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भारत में संघवाद: केंद्र और राज्यों के बीच और अधिक सहयोग की जरूरत है……………

UB India News by UB India News
April 20, 2025
in राष्ट्रीय
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भारत में संघवाद: केंद्र और राज्यों के बीच और अधिक सहयोग की जरूरत है……………
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भारत का संघवाद एक अनोखा मॉडल है, जिसे ‘अर्ध-संघीय’ (क्वासी-फेडरल) संरचना कहा जाता है. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा होता है, लेकिन केंद्र सरकार का प्रभाव अधिक होता है. तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की है, जो राज्य स्वायत्तता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. भारत के संघवाद की प्रकृति, इसके ऐतिहासिक विकास, चुनौतियों, वित्तीय शक्तियों, विवाद समाधान तंत्र, क्षेत्रीय दलों की भूमिका, कानूनी सिद्धांतों, और तमिलनाडु की समिति के संदर्भ में समकालीन मांगों को समझने की जरूरत है.

भारत में संघवाद की मूल प्रकृति

भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा करता है. इसे तीन सूचियों में विभाजित किया गया है:

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  1. केंद्र सूची: इसमें रक्षा, विदेश नीति, और रेलवे जैसे विषय हैं, जिन पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है.

  2. राज्य सूची: इसमें पुलिस, कृषि, और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषय हैं, जिन पर राज्य सरकारें कानून बनाती हैं.

  3. समवर्ती सूची: इसमें शिक्षा और विवाह जैसे विषय हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन केंद्र के कानून को प्राथमिकता मिलती है.

राज्यों को अपनी सूची के विषयों पर स्वायत्तता है, लेकिन केंद्र को आपातकाल या विशेष परिस्थितियों में हस्तक्षेप का अधिकार है. यह संरचना भारत को एक मजबूत केंद्र के साथ अर्ध-संघीय बनाती है, जो राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच संतुलन बनाए रखती है.

संघवाद का ऐतिहासिक विकास

भारत में संघवाद की जड़ें प्राचीन काल से हैं. मौर्य और गुप्त साम्राज्यों में केंद्रीकृत शासन के साथ-साथ स्थानीय स्वायत्तता थी. मध्यकाल में चोल, मराठा जैसे क्षेत्रीय राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी. ब्रिटिश काल में भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने एक संघीय ढांचे का प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रांतों को कुछ शक्तियां दी गईं.

आजादी के बाद, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अगुआई में संविधान सभा ने ‘राज्यों का संघ’ मॉडल अपनाया. यह मॉडल एक मजबूत केंद्र पर जोर देता है ताकि भारत की सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता के बीच एकता बनी रहे. तमिलनाडु जैसे राज्यों ने हमेशा अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर स्वायत्तता की मांग की है.

संघीय ढांचे में चुनौतियां

भारत का संघीय ढांचा कई चुनौतियों का सामना करता है:

  1. विधायी शक्तियों का ह्रास: शिक्षा जैसे विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने से राज्यों की शक्तियां कम हुई हैं.

  2. राष्ट्रीय नीतियों का दबदबा: नीट (NEET) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अपनी जरूरतों पर अतिक्रमण माना है.

  3. वित्तीय असमानता: जीएसटी लागू होने से राज्यों को राजस्व का नुकसान हुआ है, जिससे केंद्र पर उनकी निर्भरता बढ़ी है.

  4. प्रतिनिधित्व की चिंता: जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों, जैसे तमिलनाडु, को डिलिमिटेशन के कारण कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर है.

  5. राज्यों का बहिष्कार: कई राज्यों को लगता है कि बड़े राष्ट्रीय निर्णयों में उनकी राय नहीं ली जाती.

तमिलनाडु ने इन मुद्दों को उठाने के लिए एक समिति बनाई है, जो केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा कर रही है.

वित्तीय शक्तियों का बंटवारा

भारत के संविधान में वित्तीय शक्तियों का बंटवारा स्पष्ट है. केंद्र को आयकर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क जैसे बड़े कर लगाने का अधिकार है. राज्यों को शराब, पेट्रोलियम (जीएसटी से बाहर), और संपत्ति कर जैसे क्षेत्रों में कर लगाने की शक्ति है. लेकिन राज्यों को नीतियां लागू करने के लिए केंद्र से धन हस्तांतरण पर निर्भर रहना पड़ता है.

