साथ चुनाव लड़ी थी।
2020 में AIMIM के हिस्से सीमांचल की 20 सीटें आई्ं थी। इनमें से 5 सीटें जीतने में सफल रही थी। 20 सीटों पर हुई वोटिंग को देखें तो पार्टी को 14.3 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि, 2015 के चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और मात्र 0.5 फीसदी वोट मिला था।
वहीं, 2024 लोकसभा चुनाव में AIMIM ने लोकसभा की 8 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा। सभी सीटों पर पार्टी के कैंडिडेट हार गए थे। हालांकि, पार्टी को 4.5 फीसदी वोट शेयर मिला था।
2 पॉइंट में ओवैसी के साथ आने से महागठबंधन को फायदे
1. मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकेगा
बिहार में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी सीमांचल के इलाके में ही हैं। आंकड़े की बात करें तो किशनगंज में सबसे अधिक 67 फीसदी मुसलमान वोटर्स हैं। इसके बाद कटिहार में 38 फीसदी, अररिया में 32 फीसदी, पूर्णिया में 30 फीसदी मुसलमान वोटर्स हैं। फिलहाल AIMIM की पैठ इन्हीं इलाकों में है।
ऐसे में अगर ये पार्टी महागठबंधन का हिस्सा बनती है तो RJD-कांग्रेस और ओवैसी के वोटर्स एकजुट होंगे। खासकर मुस्लिम वोटों का बिखराव रुकेगा। इसका सीधा फायदा महागठबंधन को होगा।
2. तीसरा मोर्चा बनने की संभावना समाप्त होगी
अभी लगभग सभी पार्टियां किसी न किसी गठबंधन से जुड़ी हैं। NDA में BJP, JDU के अलावा LJP(R), उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा और HAM शामिल है। इसी तरह महागठबंधन में RJD, कांग्रेस, लेफ्ट और VIP शामिल है।
BSP और AIMIM दो ऐसी पार्टियां हैं, जिनका बिहार के एक लिमिटेड इलाके में अपना जनाधार तो है, लेकिन ये किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में एक तीसरा मोर्चा बनने की संभावना दिखाई दे रही है। AIMIM महागठबंधन में शामिल हो जाती है तो इसकी संभावना भी समाप्त हो जाएगी।
ओवैसी के महागठबंधन में शामिल होने के 2 नुकसान
1. सीट शेयरिंग में पेंच अटकेगा
दोनों ही गठबंधनों में सीट शेयरिंग की प्रक्रिया लगभग आखिरी चरण में है। ऐसे में एक पार्टी के आने से महागठबंधन में सीट शेयरिंग का गणित गड़बड़ा सकता है। लेफ्ट की सभी पार्टियां खासकर भाकपा माले परफॉर्मेंस के लिहाज से पिछली बार से ज्यादा सीटें मांग रही हैं। VIP भी सम्मानजनक सीटों की बात कर रही है। कांग्रेस का अपना दावा है। वहीं, दूसरी तरफ राजद सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाह रही है।
कांग्रेस पहले से ही सीमांचल में अपनी मजबूत दावेदारी कर रही है। कटिहार, किशनगंज और अगर पप्पू यादव को जोड़ लें तो पूर्णिया में भी इनके सांसद हैं। पार्टी का फोकस भी इस इलाके में है। ऐसे में कांग्रेस और माले कतई नहीं चाहेगी कि AIMIM महागठबंधन का हिस्सा बने।
2. ओवैसी का कट्टर चेहरा ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है
AIMIM सुप्रीमो असद्दुदीन ओवैसी की छवि कट्टर मुस्लिमों की है। वे अपनी कट्टर छवि और आक्रामक भाषण के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में वे अगर महागठबंधन का हिस्सा बनते हैं तो हिंदू और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होगा। इसका सीधा फायदा NDA गठबंधन को होगा।
अक्टूबर-नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर NDA और महागठबंधन की पार्टियों ने सीटों का बंटवारा कर लिया है। अंदरखाने अब सीटों के चयन की प्रक्रिया की जा रही है।सूत्रों के मुताबिक, दोनों गठबंधन की पार्टियां आपस में सीटों की अदला-बदली कर सकती हैं। सीटों के चयन में विनेबिलिटी को तरजीह दी जा रही है। जहां से जो पार्टी चुनाव जीत सकती है, उसे वहां का टिकट दिया जाएगा। सीटों का चयन होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।