वित्त आयोग करों के बंटवारे की सिफारिश करता है. पहले योजना आयोग (अब नीति आयोग) अनुदान और ऋण देता था. जीएसटी के बाद तमिलनाडु जैसे राज्यों ने राजस्व नुकसान की शिकायत की है. तमिलनाडु की समिति इस मुद्दे पर अधिक वित्तीय स्वायत्तता की मांग कर रही है.

विवाद समाधान और सहयोग के तंत्र

केंद्र और राज्यों के बीच विवाद सुलझाने के लिए कई तंत्र हैं:

  1. नदी जल विवाद न्यायाधिकरण: अनुच्छेद 262 और 1956 के अधिनियम के तहत नदी जल विवादों को सुलझाने के लिए ये बनाए जाते हैं.

  2. जीएसटी परिषद: अनुच्छेद 279A के तहत यह जीएसटी से संबंधित मुद्दों पर सहयोग बढ़ाती है.

  3. अंतर-राज्य परिषद (ISC): यह केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय के लिए बनाई गई है, लेकिन यह पूरी तरह सक्रिय नहीं है.

तमिलनाडु की समिति ने इन तंत्रों को और प्रभावी बनाने की सिफारिश की है ताकि राज्यों की आवाज सुनी जाए.

क्षेत्रीय दलों की भूमिका

क्षेत्रीय दल, जैसे तमिलनाडु के DMK और AIADMK, संघवाद और राज्य स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण हैं. वे भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देते हैं और अधिक शक्तियों की मांग करते हैं. तमिलनाडु में:

  • नीट और एनईपी का विरोध किया जाता है, क्योंकि इन्हें राज्य के अधिकारों पर अतिक्रमण माना जाता है.

  • राज्य-विशिष्ट विकास कार्यक्रमों की मांग की जाती है.

तमिलनाडु की समिति क्षेत्रीय दलों की इन मांगों को मजबूत करने के लिए केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा कर रही है. ये दल राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं और संघवाद की बहस को जीवित रखते हैं.

कानूनी सिद्धांत और मामले

‘पिथ एंड सब्सटांस’ सिद्धांत तब लागू होता है जब केंद्र और राज्य सूची के बीच कानूनों में टकराव होता है. यह कानून के असली उद्देश्य को देखता है. कुछ महत्वपूर्ण मामले हैं:

  1. राजस्थान बनाम भारत संघ (1977): इसने राज्य विधानसभाओं के विघटन पर केंद्र की शक्ति को परिभाषित किया.

  2. पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ (1962): इसने कोयला खनन के लिए केंद्र द्वारा भूमि अधिग्रहण को सही ठहराया.

  3. शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): इसने राज्यपाल की शक्तियों को स्पष्ट किया.

ये मामले केंद्र और राज्यों की शक्तियों की सीमाएं तय करते हैं. तमिलनाडु की समिति इन कानूनी सिद्धांतों के आधार पर राज्य स्वायत्तता को मजबूत करने के उपाय सुझा रही है.

तमिलनाडु की समिति और समकालीन मांगें

तमिलनाडु सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की है. यह समिति निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान दे रही है:

  1. अधिक कर हिस्सेदारी: तमिलनाडु केंद्र से अधिक कर राजस्व की मांग करता है.

  2. जनसंख्या आधारित वितरण का विरोध: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण तमिलनाडु को कम वित्तीय संसाधन मिलने का डर है.

  3. केंद्रीय नीतियों पर आपत्ति: नीट और एनईपी को राज्य के अधिकारों पर अतिक्रमण माना जाता है.

  4. अधिक स्वायत्तता: समिति विधायी, प्रशासनिक, और वित्तीय स्वायत्तता की मांग कर रही है.

अन्य राज्यों में भी ऐसी मांगें हैं. ये मुद्दे दिखाते हैं कि संघवाद भारत की राजनीति में कितना महत्वपूर्ण है. तमिलनाडु की समिति इन मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास कर रही है.

भारत का संघवाद राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच संतुलन बनाता है. तमिलनाडु की समिति इस ढांचे को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. ऐतिहासिक विकास, वित्तीय बंटवारा, विवाद समाधान तंत्र, क्षेत्रीय दलों की भूमिका, और कानूनी सिद्धांत भारत के संघवाद को आकार देते हैं. लेकिन चुनौतियां, जैसे राज्यों की कम होती स्वायत्तता और वित्तीय असमानता, अभी भी बनी हुई हैं. तमिलनाडु की समिति और अन्य राज्यों की मांगें दिखाती हैं कि केंद्र और राज्यों के बीच और अधिक सहयोग की जरूरत है. भविष्य में यह सहयोग भारत के संघवाद को और सशक्त बना सकता है.

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